हिन्दी साहित्यकार, साहित्य अकादेमी के भूतपूर्व अध्यक्ष और ‘दस्तावेज’ पत्रिका के संपादक ने अपनी पत्रिका ‘दस्तावेज 157’ में एक विस्तृत सम्पादकीय लिखा है. उस सिलसिले में अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए कुछ लम्बी कहानी कहना आवश्यक है:

1. पुरस्कार वापसी के किसी अभियान से मेरा कोई सम्बन्ध कभी नहीं था और न ऐसे किसी अभियान में मैंने भाग लिया; न कभी किसी लेखक को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पुरस्कार लौटाने का अनुरोध या इशारा किया. मैंने तो इण्डियन एक्सप्रेस के एक संवाददाता के यह कहने पर कि नयनतारा सहगल ने पुरस्कार वापस किया है, स्वतः स्फूर्त ढंग से स्वयं भी पुरस्कार लौटाने की बात कही थी. तब तक उदयप्रकाश पुरस्कार लौटा चुके थे. इन दोनों में से किसी से मेरी कोई बात इस बारे में नहीं हुई.

2. अगले दिन जब ख़बर छपी तो किसी उर्दू लेखक ने भी पुरस्कार लौटाने की घोषणा की जिन्हें मैं जानता भी नहीं था.

3. इसके दो दिनों बाद ही मैं फ्रांस और कनाडा चला गया और लगभग 16 दिन विदेश में ही था.

4. इस बीच भारत के लेखक-समुदाय के बीच क्या हुआ इसका मुझे पता नहीं था.

5. इससे पहले मैं उत्तर प्रदेश सरकार का ‘भारत भारती’ पुरस्कार लेने से इनकार कर चुका था तो इसलिए कि मायावती सरकार ने 70 के करीब पुरस्कारों के लिए अनुशंसित लेखकों को पुरस्कार देने का प्रस्ताव अकारण रद्द कर दिया था. श्री विश्वनाथ तिवारी ने स्वयं मुझे एक बरस पहले फ़ोन कर यह बताया था कि इस पुरस्कार की जूरी में वे थे. बाद में दलित छात्र रोहित वेमूला की आत्महत्या के बाद मैंने हैदराबाद विश्वविद्यालय की मानद डी.लिट् उपाधि भी लौटा दी.

6. असहिष्णुता के बारे में तब के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, उद्योगपति नारायण मूर्ति, रिजर्व बैंक के गवर्नर आदि ने उसके बढ़ने पर चिन्ता व्यक्त की थी.

7. उस समय भारत सरकार के वित्त मंत्री ने इस सिलसिले में यह कहा था कि कोई असहिष्णुता नहीं है, यह ‘मैन्युफ़ैक्चर्ड इनटालेरेन्स’ है.

8. इस तथाकथित अभियान में जल्दी ही 400 से अधिक चित्रकार-मूर्तिकार-कलाविद् आदि अपने आप जुड़ गये. 500 से अधिक वैज्ञानिकों ने एक लम्बे वक्तव्य पर हस्ताक्षर कर लेखकों की पहल का अनुमोदन किया.

9. मेरा श्री नरेन्द्र मोदी से कोई व्यक्तिगत परिचय नहीं है. वर्ष 2002 में गुजरात में हुए नरसंहार की विभीषिका से, जिसमें लगभग 2000 लोग मारे गये थे अधिकांशतः मुसलमान, उद्वेलित होकर मैंने एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय का कुलपति होते हुए दिल्ली में लेखकों-कलाकारों को एक जुट करने की पहल की थी. उसमें सैकड़ों लोग शामिल हुए थे और हमने राष्ट्रपति भवन जाकर मोदी सरकार को भंग करने का एक ज्ञापन दिया था.

बाद में महाश्वेता देवी, अपूर्वानन्द, के सच्चिदानन्दन आदि के साथ मैं बड़ोदरा गया था जहां डर के मारे हमारी बैठक में वहां के बुद्धिजीवी और कलाकार तक नहीं आये थे. हमने अपनी आंखों से गुजरात में फैली हत्‍यारी घृणा और भय फैलाती मानसिकता को देखा-महसूस किया था.

