अमेरिका और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच दो महीने से कारोबार को लेकर बढ़ता जा रहा तनाव लगभग खत्म हो गया है. बीते हफ्ते वाइट हाउस में यूरोपीय संघ के प्रमुख जीन क्लोद युंकर और डोनाल्ड ट्रंप के बीच इस मसले पर लंबी बातचीत हुई. इसके बाद दोनों एक शुरुआती समझौते पर तैयार हो गए.

इस समझौते के तहत अमेरिका और ईयू के अधिकारी इस मसले को सुलझाने के लिए बैठकर बात करेंगे. जब तक यह बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंच जाती तब तक दोनों एक-दूसरे के आयात पर कोई नया शुल्क नहीं लगाएंगे. साथ ही अमेरिका द्वारा यूरोप के स्टील और एल्युमिनियम पर लगाये गए शुल्क का पुनर्मूल्यांकन किया जाएगा. बीते मई में अमेरिका ने यूरोपीय देशों से अपने यहां आने वाले स्टील पर 25 फीसदी और एल्युमिनियम पर 10 फीसदी शुल्क लगा दिया था.

ईयू और अमेरिका के बीच हुए इस शुरुआती समझौते में यहां तक तो सबकुछ बराबरी का नजर आता है. लेकिन, इसके बाद इसमें जो बातें कही गई हैं, उनसे ऐसा लगता है कि डोनाल्ड ट्रंप ट्रेडवॉर (व्यापार युद्ध) का डर दिखाकर ईयू को झुकाने में कामयाब हो गए हैं. समझौते में आगे कहा गया है कि दोनों देश जीरो आयात शुल्क और जीरो सब्सिडी की नीति पर बात करेंगे. साथ ही एक-दूसरे के कारोबार में आने वाली अन्य बाधाओं को भी खत्म करेंगे.

यूरोप और अमेरिका पर नजर रखने वाले जानकारों की मानें तो तो समझौते में कही गई यह बात अमेरिका के हित में जाती है. दरअसल, अमेरिका का करीब 20 प्रतिशत सामान यूरोप को जाता है और यूरोप का भी 20 प्रतिशत निर्यात अमेरिका को होता है. लेकिन, इसके बावजूद अमेरिका को यूरोप से सालाना करीब 145 अरब डॉलर का व्यापार घाटा उठाना पड़ता है. इन लोगों के मुताबिक इस घाटे की बड़ी वजह यूरोपीय कंपनियों को दी जाने वाली सब्सिडी, यूरोप के कई देशों में अमेरिकी उत्पादों पर लगने वाले शुल्क और अन्य बाधाएं हैं.

डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का साफ़ कहना है कि उनके यहां व्यापार करने वाली यूरोपीय कंपनियों को ईयू द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी की वजह से ये कंपनियां अमेरिका में अपने उत्पाद सस्ते दामों पर बेचती हैं. इसकी वजह से होता यह है कि अमेरिकी कंपनियां अपने ही बाजार में इनका मुकाबला नहीं कर पातीं और इसका नुकसान इन कंपनियों के साथ-साथ इनमें काम कर रहे अमेरिकी कर्मचारियों को उठाना पड़ता है. अमेरिका को यही शिकायत भारत, कनाडा और चीन से भी है.

हालांकि, अमेरिका भी कृषि उत्पादों से जुड़ी अपनी कंपनियों को कई तरह की सब्सिडी देता है. लेकिन, उसका मानना है कि उसकी यह निर्यात सब्सिडी यूरोप की कंपनियों को दी जाने वाली निर्यात सब्सिडी से कहीं कम है. अब ऐसे में जाहिर है कि अगर ईयू जीरो सब्सिडी और जीरो शुल्क की नीति पर राजी हो गया तो इसका सबसे ज्यादा फायदा अमेरिका को मिलेगा.

