हमारे आसपास असंख्य ऐसी उम्दा फिल्में मौजूद हैं जिन्हें मुख्यधारा के सिनेमा ने तो कभी अपना समझा ही नहीं, कला फिल्मों की परिधि से भी उन्हें बाहर माना गया. क्लासिक का भी दर्जा उन्हें जोर-शोर से नहीं दिया जाता, और वे ऐसे ‘नो मैन्स लैंड’ में सिमटकर रहने को मजबूर होती हैं जहां केवल ‘सिनेमा अघोरी’ पहुंच पाते हैं.

यानी कि सिनेमा की अघोरियों की तरह पूजा करने वाले सिनेप्रेमी ही इन फिल्मों को रात-रातभर जाग-जागकर ढूंढ़ते और देखते हैं और आम दर्शक अज्ञानतावश इनसे दूर रहने की नियति भोगता है. ऐसी छोटी, स्वतंत्र, टोरेंट्स के माध्यम से विश्व के कोने-कोने में पहुंचने वाली इंडिपेंडेंट फिल्मों के पास धीरे-धीरे ‘कल्ट’ हो जाने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचता, और फिर वो वक्त भी आता है जब ये ‘क्लासिक’ भी कहलाई जाने लगती हैं (कल्ट क्लासिक) और असंख्य लोगों द्वारा पसंद भी की जाती हैं.

‘द मैन फ्रॉम अर्थ’ 2007 में प्रदर्शित हुई एक अमेरिकी इंडी फिल्म है. नितांत ही कम बजट और बेहद सामान्य फिल्ममेकिंग का नमूना. आठ से दस दिनों में इसे सस्ते पेनासोनिक कैमरे पर शूट किया गया था और सिडनी लुमेट की एक कमरे में घटित ‘12 एंग्री मैन’ (1957) नामक महान फिल्म से फिल्मांकन की प्रेरणा ली गई थी. इसमें छोटी-सी जगह में सिमटे एक घर में कुछ सात-आठ लोग बैठकर बातें करते हैं और डेढ़ घंटे तक केवल बातें करते हैं. एक इतिहास का प्रोफेसर दस साल तक यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के बाद एकाएक नौकरी और शहर छोड़ने का फैसला लेता है जिसके बाद उसके कुछ प्रोफेसर साथी उसे अंतिम विदाई देने घर आते हैं. सवाल सबका एक ही है कि फलते-फूलते करियर को छोड़कर वो क्यों जा रहा है और कहां जा रहा है.

सवालों को न मरता देख, कुछ वक्त बाद जॉन ‘ओल्डमैन’ नामक यह प्रोफेसर (डेविड ली स्मिथ) जवाब देता है कि वो 14,000 साल पहले धरती पर पैदा हुआ था और वो ‘बूढ़ा’ नहीं होता! हजारों सालों से उसकी उम्र 35 साल ही है और जब भी आसपास के लोग यह नोटिस करने लगते हैं कि उसकी उम्र बढ़ नहीं रही, तो उन आठ-दस सालों बाद वो उस जगह को छोड़कर आगे बढ़ जाता है! आपको अगर बातें और बातें और केवल बातें करने वाली फिल्मों से अदावत है, तो बिना कम्प्यूटर कारीगरी वाली, मार-धाड़ से विमुख और रोमांचित करने वाले नयनाभिराम एक्शन-दृश्यों से रिक्त यह ‘साइंस-फिक्शन’ फिल्म जरूर ही देखिएगा. दुश्मनी प्यार में बदल जाएगी.

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‘द मैन फ्रॉम अर्थ’ कहने को साइंस-फिक्शन ड्रामा फिल्म है. लेकिन यह कहना मुनासिब होगा कि ये साइंस-फिक्शन और जादुई यथार्थवाद जैसी दो मुख्तलिफ धाराओं के मेल से तैयार हुआ सिनेमा है. उम्दा साइंस-फिक्शन की तरह इसका केंद्रीय विचार होश फाख्ता करने वाला है लेकिन सबकुछ कपोल-कल्पित नहीं है, बल्कि मैजिक रियलिज्म की तर्ज पर यथार्थ में रोपा हुआ है और फिर भी जादुई है!

