यों तो हर समय कुछ यथार्थ कुछ अतियथार्थ, कुछ सच कुछ झूठ, कुछ वास्तविक कुछ मायावी होता है. पर हमारा समय कुछ अधिक ही अतियथार्थ, झूठ से घिरा हुआ और मायावी है. चूंकि मनुष्य मटमैले होते हैं. उनका किया-धरा भी मटमैला होता है, उजला-साफ़ होने की ईमानदार आकांक्षा के बावजूद. पर इधर सब कुछ मटमैला नहीं, सिर्फ़ मैला होने लगा है. ‘स्वच्छ’ समय में हम अनेक तरह की गंदगियों से घिरे गये हैं. उनमें से प्रायः हरेक हमारी अपनी रचना है. हम अगर अपनी ही करतूतों के शिकार हैं तो दोष किसी और तो नहीं दिया जा सकता. हमें शायद खुद पता नहीं था कि हम कितनी गंदगी उपजा-फैला सकते हैं. अच्छे दिन भले न आए हों, मैले दिन ज़रूर आ गए हैं.

धर्म के नाम पर या तो निरे अनुष्ठान या घोर अधर्म धड़ल्ले से हर रोज़, हर कहीं हो रहा है और हमारे धर्मों के रक्षक, व्याख्याकार आदि चुप्पी साधे बैठे हैं. जैसे यह उनका नहीं किसी और का (इन दिनों ज़्यादातर छुटभैये राजनेताओं और सरासर गुंडों का) मामला है. लोकतंत्र के नाम पर बहुसंख्यकवाद हर दिन स्वतंत्रता-समता-न्याय की खिल्ली उड़ा रहा है, जबकि ये हमारे संविधान का मूलाधार हैं और संविधान के प्रति वफ़ादारी की शपथ लिए लाखों लोग, कार्मिक मुदित मन चुपचाप यह नौटंकी देख रहे हैं. मानो कि यह कुछ निठल्ले बुद्धिजीवियों का मामला है. भाषा में गाली-गलौज भोंथरापन आम है और लेखक लोग चुपचाप बिसूर रहे हैं, मानो कि भाषा को बचाने का काम कोई और करेगा, उन्हें तो अपनी जगह भर बचानी है बिना यह समझे कि भाषा पर हमला साहित्य और उसकी बुनियादी ज़मीन पर हमला है.

हर दिन ‘दूसरे’ गढ़े जा रहे हैं, उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है, देशनिकाले की धमकियां दी जा रही हैं और हम आत्मनिष्ठ हैं कि दूसरों से हमें क्या लेना-देना, वे अपनी रक्षा स्वयं करें मानो कि दूसरों के बिना हमारी सभ्यता बच सकती है. हर दिन, हर पंद्रह मिनट में एक दलित के विरुद्ध कोई अपराध होता है और सवर्ण मुतमईन हैं कि उनकी जाति को कोई आंच नहीं आएगी, मानो कि एक दिन जब उन पर हमला होगा तो कोई बचाने नहीं आयेगा यह अहसास उन्हें है ही नहीं.

स्त्रियों के साथ गुस्ताख़ी-बेअदबी. बलात्कार के मामलों में बच्ची से लेकर बूढ़ी तक शिकार हो रही हैं और ज़्यादातर पुरुष चुप हैं कि उनकी मां-बहनें और पत्नियां तो सुरक्षित हैं, मानो कि यह विकराल रूप धरती प्रवृत्ति आगे सबको अपनी लपेट में नहीं लेगी. झूठ शिखर से धड़ल्ले से दिन में पांच बार तक बोला जा रहा है और सत्यवादी मौन हैं. मानो उनका सच अप्रभावित रहेगा और दुनिया के झूठ की ज़िम्मेदारी उनकी नहीं है. जब बाज़ार में सिर्फ़ झूठ ही बिकेगा-चलेगा तो सच को दो कौड़ी में भी कौन पूछेगा!

सांस्कृतिक अंतःकरण

अब लगभग सारी राजनीति और विशेषतः सत्तारूढ़ राजनीति किसी तरह के अंतःकरण होने का कोई प्रमाण नहीं देती. तब लगभग सभी धर्म, विशेषतः बहुसंख्यक हिंदू धर्म किसी तरह के अन्तःकरण से परिचालित होने से इनकार कर रहे हैं. जब अधिकांश मीडिया गोदी मीडिया होने के कारण अंतःकरण की आवाज़ न उठाता है और न किन्‍हीं आवाज़ों को कोई जगह देता है. जब मध्यवर्ग महत्वाकांक्षा के नाम पर लूटपाट की मानसिकता से ग्रस्त है और हिंसा-हत्या-अपराध से उसे कोई संकोच नहीं जान पड़ता तब क्या सांस्कृतिक अंतःकरण जैसी कोई चीज़ है या उसकी अवधारणा या कल्पना की जा सकती है? यह कल्पना उन सभी कल्पनाओं की तरह निराधार लग सकती है जो बाद में सच्चाई में बदल गयीं. सवाल मैंने पटना में इप्टा की 75 जयंती के सिलसिले में आयोजित एक व्याख्यान में उठाया जिसका शीर्षक था- ‘सांस्कृतिक अंतःकरण का आयतन’.

