साल 1978. इंदिरा गांधी ने चिकमंगलूर (कर्नाटक) से जीत हासिल कर संसद में फिर प्रवेश कर लिया था. उधर, केंद्र में सत्ताधारी जनता पार्टी सरकार के अंदरूनी झगड़े दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे थे. नौबत यहां तक आ पहुंची कf तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह और उनके ‘हनुमान’ कहे जाने वाले राज नारायण (स्वास्थ्य मंत्री) को मंत्रिमंडल से निकालकर ख़ुद के पैर पर कुल्हाड़ी मार ली. इन दोनों ने ऐसा चक्कर चलाया कि सरकार अल्पमत में आ गई और 15 जुलाई, 1979 को मोरारजी देसाई को इस्तीफा देना पड़ा. इसके 13 दिन बाद यानी 28 जुलाई को चरण सिंह ने इंदिरा गांधी के सहयोग से अपनी सरकार बना ली. कांग्रेस की बैसाखी पर टिकी यह सरकार भी कुछ ही महीनों में गिर गई और चुनाव जीतकर इंदिरा दोबारा सत्ता में आ गईं.

आइए, साल 1979 की राजनैतिक उथल-पुथल पर नज़र डालते हैं.

जनता पार्टी में तीन धड़े थे. पहला, मोरारजी देसाई का. दूसरा, चौधरी चरण सिंह और राज नारायण का और तीसरा, बाबू जगजीवन राम और जन संघ का. ये तीनों धड़े आपस में ही लड़ भिड़ रहे थे. इस वजह से तीनों शीर्ष नेताओं का सार्वजनिक जीवन तार-तार हो रहा था. जानकार बताते हैं कि मोरारजी देसाई ने चरण सिंह को ‘चूरन सिंह’ बनाने की ठान ली थी. वहीं, चरण सिंह मोरारजी देसाई की कम लोकप्रियता के चलते उन्हें प्रधानमंत्री मानने को तैयार नहीं थे. पार्टी अध्यक्ष, चंद्रशेखर मूक दर्शक बने रहते. दिलचस्प बात यह भी है कि ये चारों पूर्व कांग्रेसी थे.

जानकारों का मानना है कि अगर जनता पार्टी में प्रधानमंत्री पद के लिए चुनाव होता तो यक़ीनन यह पद बाबू जगजीवन राम को मिलता. लेकिन इसका फ़ैसला जयप्रकाश नारायण ने किया था. जेपी ने जगजीवन राम को आपातकाल काल के प्रति उनके शुरुआती समर्थन के लिए माफ़ नहीं किया. असल में जगजीवन राम ने संसद में आपातकाल के प्रस्ताव के पक्ष में भाषण दिया था.

जैसा कि ऊपर जिक्र हुआ, मोरारजी देसाई ने चौधरी चरण सिंह और राज नारायण को मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया था. अपनी ताक़त दिखाते हुए, चरण सिंह ने दिल्ली में किसानों की महारैली आयोजित की. इस रैली में उमड़े जन समूह ने सत्ता के संतुलन को हिलाकर रख दिया. वक़्त का तकाज़ा देखते हुए, मोरारजी देसाई ने चरण सिंह को दोबारा मंत्रिमंडल में शामिल तो कर लिया, पर दोनों के बीच टकराव और तेज़ हो गया था.

उधर, जनसंघ के सांसदों की दोहरी सदस्यता भी टकराव का मुद्दा बन रही थी. इन सांसदों के पास राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की भी सदस्यता थी. जेपी ने जब आंदोलन शुरू किया था तो उन्होंने जन संघ के नेताओं को इसी शर्त पर मंच पर बिठाया था कि वे आरएसएस की सदस्यता त्याग देंगे. जनसंघियों ने उन्हें यकीन भी दिलाया था, पर बाद में वे पलट गए. अब जब उनको आरएसएस की सदस्यता को छोड़ने के लिए कहा गया तो उन्होंने मना कर दिया. इससे जनता पार्टी का टूटना लगभग तय हो गया. अब यह देखा जाना था कि कौन, कब, और कैसे इसका सूत्रधार होगा. यह भी जल्द ही हो गया.

दिग्गज पत्रकार कुलदीप नैयर अपनी जीवनी ‘बियॉन्ड द लाइन्स’ में लिखते हैं कि एक रोज़ जनता पार्टी के देवी लाल ने उन्हें ख़बर दी कि आने वाले मानसून सत्र में मोरारजी की सरकार गिर जायेगी. तख्तापलट के प्लान के तहत जनता पार्टी के चार या पांच सांसदों को इस्तीफा देना था जिससे सरकार अल्पमत में आ जाती.

इसके लिए पर्दे के पीछे एक खेल खेला जा रहा था. इसके सूत्रधार राज नारायण थे. उन्होंने पहले जनता पार्टी सरकार के सोशलिस्ट सांसदों को तोड़ने की कोशिश की. जब नाकामयाब रहे, तो वे संजय गांधी से मिल गए. उन्होंने संजय गांधी को चरण सिंह के समर्थन में खड़े होने के लिए मनाया. बताया जाता है कि इंदिरा गांधी को इस प्रस्ताव पर पहले तो यकीन ही नहीं हुआ. लेकिन जब संजय ने अपना प्लान बताया तो वे सहर्ष राज़ी हो गईं. उधर, चरण सिंह ने बाबू जगजीवन राम को भी अपनी तरफ़ मिला लिया.