अमेरिका और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच हुए शुरुआती समझौते में ही डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी एक और बड़ी बाधा दूर कर ली है. ईयू अमेरिका की प्राकृतिक गैस-एलएनजी और सोयाबीन को पहले से कई गुना ज्यादा आयात करने पर सहमत हुआ है. अमेरिका में इसे ट्रंप की बड़ी जीत की तरह देखा जा रहा है. असल में अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक देश है जिसका 60 फीसदी से ज्यादा सोयाबीन चीन खरीदता था. लेकिन, चीन द्वारा अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क लगाए जाने के बाद इसकी मार अमेरिकी किसानों को झेलनी पड़ रही है. हालात इतने खराब हो चुके हैं कि किसानों को इससे बचाने के लिए हाल ही में ट्रंप प्रशासन ने किसानों को 12 अरब डॉलर की सब्सिडी देने की घोषणा की है.

डोनाल्ड ट्रंप ईयू के जरिये विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) से जुड़ी अपनी एक बड़ी बाधा को दूर करने की कोशिश में भी हैं. उन्होंने यूरोपीय संघ से इस बात पर भी सहमति ली है कि वह डब्लूटीओ से जुड़े नियमों में सुधार करवाने में अमेरिका का साथ देगा. डोनाल्ड ट्रंप कई मौकों पर डब्लूटीओ के नियमों को अमेरिका विरोधी बताते हुए इनमें बदलाव की मांग कर चुके हैं.

क्यों मामला अभी बराबरी का है?

हालांकि, इस सब के बावजूद कई जानकार यूरोप के साथ व्यापार युद्ध में अमेरिका के बाजी मार लेने जैसी बातों को सही नहीं मानते. इनके मुताबिक अभी मुकाबला बराबरी का ही कहा जाएगा क्योंकि इस शुरुआती बातचीत में जहां अमेरिका को सोयाबीन और ऊर्जा निर्यात में बड़ी राहत मिली है वहीं यूरोपीय संघ अमेरिका द्वारा जल्द लगाए जाने वाले नए शुल्क को रोकने में कामयाब रहा है.

न्यूयार्क के रोचेस्टर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अमित्रजीत बटाब्याल अपनी एक टिपण्णी में लिखते हैं, ‘यह मुकाबला एक फुटबॉल मैच की तरह है जिसका ‘फर्स्ट हाफ’ बराबरी पर छूटा है. कौन बाजी मारेगा इसका निर्णय लॉकर रूम में ‘सेकंड हाफ’ के लिए बनाई गई रणनीति और उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा.’ प्रोफ़ेसर अमित्रजीत के मुताबिक अभी केवल डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को फायदा पहुंचाने वाले मुद्दों पर ईयू को बातचीत के लिए ही तैयार किया है न कि इन मुद्दों पर ईयू को मना लिया है. जब तक इन मुद्दों पर ईयू तैयार नहीं हो जाता तब तक अमेरिका को जीता हुआ नहीं कहा जा सकता.

कुछ जानकार यह भी बताते हैं कि शुरुआती समझौते में कही गई बातों पर यूरोपीय संघ के सभी 28 सदस्यों का तैयार होना आसान नहीं होगा. इनके मुताबिक ईयू के सदस्य देश अमेरिका को लेकर अलग-अलग तरह की सोच रखते हैं क्योंकि अमेरिका से उनके अलग-अलग व्यापारिक हित जुड़े हैं. उदाहरण के लिए जर्मनी जल्द से जल्द अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध खत्म करने की कोशिश में है जबकि फ्रांस डोनाल्ड ट्रंप के आगे इतनी जल्दी हथियार डालना नहीं चाहता. इसकी वजह यह है कि जर्मनी की अर्थव्यवस्था कारों के निर्यात पर बहुत ज्यादा निर्भर है और इसका एक बड़ा हिस्सा अमेरिका को जाता है.

यूरोप के कुछ पत्रकार यह भी बताते हैं कि ईयू प्रमुख जीन क्लोद युंकर यह बात अच्छे से जानते हैं कि अमेरिका को लेकर ईयू के अंदर एक राय बनना इतना आसान नहीं और इसमें काफी समय लगेगा. इसी वजह से वे एक राय बनने से पहले ही डोनाल्ड ट्रंप से शुरूआती समझौता करने यानी फौरी राहत लेने पहुंच गए. दरअसल, ऐसा करके उन्होंने यूरोप को काफी हद तक उस नुकसान से बचा लिया है जो आम सहमति बनने तक अमेरिकी ट्रेडवॉर से यूरोप को होने वाला था.

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