निर्देशक : कमल हासन

लेखक : कमल हासन, अतुल तिवारी

कलाकार : कमल हासन, पूजा कुमार, राहुल बोस, जयदीप अहलावत, शेखर कपूर, वहीदा रहमान, अनंत महादेवन

रेटिंग : 1.5/5

2013 में आई ‘विश्वरूप’ अजीब फिल्म थी. इंटरवल से पहले वाला हिस्सा इस कदर दर्शनीय था कि जैसे कोई सुघड़ हॉलीवुड फिल्म देख रहे हों. बेहतरीन सिनेमेटोग्राफी वाली एक बढ़िया एस्पियोनाज (Espionage) थ्रिलर , जिसके केंद्र में इस्लामिक आतंकवाद, अफगानिस्तान और लादेन वाली उस वक्त की वैश्विक थीम थी और जिसकी प्रोडक्शन गुणवत्ता अमेरिकी फिल्मों वाली छाप लिए थी.

लेकिन फिर लघु-शंकाओं के समाधान के बाद शुरू हुआ दूसरा हिस्सा खराब लेखन, छोटी-मोटी घटनाओं के लिए रचे गए बेहद लंबे-लंबे उबाऊ सीक्वेंस और अहम भूमिकाओं में सस्ते अमेरिकी अभिनेताओं को लेने की वजह से निराशाजनक साबित हुआ था. क्लाइमेक्स तो निहायत ही हास्यास्पद था, जिसमें एक डर्टी बॉम्ब के ऊपर माइक्रोवेव ओवन को उल्टा रखकर भरेपूरे शहर को तबाह कर देने वाले रेडियोएक्टिव अटैक का खतरा टाल दिया गया था! नायकत्व फुस्स हो गया था, ओवन हिट. इसे देखकर न हंसी आई थी न रोना, बस आघात पहुंचा था.

रिलीज से पहले इस फिल्म को लेकर काफी विवाद भी हुआ था. इसे मुसलमानों के प्रति असंवेदनशील बताया गया, जो कि ये नहीं थी. इसलिए रिलीज के वक्त इसे ज्यादातर समीक्षकों ने एक अच्छी फिल्म करार दिया, जबकि ऐसा करना उस वक्त अकेले लड़ाई लड़ रहे कमल हासन के प्रति सहानुभूति दिखाना ज्यादा था. सही मायनों में ‘विश्वरूप’ ‘औसत से बेहतर’ और ‘अच्छी’ के बीच झूलती ऐसी फिल्म थी जिसमें बहुत कुछ काबिले-तारीफ था, लेकिन संपूर्णता में उसे बढ़िया फिल्म का दर्जा नहीं दिया जा सकता था.

पांच साल बाद 2018 में रिलीज हो रही ‘विश्वरूप 2’ को ऐसी कोई सहानुभूति नहीं नसीब होने वाली. क्योंकि अच्छी कोशिशों के प्रति सहानुभूति दिखाई जाती है, जबकि यह सीक्वल तो जैसे पिछली रात के बचे-खुचे उबले चावलों से बिरयानी बनने की चाह रखती है. फिल्म शुरू वहीं से होती है जहां पहली खत्म हुई थी (इसलिए आपको पहली देखे बिना दूसरी नहीं देखनी चाहिए) लेकिन इस बार इसके पास कोई लक्ष्य नहीं है. बस कि जैसे पिछली फिल्म की कहानी के छूटे हुए सिरों को समेटने के लिए इसे बनाया गया है और किताबों में जो बची कहानी उपसंहार (एपीलॉग) में कहकर खत्म कर दी जाती है, ‘विश्वरूप 2’ उसे पांच साल बाद दो घंटे 24 मिनट तक कहती रहती है.

यहां मुख्य कहानी वही है, यानी कि नायक विजाम अहमद काश्मीरी (हासन) और आतंकी-जेहादी ओमार कुरैशी (राहुल बोस) के बीच की जंग. पहली फिल्म दिखा चुकी थी कि कमल हासन का रॉ एजेंट किरदार अल-कायदा के जेहादियों को ट्रेनिंग देने के बहाने उनकी खुफिया जानकारियां इकट्ठा करने के लिए पाकिस्तान और अफगानिस्तान जाता है और राहुल बोस का आतंकी किरदार उसे अपना दोस्त, अपना भाई मान लेता है. बाद में सच पता चलने पर तिलमिलाया खलनायक बदला लेने निकलता है और उसके लिए जब ढाई घंटे की एक फिल्म छोटी पड़ जाती है तो ‘विश्वरूप 2’ भी बनाई जाती है!

बदला लेने के लिए आतंकी ओमार इस बार हिंदुस्तान के शहरों को उड़ाने की योजना बनाता है – पहले न्यूयॉर्क को उड़ाने की बनाई थी – और इस मुख्य घटना तक पहुंचने से पहले ‘विश्वरूप 2’ अथाह लंबा बिल्ड-अप लेती है जो बाद में चलकर तर्कसंगत नहीं साबित होता. कोई अपना ही हिंदुस्तानियों को दगा देता है, हासन साहब छातीपीट देशभक्ति वाले संवाद बोलते हैं, एक समंदर में बमों का खजाना ढूंढा जाता है, नायक के रॉ में शामिल होने से पहले की जिंदगी फ्लैशबैक में सामने आती है, उसकी मां से मार्मिक मुलाकात होती है, प्यार के दो-तीन गीत गाए जाते हैं, पिछली फिल्मों की दिलचस्प हीरोइनें इस बार तूतू-मैंमैं और कुछ खास नहीं करने में उलझी रहती हैं, और इन सबके बीच देखने वाले को इस फिल्म का मकसद समझ नहीं आता.

