हाल में मद्रास हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया. उसने कहा कि एकल मांओं को बच्चे के जन्म के पंजीकरण या किसी अन्य मौके पर पिता का नाम बताने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. मामला यह था कि मद्रास की एक महिला ने तलाक के बाद एक वीर्यदानकर्ता की मदद से गर्भधारण किया था. अधिकारियों ने बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र में वीर्यदानकर्ता को बतौर पिता दर्ज किया, जिसे महिला ने हटाने की अपील की. लेकिन स्वास्थ्य अधिकारी ने यह कहकर उनकी अपील ठुकरा दी कि जन्मप्रमाणत्र में सिर्फ पिता के नाम में बदलाव किया जा सकता है, उसे हटाया नहीं जा सकता. तब महिला ने इसके खिलाफ अदालत में अपील की जहां उसके हक में फैसला सुनाया गया.

यह फैसला जिन एकल मांओं पर लागू होता है उनमें मुख्य रूप से विधवा, तलाकशुदा, परित्यक्ता और अविवाहित मांएं आती हैं. हालांकि इस बात के कोई स्पष्ट आंकड़े नहीं हैं कि इस समय हमारे देश में कितनी एकल मांएं हैं. लेकिन देश में बढ़ते एकल महिलाओं के आंकड़े बढ़ती हुई एकल मांओं की संख्या की तरफ स्पष्ट संकेत करते हैं. पिछले एक दशक में भारत में एकल महिलाओं की संख्या में लगभग 39 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई है. हमारे समाज में वैसे तो कैसी भी एकल महिला को, लेकिन खासतौर से अविवाहित एकल मांओं को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता. इसलिए समाज का रवैया भी उनके प्रति बहुत सहयोगी नहीं रहता. यहां हम उन कारणों को जानने की कोशिश कर रहे हैं जिनके चलते समाज में एकल मांओं की संख्या बढ़ती जा रही है.

बढ़ते तलाक

हाल के समय में तलाक के मामले पूरी दुनिया में बढ़ रहे हैं. भारत भी इसका अपवाद नहीं. तलाक के बाद ज्यादातर मामलों में बच्चे मां के पास ही रहते हैं. एक तो मांएं खुद भी बच्चों को अपने साथ ले जाने के लिए ज्यादा प्रतिबद्ध रहती हैं. दूसरा अदालतें भी इस मामले में महिलाओं के पक्ष में फैसला देती हैं. तीसरा पुरुष अक्सर ही इस बात को लेकर बहुत आश्वस्त और आत्मविश्वासी नहीं होते, कि वे नौकर या परिवार वालों की मदद के साथ बिन मां के भी बच्चे पाल लेंगे. आज भारत में कुल विवाहित आबादी का 0.24 प्रतिशत तलाकशुदा है. इसमें हमेशा के लिए एक-दूसरे से दूर रह रहे पति-पत्नी की संख्या तो तलाकशुदा महिलाओं की अपेक्षा लगभग तीन गुना ज्यादा है. कुल विवाहित लोगों में 0.61 फीसदी अलग हो गए जोड़े हैं. खासतौर से बड़े शहरों में तलाक की संख्या के बढ़ने से एकल मांओं की संख्या में वृद्धि होती जा रही है. बढ़ते विवाहेतर संबंध, दहेज की मांग को लेकर पत्नी के साथ हिंसा और परस्पर तालमेल का अभाव इसके मुख्य कारण हैं.

अविवाहित महिलाओं की बढ़ती संख्या

देश में अविवाहित महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. 2011 की जनगणना के मुताबिक 2001 में जहां कुल महिला आबादी की पांच करोड़ 12 लाख महिलाएं एकल थीं, वहीं 2011 में यह संख्या बढ़कर सात करोड़ 14 लाख हो गई. बहुत सारी लड़कियां शादी के साथ मिलने वाली एकतरफा जिम्मेदारियों को ढोने में कोई दिलचस्पी नहीं रखतीं, इसलिए वे शादी नहीं करतीं. इस बारे में समाज विज्ञानियों का मानना है कि महिलाएं विवाह संस्था में कर्तव्यों को निभाने के साथ-साथ अब बराबरी, सम्मान और अधिकार की मांग कर रही हैं. लेकिन लड़कों की सामंती सोच उन्हें महिलाओं के साथ मानवीय व्यवहार करने से रोकती है. इस कारण लड़कियां अकेले रहने का निर्णय लेती हैं. आर्थिक रूप से संपन्न कुछ लड़कियां वीर्यदानकर्ता की मदद से बच्चों को जन्म देने का विकल्प भी अपना रही हैं. ऐसी महिलाएं अकेले ही बच्चों की जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार रहती हैं.

