राज्य सभा उपसभापति के चुनाव का नतीजा तो सुबह ही आ चुका है लेकिन शाम तक इससे जुड़ी कुछ जानकारियां और संशोधित आंकड़े भी सामने आए हैं. इनके मुताबिक इस चुनाव में जब सत्ता पक्ष और विपक्ष की प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी तब भी 16 सदस्यों ने मतदान में हिस्सा ही नहीं लिया. इनमें से 15 सदस्य तो कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के ही थे.

चुनाव से पहले माना जा रहा था कि विपक्ष की ओर से सत्ता पक्ष को कड़ी टक्कर मिलेगी. क्योंकि कांग्रेस और उसके सहयोगियों के पास 116 सदस्यों का समर्थन था. जबकि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) के पास 100 सांसद भी नहीं थे. इसके बाद जब आम आदमी पार्टी (3) और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (2) ने मतदान में हिस्सा नहीं लेने का फैसला किया तो लगा कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल आसानी से अपने उम्मीदवार बीके हरिप्रसाद को उपसभापति बनवा लेंगे. क्योंकि इस वक़्त तक सदन की प्रभावी सदस्य संख्या कम हो चुकी थी और जीत के लिए सिर्फ 119 सदस्यों के समर्थन की ज़रूरत थी.

लेकिन जब नतीज़ा आया तो किस्सा उलट चुका था. अंतिम आंकड़ाें के मुताबिक बीके हरिप्रसाद को अपनी तरफ के सभी 116 सदस्यों का समर्थन भी नहीं मिला. उनके समर्थन का आंकड़ा 101 पर ठहर गया. जबकि एनडीए प्रत्याशी जेडीयू (जनता दल-एकीकृत) के हरिवंश नारायण सिंह को 125 वोट हासिल हो गए. उन्हें एनडीए के सभी दलों का समर्थन तो मिला ही तीन तटस्थ पार्टियों- अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (13), बीजू जनता दल (9) और तेलंगाना राष्ट्र समिति (6) का साथ भी मिल गया.

मतगणना के दौरान कुछ गफ़लत भी हुई. चार विपक्षी दलों के वोट दो बार गिन लिए गए. लिहाज़ा जब गलती को सुधारा गया तो पता चला कि हरिप्रसाद को चार वोट कम मिले हैं. पहले उन्हें 105 वोट मिलने की जानकारी दी गई थी. दूसरी ख़ास बात यह कि चुनाव के दौरान कांग्रेस के ही तीन और तृणमूल कांग्रेस के दो सदस्य भी अनुपस्थितों में शामिल थे. जबकि यही दोनों पार्टियां विपक्षी गठबंधन की अगुवा बनने की कोशिश में हैं. इन्हीं दाेनों के जोर देने पर उपसभापति पद के लिए चुनाव की स्थिति भी बनी थी.