यों तो आधुनिक समय में राजनीति और संस्कृति के बीच अंतर बारहा धुंधलाता रहा है. इस समय उसके धुंधलाने की बड़ी वजह यह है कि बहुत सारा संस्कृति के नाम पर हो रहा है और उसे राजनैतिक या धार्मिक कहकर छोड़ा नहीं जा सकता. जो भारत धड़ल्ले से बनाया जा रहा है वह हिंसक-धर्मांध-जातिग्रस्त-सांप्रदायिक भारत है. नया भारत हर दिन नये ‘दूसरे’ गढ़ रहा है. यह झूठ-हिंसा-हत्या-अन्याय में पगा भारत है. अपनी परंपरा, ज्ञान और विवेक को भूलता विस्मृतिग्रस्त भारत बन रहा है. महाजनी सभ्यता के सामने सेल्फ़ी लेता भारत, सोच-विचार से दूर सिर्फ़ देखता-दिखाता भारत, टेक्नालजी का प्रयोग कर मानवविरोधी, संस्कृतिविरोधी स्त्री-दलित-अल्पसंख्यक विरोधी वृत्तियों को पोसने-बढ़ाने में लगा भारत. संस्कृति और धर्मों को निरे अनुष्ठानों में घटाने में जुटा भारत, अपनी संस्थाओं को बेरहमी से तोड़ता भारत, असहमति-विरोध-प्रतिरोध को नकारता, बुद्धिजीवियों-कलाकारों-लेखकों आदि को हाशिये पर ठेलता भारत, सार्वजनिक संवाद को गाली-गलौज में बदलता भारत, ज्ञान-विज्ञान-शोध-सृजन की स्वायत्तता का लगातार हनन करता भारत, बलात्कारी अध्यात्म को सराहता भारत अंततः ऐसा भारत होगा, जिसे भारत कहा ही नहीं जा सकता. भारतीय सभ्यता, उसकी परंपराओं, उसकी बहुल संस्कृति का अपमान और अवमानना होगा इसे भारत कहना.

क्या यह भारत हमारी संस्कृति को सबसे बड़ा ख़तरा नहीं है? अगर है तो उसका प्रतिरोध करने के लिए हमें सांस्कृतिक अंतःकरण चाहिये. यह अंतःकरण बनेगा विवेक और सम्यक् बुद्धि से और उसके मूल घटक होंगे- संवेदना, सक्रियता, साहस और सहकारिता, ऐसा अन्तःकरण इस भयानक सांस्कृतिक संकट के समय चुप या निष्क्रिय नहीं रह सकता. हमारे बुनियादी संवैधानिक मूल्यों, स्वतंत्रता-समता-न्याय पर इसरार और उनका बचाव ऐसा मुखर सक्रिय अंतःकरण ही कर सकता है, बिना इसकी चिंता किये कि उसकी आवाज़ कितनी सुनी जायेगी. राजनीति की तरह संस्कृति फ़ौरी नतीजों पर निर्भर नहीं होती. वह दीर्घकालीन मामला होती है.

कुछ जगहें, कुछ आंकड़े

बेंगलुरु, अहमदाबाद, बड़ोदरा, नयी दिल्ली, राजकोट, कोच्चि, कोल्हापुर, मुंबई, नागपुर, शाहजहांपुर, हैदराबाद, हंपी, चंदौली, रांची, इलाहाबाद, मेरठ, सोनीपत, तिरुअनन्तपुर, जयपुर, पटना, भोपाल, चेन्नई, बरेली, अलीगढ़, जोरहाट, श्रीनगर, लखनऊ, अगरतला, खंडवा, चंडीगढ़, गुड़गांव, कोल्लम, कोलकाता, पलक्कड़, टूथकुड़ी, फ़ैज़ाबाद, मेवाड, शामली,बलरामपुर, अजमेर, संभल, मुरादाबाद, सहारनपुर, हरदोई, रोहतास, बक्सा, अगरपुर, मढ़ेपुर, बिजनौर, मुजफ्फ़रनगर, आज़मगढ़, ज़हानाबाद, कैमूर, भागलपुर, सिवान, सीतामढ़ी, बाका,किशनगंज, बागपत, त्रिलोकपुरी, आरा, बवाना, औरंगाबाद, इंदौर, सूरत, अयोध्या, सासाराम, पलवल, गया, एटा, सासाराम, भड़ौच, कुशीनगर, दीमापुर, जलगांव, नाडारपुर, नन्दूरबार,खगरिया, मोतीहारी, गांधीनगर, नीमच, अलीराजपुर, वारंगल, धनबाद, नान्देड़, चंपारण, वल्लभगढ़, धुले, दीनाजपुर, मुजफ्फरपुर... ये नाम हैं कुछ उन जगहों के जहां पिछले चार वर्ष में हिंसा-हत्या-लिंचिंग-बलात्कार की घटनाएं हुई हैं.

प्रामाणिक आंकड़े बताते हैं कि देश में 2010 से गोसंबंधी हिंसा में मारे गये लोगों में 84 प्रतिशत मुसलमान रहे हैं और 97 प्रतिशत हमले 2014 के बाद हुए हैं. गोसंबंधी हत्याओं, हमलों, हिंसा आदि को लेकर 2017 सबसे ख़राब वर्ष रहा है, जिसमें आधी से ज़्यादा घटनाएं 2017 में भाजपा शासित राज्यों में हुई हैं. पिछले चार वर्षों में स्त्रियों के विरुद्ध अपराधों में 34 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिनमें से अधिकांश उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिमी बंगाल में हुए. देश में हर 15 मिनट में किसी दलित के विरुद्ध अपराध किया जाता है और हर दिन औसतन छह दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है. उत्तर प्रदेश और राजस्थान इन घटनाओं की सूची में सबसे ऊपर हैं. स्त्रियों के विरुद्ध अपराधों को लेकर पिछले 10 वर्ष में सज़ा का अनुपात सबसे कम है.