10. गुजरात की घटनाओं को लेकर लगभग 100 लेखकों-कलाकारों के संक्षिप्त वक्तव्य पुस्तकाकार प्रकाशित करने की एक योजना के लिए मैंने लेखकों-कलाकारों को लिखे पत्र में कहा था कि गुजरात में प्रशासन, पुलिस, संसद, अदालतें आदि सब विफल हो गए हैं. कुछ दिन बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने मेरे ही पत्र की प्रतिलिपि संलग्न करते हुए मुझसे सफ़ाई देने को कहा. मैंने यह स्पष्ट किया पत्र मैंने कुलपति के नाते नहीं एक लेखक के नाते लिखा है और वह मेरे निवास के पते से गया है. पर कुलपति सरकारी अधिकारी नहीं होता और उसे तथा अन्य अकादेमिक व्यक्तियों को अभिव्यक्ति की आज़ादी मिली हुई है. अगर ऐसा न होता तो तबके मानव संसाधन मंत्री इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भौतिकी के आचार्य रहते हुए भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष आदि कैसे रहते? इस पत्र के बाद कुछ आया तो नहीं पर विश्वविद्यालय के मामले मंत्रालय में बेवजह अटकने लगे.

11. विश्व कविता समारोह की अन्तर्कथा को जानने के लिए थोड़ा और पीछे जाना ज़रूरी है. पहले पहल इसका प्रस्ताव मैंने रवीन्द्रनाथ ठाकुर-150 की राष्ट्रीय समिति में किया था जिसे उसने मान लिया था. ललित कला अकादेमी अध्यक्ष होने के नाते मैं उसका पदेन सदस्य था. उसकी कार्यान्वयन समिति के अध्यक्ष श्री प्रणव मुखर्जी थे. इस समिति ने उसका बजट और अन्य ब्यौरे मुझसे मांगे जो मैंने भेज दिये. मैंने स्वयं यह कहा था कि इसका आयोजन साहित्य अकादेमी करे. उसके तब के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय ने मेरे कक्ष में आकर कहा कि उसका निर्देशन मुझे ही करना होगा. तब तिवारी जी उपाध्यक्ष थे. बहरहाल, आवश्यक बजट आदि न मिलने और अन्य कारणों से यह समारोह अन्ततः नहीं हो पाया.

12. 2013 में जब रवीन्द्रनाथ को नोबेल पुरस्कार मिलने की शताब्दी थी मैं रज़ा फ़ाउण्डेशन की ओर से अपने साहित्यप्रेमी मित्र सांसद देवी प्रसाद त्रिपाठी के साथ प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह से मिला. वे हमारे इस अवसर पर एक विश्व कविता समारोह करने पर तुरंत सहमत हुए: उन्होंने बजट पूछा और बताने पर बोले कि यह कोई समस्या नहीं होगा.

13. कुछ दिनों बाद भारत सरकार के संस्कृति सचिव का फ़ोन आया कि मंत्रालय यह समारोह साहित्य अकादेमी से कराना चाहेगा और वह रज़ा फ़ाउण्डेशन से मिलकर यह आयोजन करे. मैंने सहमति दी और उन्होंने यह भी कहा कि आयोजन समिति में रज़ा फ़ाउण्डेशन के प्रतिनिधि के रूप में मैं शामिल होऊं. ऐसी समिति बनी और उसकी पहली बैठक में अकादेमी के फ़ाउण्डेशन के सहयोग से आयोजन करने पर आपत्ति की गयी. मैंने यह स्पष्ट किया कि आयोजन का पूरा प्रस्ताव, उस पर सरकारी सहमति और उसके लिए बजट आवंटन रज़ा फ़ाउण्डेशन की पहल पर ही हुए हैं. यह भी कहा कि समारोह में आयोजन समिति के सदस्य कवि रूप में भाग न लें क्योंकि ऐसा करना नैतिक न होगा.