संसद में बिसात बिछ गयी. मोहरे चलने शुरू हो गए. जुलाई 1979 में मानसून सत्र के दौरान कांग्रेस नेता यशवंतराव बलवंतराव चव्हाण ने जनता पार्टी की सरकार के ख़िलाफ़ 18वां अविश्वास प्रस्ताव पेश कर पहली चाल चली. दूसरी चाल चरण सिंह की थी. उन्होंने जनसंघ के सांसदों की दोहरी सदस्यता का मुद्दा उठाया. मोरारजी और पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस मुद्दे पर खामोश रहे. चरण सिंह को इसकी ही उम्मीद थी. वे जनता पार्टी से अलग हो गए. जॉर्ज फ़र्नांडिस एक दिन प्रस्ताव के विपक्ष में बोले और अगले दिन अपनी सरकार के ख़िलाफ़ बोलकर सारा खेल ही उजागर कर बैठे. ज़ाहिर है, जनता पार्टी के सांसदों में फूट पड़ गयी थी. मोरारजी देसाई को मात दे दी गयी. कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव के मत में ज़्यादा वोट पड़े. चुनांचे, जनता पार्टी की सरकार अल्पमत में आ गयी और मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा. यह पहला अविश्वास प्रस्ताव था जब सरकार गिर गयई थी .

राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी के पास अब दो विकल्प थे. पहला, जनता पार्टी के ही बाबू जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनाया जाए. दूसरा, चौधरी चरण सिंह की भारतीय लोकदल पार्टी, जिसे कांग्रेस का समर्थन था, उसे आमंत्रित किया जाए. कानून और संविधान विशेषज्ञों ने जगजीवन राम के विकल्प को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि जनता पार्टी ने संसद में विश्वास मत खोया है इसलिए उसे सरकार बनाने का हक़ नहीं मिल सकता. लिहाज़ा, चरण सिंह को सरकार बनाकर सदन में अपना बहुमत सिद्ध करने को कहा गया.

जनता पार्टी के नेताओं ने तब राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ महाभियोग प्रस्ताव लाने की धमकी दी. लेकिन नीलम संजीव रेड्डी ने संविधान के दायरे में रहकर चरण सिंह को न्योता दिया था इसलिए यह महाभियोग नहीं लाया जा सका. चौधरी चरण सिंह तैयार बैठे थे, उन्होंने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया, जिसे कुछ ज़द्दोजहद के बाद राष्ट्रपति नीलम संजीवा रेड्डी को मानना पडा और चरण सिंह देश के पांचवें प्रधानमंत्री बन गए.

इसे लोकतंत्र की हार और जीत दोनों ही लिहाज से देखा सकता है. जीत इसलिए कि पहली बार कोई किसान देश के शीर्ष पद पर बैठा था. हार इसलिए कि सत्ता के नशे ने नेताओं को पार्टी की विचारधाराओं से भटका दिया था. ये वही चौधरी चरण सिंह थे जो नेहरू की आर्थिक नीतियों के कट्टर विरोधी थे, जिन्होंने उत्तर प्रदेश की कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री होते हुए विद्रोह कर अलग पार्टी बनायी थी, जिन्हें इंदिरा गांधी ने आपातकाल में जेल भिजवाया था और जिन्होंने जनता पार्टी के गृह मंत्री रहते हुए इंदिरा गांधी को जेल में डाला था.

राज नारायण का भी हाल देखिये. उन्होंने 1971 में इंदिरा गांधी के हाथों हुई हार को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी थी और 1975 में कोर्ट ने इंदिरा की जीत को ख़ारिज करते हुए उनके छह साल तक कोई भी चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी. इसके बाद ही इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया था और राज नारायण को जेल भी भिजवाया था. लेकिन वही राजनारायण अब इंदिरा के साथ खड़े थे.

विरोधी एक हो रहे थे और नेक हो रहे थे. पर खेल अभी बाकी था. राजनीति के दिग्गज माने जाने वाले चरण सिंह और राज नारायण संजय गांधी के झांसे में फंस गए थे. मानसून सत्र में बनी सरकार शीतकालीन सत्र (नवंबर-दिसंबर) भी न देख पाई थी कि कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया. सरकार गिर गयी. राष्ट्रपति को आम चुनाव की घोषणा करनी पड़ी. संजय गांधी का प्लान कामयाब हुआ. कांग्रेस ने फिर जीत हासिल की और इंदिरा गांधी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री की गद्दी संभाली.

साल 1979 भारतीय राजनीति के अहम सालों में से एक रहा है. इसके बाद संसद और राजनीति दोनों की गरिमा कम होती चली गई. नेहरू के संसदीय आदर्शों को उनकी बेटी और पौत्र ने ताक पर रख दिया. जेपी की बातों को उनके ही समर्थकों ने भुला दिया. लोहियावाद का भी अंत हो गया. हां, लोहियावादी अब तक राजनीति कर रहे हैं. जनसंघ ने जनता पार्टी से नाता तोड़कर नई पार्टी बनायी थी. वह पार्टी यानी भाजपा आज देश की बागडोर संभाल रही है.