भारत में पहली बोलती फिल्म ‘आलमआरा’ (14 मार्च, 1931) से ही फ़िल्म संगीत शुरू हुआ था. तब से लेकर अब तक बहुत से पुरुष संगीतकार हुए. कई मशहूर हुए तो कई ऐसे भी रहे जो एक या दो फ़िल्में में संगीत देकर नेपथ्य में चले गए. पर क्या आप जानते हैं कि बॉलीवुड में अब तक कितनी महिला संगीतकार हुई हैं? आपको हैरत होगी जानकार यह आंकड़ा दहाई तक भी नहीं पहुंचा है.

खैर, इस पर फिर कभी बात करेंगे. आज यानी 10 अगस्त को बॉलीवुड की पहली महिला संगीतकार सरस्वती देवी की पुण्यतिथि है. पहली इसलिए कि जद्दनबाई (नर्गिस की मां) ने सिर्फ एकाध फिल्मों में ही संगीत दिया था. सरस्वती देवी लगभग 10 सालों तक सिनेमा में छाई रहीं. आप बहुत कम जानते होंगे इनके बारे में तो ‘मैं बन की चिड़िया बन के बन में बोलूं रे’ गाना के संगीतकार के तौर पर आप इन्हें जान सकते हैं. यह फिल्म 1936 में आई ‘अछूत कन्या’ का गाना है.

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उस दौर के गीत सरल थे सो उनसे सरस्वती देवी की संगीत विलक्षणता का अंदाजा कम को ही होगा. ‘लता सुर गाथा’ में लता मंगेशकर ने उनके बारे कहा है, ‘सरस्वती देवी बड़े कद्दावर ढंग की पारसी महिला थीं. बातचीत में अत्यंत शालीन और गरिमा से भरी हुईं. उनकी उपस्थिति को ठीक से पहचाना जाता था...पंकज मलिक और आरसी बोराल के ज़माने में ही सरस्वती देवी का संगीत बहुत अच्छी से स्थापित हो चुका था. उनको संगीत की गहरी समझ थी. वो जो भी काम करतीं, उस काम के बारे में उनको विस्तार से मालूम होता था. ये उनका कमाल था कि शास्त्रीय राग आधारित गाने क्लिष्ट नहीं लगते थे.

‘जवानी की हवा’ (1935) से सरस्वती देवी का फ़िल्मी सफ़र शुरू होता है. इस फिल्म में अशोक कुमार से इन्होंने एक गीत गवाया था, ‘कोई हमदम न रहा, कोई सहारा न रहा’. बाद में किशोर कुमार ने ‘झुमरू’ फिल्म में लगभग इसी धुन के साथ रचकर और गाकर इसे अमर कर दिया था.

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बहुत कम लोगों को मालूम है कि महान किशोर कुमार और विलक्षण संगीतकार मदन मोहन सरस्वती देवी के कोरस में गाते थे! एक और बड़ा प्रसिद्ध गाना ‘चना जोर गरम बाबू में लाया मजेदार’ (फ़िल्म बंधन, साल 1940) में सबसे पहले इन्होंने ही कंपोज़ किया था. क़माल देखिये इस गाने को भी किशोर कुमार ने ही फ़िल्म ‘क्रांति’(1981) में गाया था . हालांकि, धुन और बोल कुछ बदल दिए गए थे.

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सरस्वती देवी 1912 में एक पारसी परिवार में जन्मी थीं. तब उनका नाम था ख़ुर्शीद मिनोचर होमजी. वे और उनकी दूसरी बहनें ‘होमजी सिस्टर्स’ के नाम से लखनऊ में ऑर्केस्ट्रा पार्टी चलाती थीं और ख़ासी मशहूर भी थीं. संगीत की शिक्षा उन्हें महान संगीताचार्य विष्णुनारायण भातखंडे से मिली थी. उन्होंने पेशेवर तौर पर गाना तब शुरू किया था जब 1927 में इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी के रेडियो स्टेशन की शुरुआत हुई. वहां ये ऑर्गन बजाकर गाती थीं. किस्मत का पहिया यूं घूमा कि 1934 के आसपास वे एक बार थियोसोफ़िकल सोसाइटी के कार्यक्रम में बम्बई आईं और फिर यहीं की हो कर रह गयीं. किसी ने उनकी मुलाकात हिमांशु राय से करवा दी. बस फिर क्या था? पारखी हिंमाशु राय ने तुरंत ही उन्हें अपने बॉम्बे टॉकीज़ से जुड़ने का ऑफर दे डाला, जिससे वे इन्कार नहीं कर पाईं.

