राज्य सभा उपसभापति के चुनाव का नतीज़ा नौ अगस्त को आ चुका है. भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) के घटक दल जेडीयू (जनता दल-एकीकृत) के सांसद हरिवंश नारायण सिंह सदन के 125 सदस्यों का समर्थन हासिल कर इस पद पर काबिज़ हो चुके हैं. ऐसा तब हुआ जब एनडीए के पास 244 सदस्यों वाले उच्च सदन में 100 सदस्यों का समर्थन भी नहीं था. वहीं कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष के पास 116 सदस्य थे. लेकिन विपक्ष की ओर से कांग्रेस के ही उम्मीदवार बीके हरिप्रसाद को इन सभी सदस्यों का साथ भी नहीं मिला. उनके समर्थन का आंकड़ा 101 पर ठहर गया.

इस चुनाव में जब सत्ता पक्ष और विपक्ष की प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी तब भी 16 सदस्यों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया. इनमें से 15 सदस्य तो कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के ही थे. सदन से ऐन मौके पर नदारद रहे इन 15 सदस्यों में भी तीन कांग्रेस और दो तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के थे. जबकि यही दोनों पार्टियां विपक्षी गठबंधन की अगुवा बनने की कोशिश में हैं. इन्हीं दाेनों के जोर देने पर उपसभापति पद के लिए चुनाव की स्थिति भी बनी थी.

सो जाहिर तौर पर इस अहम मुकाबले के नतीज़े अभी आगे भी दिखने की पूरी उम्मीद की जा सकती है. ये कैसे हो सकता है और किन परिस्थितियों में, इस पर ग़ौर करने से पहले यह समझना दिलचस्प होगा कि राज्य सभा उपसभापति के चुनाव का पलड़ा अगर विपक्ष की तरफ भारी था तो वह सत्ता पक्ष की तरफ कैसे झुक गया? और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह और बिहार के मुख्यमंत्री तथा जेडीयू के प्रमुख नीतीश कुमार ने कैसे इसे अंज़ाम दिया?

एनडीए ने हर छोटे-बड़े दल के साथ अपने रणनीतिकारों को लगाया था

जैसा कि पहले ही कहा गया है यह मुकाबला प्रतिष्ठा का था और परसेप्शन का भी. यानी इसके जरिए सत्ता पक्ष विपक्ष के साथ-साथ देश को भी अपनी मज़बूती का संदेश देना चाहता था. इसमें वह अपनी सोची-समझी प्रभावी रणनीति से काफी हद तक सफल रहा. इसके लिए सबसे पहले जेडीयू को उपसभापति के पद की पेशकश की गई ताकि नीतीश कुमार ख़ुद इसके लिए सक्रिय हो सकें, जो वे हुए भी. इसके बाद जैसा कि सूत्र बताते हैं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने छह केंद्रीय मंत्रियों और संगठन के बड़े पदाधिकारियों की टीम बनाई. केंद्रीय मंत्रियों में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण, रेल मंत्री पीयूष गोयल, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख़्तार अब्बास नक़वी, पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्‌डा और संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार शमिल थे. जबकि पार्टी से राष्ट्रीय महामंत्रियाें - भूपेंद्र यादव, राम माधव और अनिल जैन को चुना गया. सभी को दल विशेष के नेता से संपर्क करने की ज़िम्मेदारी दी गई.

उदाहरण के लिए निर्मला सीतारमण और जेपी नड्डा को टीआरएस (तेलंगाना राष्ट्र समिति) से संपर्क साधने का ज़िम्मा दिया गया. नड्‌डा के साथ अनंत कुमार ने एआईएडीएमके (अखिल भारतीय अन्नाद्रविड़ मुनेत्र कड़गम) से संपर्क किया. जम्मू-कश्मीर में भाजपा के साथ सरकार चला चुकी पीडीपी (पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी) से राम माधव और धर्मेंद्र प्रधान ने बातचीत की. प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी अध्यक्ष शाह ने ख़ुद ओडिशा के मुख्यमंत्री तथा बीजेडी (बीजू जनता दल) के प्रमुख नवीन पटनायक को फोन लगाया. संसदीय मामलों के राज्य मंत्री विजय गोयल और धर्मेंद्र प्रधान को आप (आम आदमी पार्टी) के नेताओं से संपर्क करने की ज़िम्मेदारी दी गई.