बच्चों को गोद लेने के चलन में वृद्धि

2015 में भारत सरकार ने बच्चा गोद लेने के लिए ऑनलाइन रजिस्टेशन अनिवार्य कर दिया था. उसके बाद से बच्चे गोद लेने के लिए 412 एकल मांओं ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अधीन आने वाली बच्चा गोद देने वाली संस्था में अपना रजिस्ट्रेशन कराया. 2015 में जहां 75 एकल मांओं ने बच्चे गोद लिए, वहीं 2016 में इनकी संख्या बढ़कर 93 हो गई. भारत में एकल महिलाओं की संख्या देखते हुए, बच्चा गोद लेने वाली महिलाओं की यह संख्या बहुत ज्यादा नहीं लगती. लेकिन यह एकल महिलाओं द्वारा अपनाया गया बिल्कुल नया चलन है, जो कि आने वाले सालों में बढ़ने वाला है. गौर से देखा जाए तो मुख्य रूप से तीन कारण हैं जो आज के समय में एकल मांओं के लिए सहयोगी बन रहे हैं

1. नौकरी के पहले से ज्यादा विकल्प

आज के समय में महिलाओं के लिए नौकरी करने के विकल्प बीते दो-तीन दशकों की अपेक्षा कहीं ज्यादा हैं. न सिर्फ उच्च शिक्षित महिलाओं के लिए, बल्कि तकनीकी रूप से कुशल और अकुशल हर तरह की महिलाओं के लिए कमाई करने के विकल्प बढ़े हैं. अपनी आर्थिक आजादी के दम पर एकल महिलाएं बच्चे गोद लेने जैसे विकल्प भी अपनाने लगी हैं. साथ ही उनमें यह आत्मविश्वास भी आ गया है कि वे अकेले अपने दम पर बच्चों को पाल सकती हैं. आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के कारण वे किसी भी बारे में निर्णय लेने और उन्हें पूरा करने के लिए स्वतंत्र हैं. आर्थिक आजादी के कारण ही महिलाएं किसी भी अनचाही चीज को मना करने और मनचाही चीज को पूरा करने के लिए ज्यादा सख्ती से निर्णय ले पाती हैं. इस स्थिति उन्हें बच्चे गोद लेने जैसा निर्णय करने का हक दिया है. साथ ही बिना पुरुष वाले परिवार की मुखिया बनने का सुख भी दिया है.

2. तकनीक से मिलती मदद

फोन और इंटरनेट ने रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी बहुत सारी चीजें काफी आसान की हैं. मसलन बिजली, पानी या किसी भी चीज के बिल ऑनलाइन ही भरे जा सकते हैं. जिसके चलते अकेले लाइन में लगने और बहुत सारी जगहों के चक्कर काटने की बजाए, एकल मांएं घर या ऑफिस में बैठे बड़ी ही आसानी ये काम निपटा सकती हैं. डॉक्टर से अपॉइंटमेंट या शॉपिंग जैसी चीजें भी घर बैठे हो जाती हैं. इमरजेंसी में किसी को अपने पास बुलाने के लिए फोन का बहुत बड़ा सहारा है. फोन पर ऑर्डर करने से रसोई के सामान, फल, सब्जी, घर की तमाम चीजों से लेकर दवाई तक घर बैठे आ जाती हैं. जिससे हर बार किसी छोटी-बड़ी चीज के लिए खुद नहीं भागना पड़ता. इन सब तकनीकी सुविधाओं ने एकल मांओं को बच्चे पालने में बहुत सहयोग किया है, क्योंकि अब वे अकेले ही बहुत सारी चीजें मैनेज कर सकती हैं.

3. अदालतों द्वारा एकल मांओं के हक में लिए गए निर्णय

समय-समय पर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा एकल मांओं के हक में लिए गए निर्णयों ने एकल मांओं के जीवन को सहज बनाने में बेहद अहम भूमिका निभाई है. इस मामले 2015 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिया गया यह निर्णय बेहद अहम था कि अविवाहित या विवाहित एकल मांएं अपने बच्चों की इकलौती कानूनी संरक्षक या लीगल गार्जियन हैं. उन्हें का बच्चों के जैविक पिता का नाम बताने को बाध्य नहीं किया जा सकता. अदालत का कहना था कि एकल मांओं को अपने बच्चे के लिए ऐसे पिताओं की कोई जरूरत नहीं है जिन्हें बच्चे की परवरिश की कोई परवाह नहीं.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने देश की विवाहित/अविवाहित मांओं को पहली बार बिना पुरुष के नाम के भी समाज में सम्मान से जीने का हक दिया. इसी तरह मद्रास हाई कोर्ट का ताजा फैसला भी पूर्व में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एकल मांओं के हक में लिए गए फैसले की अगली कड़ी के तौर पर दिखता है. समय-समय पर अदालतों द्वारा किए गए इन फैसलों ने एकल मांओं की चुनौतियों को तो कम किया ही है, उनके प्रति समाज की मानसिकता को बदलने की जमीन तैयार करने का काम भी किया है.

नि:संदेह इन तमाम तरह की सुविधाओं और फैसलों के बावजूद अकेले अपने दम पर बच्चों को पालना एकल मांओं के लिए अब भी बहुत बड़ी चुनौती है. लेकिन समाज के अन्य क्षेत्रों की तरह वे इस चुनौती को भी सहर्ष स्वीकार कर रही हैं और उस पर खरी उतर रही हैं.