पंकज राग ‘धुनों की यात्रा’ में लिखते हैं कि पारसी समाज को उनका फ़िल्मों में गीत संगीत देना पसंद नहीं आया. एक बार लोगों ने उन्हें हिमांशु राय की कार में से खींचकर बाहर निकाल लिया. बात बिगड़ती इसके पहले राय ने भीड़ से कहा कि वे उनकी पत्नी देविका रानी हैं. बाद की मुश्किलों से बचने के लिए ख़ुर्शीद मिनोचर होमजी को राय साहब ने सरस्वती देवी बना दिया. उनकी मुश्किलें तब और बढ गईं जब ‘जवानी की हवा’ का पारसी समुदाय ने जमकर विरोध किया था. तब बॉम्बे टॉकीज़ के ट्रस्ट के पारसी सदस्यों ने मामला शांत करवाया. फिर भी इस फिल्म के शोज़ पुलिस की निगरानी में चलाये जाते थे.

उस दौर में अभिनेता खुद अपने गीत गाते थे. अशोक कुमार और देविका रानी बॉम्बे टॉकीज़ के परमानेंट एक्टर थे. इनको सुरों से सरस्वती देवी ने ही मिलवाया था. इन दोनों की सुरों पर पकड़ कम ही थी, लिहाज़ा, सरस्वती देवी ने इनके गले की रेंज को ध्यान में रखकर गीतों को कंपोज़ किया.

पार्श्वगायन शुरू करने वाले पहले संगीतकार थे आरसी बोराल. पर उन्होंने एक्टरों से ही स्टूडियो में गवाने की परम्परा शुरू की थी. फ़िल्म, ‘जवानी की हवा’ में पहली बार हिमांशु राय के कहने पर अभिनेत्री चंद्रप्रभा के लिए सरस्वती देवी ने गाना गाकर सही मायनों में पार्श्वगायन की शुरुआत की थी. बॉम्बे टॉकीज़ की उस दौर की फ़िल्में जैसे ‘इज्ज़त’, ‘जीवन प्रभात’ (दोनों 1937), ‘वचन’(1938) और ‘कंगन’(1939) का संगीत काफ़ी लोकप्रिय हुआ. 1940 में आई ‘बंधन’ फ़िल्म ने उन्हें स्थापित कर दिया. ‘झूला’(1941) की सफलता के पीछे सरस्वती देवी के संगीत का कमाल था. इस फ़िल्म का गीत ‘मैं तो दिल्ली से दुल्हन लाया रे’ उस वक़्त बैंड बाजे वाले ख़ूब बजाते थे. इनके द्वारा गीतों में कोरस को भी लोगों ने खूब पसंद किया था. जिस तरह गाने के बीच में ‘पॉज’(विराम) देना सज्जाद हुसैन का सिग्नेचर स्टाइल था, कोरस ने लगभग वही काम सरस्वती देवी के लिए किया.

चालीस के दशक में बॉम्बे टॉकीज़ का विघटन शुरू हुआ और सरस्वती देवी के लिए वहां काम करना मुश्किल हो गया. इसे छोड़कर उन्होंने सोहराब मोदी के मिनर्वा मूवीटोन के साथ काम करना शुरू किया. पर यहां उन्हें वह आजादी नहीं मिली जो हिमांशु राय ने अपने स्टूडियो में उन्हें दी थी. सोहराब मोदी की फ़िल्में जैसे ‘भक्त रैदास’, ‘पृथ्वीवल्लभ’( दोनों 1943) और ‘डॉ कुमार’(1944) के गीतों को कोई ख़ास सफलता नहीं मिली. मिर्नवा मूवीटोन से हटकर फ़िल्म ‘आम्रपाली’(1945) के गीतों ने दोबारा सरस्वती देवी को सफलता दिलाई. पर ऐसा कह सकते हैं कि जो मुक़ाम उन्हें बॉम्बे टॉकीज़ के साथ जुड़कर मिला था, वह अन्य कहीं नहीं मिल पाया.

लता मंगेशकर के साथ उन्होंने पहली और आख़िरी बार ‘उषा हरण’(1949) में काम किया था. सुर सम्राज्ञी का मानना है कि सरस्वती देवी ने संगीत की कई बारीकियों से उन्हें रूबरू कराया था.

संगीत के बदलते आयाम और मिज़ाज की वजह से धीरे-धीरे सरस्वती देवी को काम मिलना कम होता गया और अंततः उन्होंने फ़िल्मों से संन्यास ले लिया. 1969 में हुए एक हादसे में उनका पैर टूट गया था. धीरे-धीरे उनकी सेहत गिरती गई और 10 अगस्त, 1978 को उनकी मृत्यु हो गयी. पंकज राग लिखते हैं, ‘जब-जब भी फ़िल्म इतिहास की बात होती है और बॉम्बे टॉकीज़ के स्वर्ण युग की बात की जाती है, तो सरस्वती देवी के ‘मैं बन की चिड़िया’ और ‘न जाने किधर आज मेरी नाव चली रे’ की सीधी-सादी प्यारी धुनों की याद आ जाती है.’