शाह और सीतारमण ने वाईएसआर कांग्रेस से भी संपर्क साधा. लेकिन जब उससे सकारात्मक संकेत नहीं मिला तो नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के चुनाव रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर की मदद ली गई. उनसे वाईएसआर कांग्रेस के प्रमुख वाईएस जगनमोहन रेड्‌डी को मनाने का आग्रह किया गया. प्रशांत इस वक़्त वाईएसआर कांग्रेस के लिए ही चुनाव रणनीति बनाने का काम कर रहे हैं. नीतीश कुमार ने ख़ुद भी तमाम नेताओं से संपर्क किया. इस तरह पूरी जमावट होने के बाद पीडीपी और वाईएसआर कांग्रेस को मतदान के दौरान अनुपस्थित रहने और अन्य दलों को एनडीए उम्मीदवार के पक्ष में वोट देने के लिए राजी कर लिया गया.

दूसरी तरफ आप नेतृत्व को कांग्रेस के उपेक्षापूर्ण रवैये ने नाराज़ कर दिया और उसने मतदान से दूर रहने का फैसला कर लिया. कहा जाता है कि इससे पहले पीडीपी, वाईएसआर कांग्रेस और आप तीनों पार्टियां कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में वोट देने का मन बना चुकी थीं. लेकिन हालात, रणनीति और रणनीतिकारों ने उनका फैसला बदलवाने में सफलता हासिल कर ली जिससे एनडीए उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित हो गई. सूत्रों की मानें तो 20 जुलाई को लोक सभा में लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के दौरान जिस भारी अंतर से सत्ता पक्ष को जीत मिली थी उससे भी उसका हौसला बढ़ा था.

तो क्या इस चुनाव से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बारे में भी किसी नतीज़े पर पहुंचा जा सकता है?

इसका जवाब हां में दिया जा सकता है. इस चुनाव प्रक्रिया का जो हासिल रहा उसने विपक्ष के साथ सत्ता पक्ष को भी कुछ निश्चित संदेश और संकेत दिया है. पहले बात सत्ता पक्ष की. अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की कार्यशैली के बारे में यह शिकायत ज़्यादा सामने आती रही है कि वे सहयोगी दलों को ज़्यादा सम्मान नहीं देते. चार साल तक आंध्र प्रदेश और केंद्र में भाजपा के साथ सत्ता की साझेदारी कर उसका साथ छोड़ने वाले टीडीपी (तेलुगुदेशम पार्टी) प्रमुख चंद्रबाबू नायडू तो खुलेआम इस तरह के आरोप लगा चुके हैं. इसी नाराज़गी की वज़ह से टीडीपी ने लोक सभा में मोदी सरकार के ख़िलाफ़ जुलाई में अविश्वास प्रस्ताव भी पेश किया था. केंद्र और महाराष्ट्र में भाजपा की साझीदार शिवसेना भी इसीलिए नाराज़ है. शिवसेना महाराष्ट्र में अगला चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान भी कर चुकी है.

बिहार में भाजपा के साथ मिलकर सरकार चला रही जेडीयू और केंद्र में उसकी सहयोगी एलजेपी (लोक जनशक्ति पार्टी) के बारे में भी इसी तरह की ख़बरें आ रही थीं. इस बार बजट सत्र में भी अपनी (उस समय टीडीपी ने एनडीए नहीं छोड़ा था) और पराई (विपक्ष से टीएमसी आदि) सभी पार्टियों ने मिलकर संसद में सरकार के ख़िलाफ़ एकजुटता दिखाई थी. इसके बाद उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार की कुछ अहम लोक सभा सीटों पर हुए उपचुनावों में जब लगातार भाजपा-एनडीए प्रत्याशियों को हार मिली तब शायद भाजपा नेतृत्व सचेत हुआ.

हालांकि अभी कुछ कहना जल्दबाज़ी भी हो सकता है लेकिन अब तक के घटनाक्रम का निष्कर्ष यही है कि मोदी-शाह की जोड़ी को एनडीए में नीतीश कुमार जैसे नेता की ज़रूरत महसूस होने लगी है. इन तीनों नेताओं की अपनी-अपनी ख़ासियतें है. जैसे नरेंद्र मोदी बड़े जनाधार वाले नेता है. देश तो क्या दुनिया के अन्य हिस्सों में भी उनका अपना समर्थक वर्ग तैयार हो चुका है. वहीं अमित शाह एक कुशल रणनीतिकार के तौर पर ख़ुद को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित कर चुके हैं. रणनीतिकार भी इस तरह के जो सिर्फ जीत का लक्ष्य लेकर येन-केन-प्रकारेण उस तक पहुंचने की कोशिश करते हैं. लेकिन भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसे तमाम उदाहरण हैं जो साबित करते हैं कि सिर्फ बड़ा जनाधार और चाक-चौबंद रणनीति ही हमेशा जीत की गारंटी नहीं होती. बस यहीं नीतीश कुमार जैसे नेताओं की ज़रूरत पड़ती है.