पहली फिल्म का मकसद था वैश्विक आतंकवाद पर बात करना, इस्लाम के अलग-अलग चेहरों पर रोशनी डालना, अमेरिका की भूमिका की आलोचना करना और 9/11 के बाद की बदली दुनिया का चित्रण करना. कमल हासन न सिर्फ एक बुद्धिमान अभिनेता हैं, बल्कि हमेशा से ही बुद्धिमान निर्देशक भी कहलाए जाते हैं और इसीलिए उन्होंने पहली फिल्म में ये सभी थीम्स बेहद परिपक्वता से कहानी में पिरोई थीं.

कई सारी सटल चीजों के अलावा उस फिल्म के दो सीक्वेंस खास करके याद आते हैं जिसमें से एक में जेहादी बाप राहुल बोस और उसका छोटा बेटा हाथ से पिस्तौल बनाकर नकली फायर-फायर खेलते हैं और धीरे-धीरे पूरा घर इस खेल में शामिल हो जाता है, ठहाके लगाता है. फिर कैमरा बच्चे के पीछे-पीछे बाहर निकल आता है जहां (अफगानिस्तान के एक गांव में) सभी बच्चे हाथों को पिस्तौल बना फायर-फायर ही खेल रहे होते हैं. इसके बाद कट टू सीन वहां पहुंचता है जहां अभी-अभी बचपन त्याग कर जेहादी बने नौजवान बंदूक चलाने का अभ्यास कर रहे होते हैं. इस एक लंबे सीक्वेंस से कमल हासन साहब ने बच्चों तक को न बख्शने वाले जिहाद और आतंकवाद की ऐसी मार्मिक विजुअल तस्वीर पेश की थी कि उसकी यादें पांच साल बाद भी जेहन में तरोताजा हैं.

दूसरे सीन में जेहादी खलनायक का मासूम बेटा झूला झूलने से मना कर देता है और उसी वक्त एक नया नौजवान जेहादी झूले पर खुद बैठकर कमल हासन से कहता है कि आप तो मुझे झुलाओ. झूलते हुए उसके चेहरे पर ऐसा असीम आनंद उतर आता है कि आपको वजह बूझते नहीं बनती. कई सीन बाद यही नौजवान, या कहें थोड़ा बड़ा बच्चा, मानव बम बनकर खुद को अमेरिकी कैंप के सामने उड़ा लेता है. उसका झूला झूलता चेहरा रह-रहकर दर्शकों के सामने आता है.

‘विश्वरूप 2’ से यह सब गायब है. खराब पटकथा, न कोई फलसफा, और न ही मसाला थ्रिलर फिल्मों वाला ही रोमांच. पहली फिल्म में जहां कमल हासन ने कत्थक डांसर बनकर जनाना भाव-भंगिमाओं को बेहतरीन अभिव्यक्ति दी थी, अफगानिस्तान वाले सेगमेंट में चुस्त-दुरुस्त आतंकी का रूप धर कर बेहिसाब रोमांचित किया था, और वर्तमान समय में स्लीपर एजेंट बनकर खुद को थोड़ा मोटापा देकर जो यथार्थवाद अपने किरदार को दिया था वो लाजवाब था. ‘विश्वरूप 2’ में कई रूपों वाले कमल हासन न मिलकर ज्यादातर वक्त वर्तमान समय का रॉ एजेंट हमें मिलता है जो पिछली फिल्म जितना प्रभावशाली बिलकुल भी नहीं रहता. उनके अभिनय में खोट निकालने की हमारी औकात नहीं है, वो इतने महान अभिनेता हैं, इसलिए बस इतना कहकर हम खुद को रोक लेना चाहते हैं कि उनकी अगली फिल्म ‘इंडियन 2’ का इंतजार रहेगा.

‘विश्वरूप 2’ एक मायने में ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की तरह भी है. जैसे जीओडब्लू एक ही फिल्म थी लेकिन कुछ हफ्तों के अंतराल में दो भागों में रिलीज हुई थी, वैसे ही ‘विश्वरूप’ और ‘विश्वरूप 2’ असल में एक ही फिल्म है जो पांच साल के अंतराल के बाद दो भागों में रिलीज हुई है. या तो कमल हासन साहब को चुस्त एडीटिंग का साथ लेकर दोनों भागों को मिलाकर एक ही दर्शनीय फिल्म बनानी थी, या फिर दोनों भागों को आसपास रिलीज करना था.

क्योंकि पांच साल बाद आंतकी ओमार और नायक विजाम काश्मीरी के बीच की दुश्मनी अपनी धार खो चुकी है और अफगानिस्तान वाले लाजवाब हिस्से के लाख फ्लैशबैक दिखाने के बाद भी उसका वह इम्पेक्ट दर्शकों पर नहीं पड़ता जो पहली वाली फिल्म में पुरजोर पड़ा था.

कहना न होगा, बहुत देर कर दी जनाब ने आते-आते!