14. बहरहाल, चूंकि अकादेमी ने रज़ा फ़ाउण्डेशन का सहयोग उल्लिखित करने से इनकार किया, मैंने अपने और फ़ाउण्डेशन को उससे अलग कर लिया. पहले अकादेमी सैमसंग कंपनी के साथ पुरस्कार में सहर्ष सहयोग कर चुकी थी. यह कहना सरासर झूठ है कि मैंने अकादेमी पर कोई दबाव कहीं से डलवाया. मंत्रालय से मैंने अपने अलग होने कारण को स्पष्ट ज़रूर किया. अकादेमी ने जब समारोह में भाग लेनेवाले भारतीय कवियों की सूची अनुमोदित की तो उसमें आयोजन समिति के सभी कवियों सहित मेरा नाम भी था. मैंने इस अनैतिक निमंत्रण को अस्वीकार किया और ‘जनसत्ता’ में लेख लिखकर अपनी स्थिति स्पष्ट की.

15. यह याद दिलाना ज़रूरी है कि सभी तरह की सरकारों के आपत्तिजनक आचरण पर एक लेखक के नाते प्रतिकूल टिप्पणी करता रहा हूं. वे अब तीन ज़िल्दों में वाग्देवी से जल्दी ही ‘अपने समय में’, ‘समय के इर्दगिर्द’ आदि शीर्षकों से प्रकाशित होने जा रही हैं.

16. पिछले वर्ष चम्पारण सत्याग्रह शती के अवसर पर मैंने विश्व कविता समारोह करने का प्रस्ताव बिहार सरकार से निजी स्तर पर किया था. वह मान लिया गया. बाद में बिहार के कवियों की ज़रूरत से ज़्यादा शिरकत और सरकारी सुस्ती से क्षुब्ध होकर मैंने अपने को अलग कर लिया. और बाद में सरकार में फेर-बदल के कारण वह नहीं ही हो पाया.

17. इस बीच रज़ा फ़ाउण्डेशन ने यह नीति-निर्णय लिया कि हम किसी सरकार या कारपोरेट समुदाय से कोई मदद नहीं लेंगे. 2017 में हमने रज़ा कविता द्वैवार्षिकी शुरू की जो भारतीय कविता पर एकाग्र थी. 2019 में यह द्वैवार्षिकी एशियाई कविता पर केंद्रित होगी और 2021 में विश्व कविता पर.

18. श्री नरेंद्र मोदी और श्री विश्वनाथ प्रसाद तिवारी से मेरा कोई निजी द्वेष नहीं है: गंभीर असहमतियां हैं. तिवारी जी एक लेखक के रूप में यह मानने से चूक रहे हैं कि आज़ादी के बाद पहली बार देश में लेखकों की बात व्यापक स्तर पर सुनी गयी. तबके राष्ट्रपति ने कहा था कि ‘आप लोगों ने असहिष्णुता को राष्ट्रीय एजेण्डे पर लाने में सफलता प्राप्त की है.’

यह विचित्र और खेदजनक है कि एक लेखक, जो कि संयोगवश उस समय अकादेमी का अध्यक्ष भी था, मानने को तैयार नहीं है कि दूसरे लेखक बन्धुओं ने स्वतःस्फूर्त ढंग से अपने पुरस्कार लौटाये. वे ग़लत, सिरफिरे हो सकते हैं पर उनकी नीयत पर सन्देह करने का कोई आधार नहीं है. उसे राजनेताओं की तरह वह भी अभियान या सुनियोजित षड्यन्त्र मानता है. न कोई सूत्र था, न संचालन की ज़रूरत थी, न वह किया गया.

तिवारी जी की अध्यक्षता में अकादेमी ने, बिना किसी आधिकारिक दबाव के, स्वतःस्फूर्त ढंग से स्वच्छता जैसे अत्यन्त प्रासंगिक विषय पर परिसंवाद किये जिनमें प्राचीन और आधुनिक साहित्य में स्वच्छता पर गंभीर विचार-विमर्श किया गया होगा! ज़ाहिर है यह किसी स्वच्छता अभियान का हिस्सा नहीं था.

साम्प्रदायिक, धार्मिक, वैचारिक कट्टरता का मैं कम से कम 50 वर्षों से घोर विरोधी रहा हूँ. पर वफ़ादारी की भी कट्टरता होती है यह भी मानता हूं. मेरा किसी राजनैतिक दल से न कोई संबंध कभी था, न है, न कोई सम्पर्क ही.