ममता जी, आपने किस आधार पर कहा था कि असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (एनआरसी) में 40 लाख लोगों को शामिल न करने से देश में गृहयुद्ध की स्थिति पैदा हो जाएगी?

ऐसे बयान देने के लिए आधार की नहीं जनाधार की जरूरत होती है और वह मेरे पास है पर्याप्त है.

लेकिन 2005 में तो आपका कहना था कि बांग्लादेशियों का नाम वोटर लिस्ट में होना देश के लिए खतरा है, लेकिन आज आप ऐसा नहीं मानतीं. इस मुद्दे पर आप इतना बड़ा यू-टर्न कैसे ले सकती हैं?

(खीजते हुए) क्या सारे यू-टर्न लेने का हक सिर्फ नरेन्द्र मोदी और अरविंद केजरीवाल को ही है! और वैसे भी जो जितना बड़ा नेता उतना बड़ा यूटर्न...प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदारी करते समय मुझे मोदी जी के स्तर के बड़े यूटर्न लेने होंगे, न कि अरविंद केजरीवाल के स्तर के!

कांग्रेस की पश्चिम बंगाल इकाई के अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने आपको ‘गिरगिट की तरह रंग बदलने वाला इंसान’ कहा है. इसके बारे में आपका क्या कहना है?

उन्होंने यह तुलना मेरा अपमान करने के लिए की होगी, लेकिन अंजाने में वे बतौर नेता मुझे और ज्यादा स्थापित कर गए. रंग और बात बदलना तो भारतीय नेताओं के राजनीतिक रूप से मंझने की निशानी है, इसमें क्या बुरा मानना. अपमानजनक तो यह गिरगिट के लिए है कि भारतीय नेताओं ने उन्हें रंग बदलने में बहुत पीछे छोड़ दिया है! (मुस्कुराते हुए)

ममता जी, आप खुद को धर्मनिरपेक्ष कहती हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में आपकी छवि मुस्लिमों का तुष्टीकरण करने वाले नेता की बनी है. क्या यह सांप्रदायिक राजनीति नहीं है?

(खीजते हुए) देखिए, सांप्रदायिकता एक जहर के समान है और आपने भी सुना होगा कि जहर ही जहर को काटता है. ऐसे में भाजपा के सांप्रदायिकता के जहर को काटने के लिए मुझे भी उसी स्तर का जहरीली होना होगा!

अच्छा यह बताइए कि विपक्षी गठबंधन में प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार आप किसे मानती हैं?

खुद को!

ऐसा क्यों?

क्योंकि नरेन्द्र मोदी जी ने प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए जो नए मानक तय किए हैं, उन पर सबसे ज्यादा खरी मैं ही उतरती हूं.

क्या मतलब?

देखिए, विपक्ष के पास प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए अभी सिर्फ तीन ही नाम हैं. एक मैं, दूसरे राहुल गांधी और तीसरी मायावती जी. अगले चुनाव में प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार वही माना जाएगा जो यू-टर्न की राजनीति का माहिर हो, झूठ आत्मविश्वास से बोलता हो और जिसका सांप्रदायिक मूल्यों में यकीन हो. राहुल गांधी को तो अभी तक ‘बातों को टर्न’ करना ही ढंग से नहीं आया फिर यू-टर्न की तो बात ही छोड़ दीजिए. रही बात आत्मविश्वास से झूठ बोलने की तो अभी उन्होंने आत्मविश्वास से बोलना भर शुरू किया है. झूठ बोलने के लिए जिस हद दर्जे का आत्मविश्वास चाहिए, उसे पाने में उन्हें बहुत लंबा समय लगेगा. और जहां तक बात मायावती जी की है तो वे चार लाइन भी पढ़कर ही बोलती हैं. जाहिर है कि ये लोग मेरे मुकाबले कहीं नहीं ठहर सकते! (मुस्कुराते हुए)

आप अपने प्रधानमंत्री बनने को लेकर कुछ ज्यादा ही आश्वस्त दिखती हैं. ऐसा क्यों?

क्यों न होऊं मैं आश्वस्त! यदि जनता एक व्यक्ति को दो बार मुख्यमंत्री चुन सकती है तो दो बार नौटंकीबाज प्रधानमंत्री भी बना ही सकती है! मोदी जी यदि ‘शोमैन’ हैं तो इस बार ‘शो स्टीलर’ मैं बनूंगी!

आपके इतने आत्मविश्वास का राज़ क्या है?

मेरे पीछे एक पूरा बांग्लादेश...अब्ब्ब मेरा मतलब कि पूरे बंगाल की जनता खड़ी है.

ममता जी, आप मोदी सरकार पर लोकतंत्र को कमजोर करने और तानाशाही चलाने का आरोप लगाती आई हैं. लेकिन पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों में आपकी पार्टी पर यही आरोप लगे हैं. इस बारे में क्या कहेंगी?

देखिए, हमारे देश में किसी के अच्छे काम की तारीफ करने की कोई परंपरा नहीं है. यहां आरोप और विरोध की तीव्रता से ही पता चलता है कि आप सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. तो इस हिसाब से मेरे ऊपर लगे सारे आरोप कदम-कदम पर इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि अब मैं प्रधानमंत्री पद के लिए पूरी तरह तैयार हो चुकी हूं. अभी तो ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद की कुछ सीटों पर ही निर्विरोध उम्मीदवार चुने गए हैं...मेरा तो लक्ष्य है कि आगामी विधानसभा चुनावों में पूरी सरकार ही निर्विरोध चुन ली जाए.

पश्चिम बंगाल में राज्य निर्वाचन आयोग पंचायत चुनाव तीन चरणों में कराना चाहता था, लेकिन कहा जा रहा है कि आपकी सरकार के दबाव की वजह से चुनाव एक ही चरण में हुआ. इस पर क्या कहेंगी?

मैं अपने स्तर पर चुनाव सुधार के प्रयास कर रही हूं. यह उसी में दिशा में उठाया गया एक कदम था.

क्या मतलब?

मतलब यह कि जिस तरह नरेन्द्र मोदी जी लोक सभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ करवा के देश के कई तरह के संसाधन बचाना चाहते हैं, उसी तरह मैं लोगों का समय बचाना चाहती हूं. आपने सुना भी होगा ‘टाईम इज मनी!’ तो मैंने सोचा कि तीन बार लोगों को चक्कर कटवाने से अच्छा है कि वे एक ही बार आकर मतदान कर जाएं. बल्कि मैं तो इससे भी एक कदम आगे जाकर पूरी पंचायत ही निर्विरोध चुन लेना चाहती थी!... ताकि लोगों का समय, ऊर्जा और पैसा बेकार जाने से बचा लिया जाता. लेकिन भाजपा और कांग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियों से जनता का भला देखा नहीं गया और सिर्फ कुछ हजार सीटों पर ही निर्विरोध प्रत्याशी चुने जा सके. ऐसा क्यों है कि मोदी जी के चुनाव सुधार तो लोकतंत्र के हित में हैं और मेरे चुनाव सुधार लोकतंत्र की हत्या हैं! यह नहीं चलेगा. (गुस्से से)

एक अंतिम सवाल. आपसे पहले जनता दल यूनाइटेड के प्रमुख नीतीश कुमार ने भी विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश की थी, लेकिन वे इसमें सफल नहीं हो पाए थे. क्या आप महागठबंधन की धुरी बनने में सफल होंगी?

नीतीश कुमार से मेरी तुलना करके आप मेरी तौहीन कर रही हैं! खैर, मैं यदि धुरी न बन सकी तो एक तरफ से सबको धुन जरूर दूंगी! (गुस्से से)