नीतीश कुमार की ख़ासियत है उनका मृदुभाषी और संयमित होना. अपने साथ-साथ दूसरों की भी मर्यादा और गरिमा का ख़्याल रखना फिर चाहे वे विरोधी ही क्यों न हों. कुछेक अपवाद हो सकते हैं लेकिन उन्होंने बहुतायत अपने ऐसे ही आचार-व्यवहार का परिचय दिया है. यही उन्हें अन्य नेताओं से अलग करता है. उनकी यही ख़ासियत दूसरे दलों में उन्हें मोदी और शाह की तुलना में कहीं ज़्यादा स्वीकार्य भी बनाती है. और उनकी यही ख़ासियत 2019 में मोदी-शाह के लिए सबसे अधिक उपयोगी भी साबित हो सकती है. ख़ासतौर पर उस वक़्त जब केंद्र में सरकार बनाने के लिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह को दूसरे दलों की मदद की ज़रूरत आन पड़े. लिहाज़ा मौज़ूदा सियासी हालात को देखते हुए अगर यह कहा जाए कि दोनों ने नीतीश को साधना अभी से शुरू कर दिया है, तो ज़्यादा ग़लत भी नहीं होगा.

अब आती है बात विपक्ष की तो यहां सत्ता पक्ष की तुलना में फिलहाल तो किस्सा एकदम उल्टा दिख रहा है. लोक सभा में अविश्वास प्रस्ताव की क़वायद के बमुश्किल पखवाड़े भर बाद ही राज्य सभा के उपसभापति का चुनाव लगातार दूसरा ऐसा मौका था जहां विपक्ष बिखरा दिखा. जीत की बात तो दूर सभी पार्टियों में आपसी समन्वय भी नज़र नहीं आया. इसका प्रमाण इसी से मिलता है कि आप, पीडीपी और वाईएसआर कांग्रेस जैसी पार्टियों को सिर्फ इसलिए अपना रास्ता बदलना पड़ा क्योंकि कांग्रेस नेतृत्व ने उनसे संपर्क ही नहीं किया. और किया भी होगा तो शायद सम्मानजनक तरीके से नहीं किया होगा. आप के नेता और राज्य सभा सदस्य संजय सिंह ने तो कहा भी, ‘विपक्षी एकता की राह में कांग्रेस सबसे बड़ा रोड़ा है.’ फिर आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने इससे भी आगे जाकर हरियाणा की एक सभा ऐलान कर दिया, ‘हमारी पार्टी 2019 के लोक सभा चुनाव के दौरान विपक्षी गठबंधन हिस्सा नहीं बनेगी.’

यानी बीजेडी और टीआरएस जैसी पार्टियाें का तो छोड़ ही दें क्योंकि ये दल कांग्रेस से दूरी बनाने को ज़्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं. फिलहाल तो लग ये रहा है कि कांग्रेस अपने समर्थक या ऐसे हो सकने वाले दलों को ही साध कर नहीं रख पा रही है. इसीलिए उसके नेतृत्व में विपक्ष लगातार सत्ता पक्ष से परसेप्शन की लड़ाई हारते हुए भी दिख रहा है. यह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए भी चेतावनी जैसा है.

लेकिन क्या मोदी-शाह को नीतीश कुमार का साथ आसानी से मिल पाएगा?

इसका ज़वाब यक़ीनी तौर पर ‘नहीं’ ही हो सकता है. क्योंकि नीतीश के साथ नरेंद्र मोदी-अमित शाह की दोस्ती सहज-स्वाभाविक नहीं है और यह तथ्य स्थापित करने के लिए पिछले संदर्भों को याद दिलाने की भी ज़्यादा ज़रूरत नहीं है. लगभग विकल्पहीन सी स्थिति में यह राजनीतिक मज़बूरी के चलते लिया और दिया जा रहा सहयोग ज़्यादा है. इसीलिए इस साथ का आगे निभना 2019 के चुनाव परिणाम पर और उससे पहले बनने और बनाई जाने वाली परिस्थितियों पर ज़्यादा निर्भर करेगा. इसका प्रमाण राज्य सभा उपसभापति के चुनाव से ही सामने आया है. अगर इसमें एनडीए का उम्मीदवार जेडीयू से न होता तो परिणाम दूसरा भी हो सकता था. यानी कि दोनों का एक-दूसरे के साथ होना इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें इसकी कितनी जरूरत है और एक-दूसरे से क्या मिल रहा है.