इसका श्रेय फिल्म के लेखक जिरोम बिक्सबी (Jerome Bixby) को जाता है, जो कि हॉलीवुड में साइंस-फिक्शन कहानियां लिखने के लिए जाने जाते थे. सामान्य निर्देशन के चलते यह फिल्म उन्हीं के लेखन की वजह से लाजवाब साबित हुई है, लेकिन यहां यह भी समझना जरूरी है कि इसकी वजह फिल्म का यह विचित्र विषय नहीं है कि नायक को अमरत्व हासिल है. फिल्म तो अपनी शुरुआत में ही सामान्य अंदाज में इस बात का रहस्योद्घाटन कर देती है और इतने मजबूत प्लॉट-पाइंट को दर्शकों के सामने लाने के लिए न किसी बिल्ड-अप का सहारा लेती है न फ्लैशबैक में जाती है. क्योंकि यह साइंस-फिक्शन कहानी मूलत: इस बारे में है कि ऐसा रहस्योद्घाटन करने वाले पर पढ़े-लिखे रैशनल लोग क्या-कितना अविश्वास करते हैं, और क्या नायक पलटकर अपने बुद्धिमान साथियों को अपनी कहानी पर विश्वास दिला पाता है. या फिर अंत में जाकर वो कहने वाला है कि मैं तो मजाक कर रहा था, आप लोगों की टांग खींच रहा था!

कहते हैं कि इस कहानी का आइडिया लेखक के पास साठ के दशक से मौजूद था, और उन्होंने इसे छोटे स्वरूप में ‘स्टार ट्रैक’ (1968) नामक बेहद मशहूर टीवी सीरियल के एक एपीसोड में उपयोग भी किया था. लेकिन कहानी को पूर्ण स्वरूप 1998 में दिया,जब वे अपनी मरणसेज पर जीवन त्यागने का इंतजार कर रहे थे. वे घटना दर घटना कहानी कहते जाते थे और उनका बेटा (जो कि खुद भी एक लेखक है और जिसने 2017 में आए इस फिल्म के सीक्वल की कहानी लिखी है) उन्हें लिखता चलता था.

फिल्म देखते वक्त जब आप इसके संवादों और सवाल-जवाब की गहराई पर ताज्जुब करेंगे, जीवन दर्शन से लेकर मृत्यु पर प्रकट विचारों में गहरे डूबेंगे, और मुख्तलिफ धर्मों के आपस में जुड़ने से लेकर धार्मिक संस्थाओं की कुटिलता पर आंखें खोलेंगे तो तब आप जान पाएंगे कि कहानी के पास इतना गुरुत्वाकर्षण आया किधर से था. एक मरता हुआ आदमी कभी न मरने वाले आदमी की कहानी को आखिर कैसे अमर कर पाया था.

‘द मैन फ्रॉम अर्थ’ की यही सबसे कमाल बात है. बढ़िया नाटकों और बढ़िया किताबों में किरदारों के बीच की जो यथार्थवादी बातचीत चीजों को दिलकश बनाती है, वो इस फिल्म में सिनेमा जैसे विजुअल मीडियम को भी बहुत एनरिच करती है. साइंस-फिक्शन फिल्मों/कहानियों में कम ही देखा गया है कि उनके द्वारा कहे गए ‘सच’ (जैसे कि टाइम मशीन होती है, घड़ी पहनकर अदृश्य हुआ जा सकता है) की इतनी सूक्ष्म पड़ताल खुद साइंस-फिक्शन राइटर करता है, जितनी कि इस फिल्म में भिन्न पात्रों द्वारा करवाई जाती है. नायक के विपरीत खड़े छह-सात बुद्धिमान पात्रों में से कोई जीव-विज्ञान का प्रोफेसर है, कोई सूक्ष्म व्यवहार तक की पड़ताल करने वाला मनोचिकित्सक है, तो कोई जीसस व ईसाई धर्म का ज्ञानी, कोई मानव विज्ञानी और कोई पुरातत्ववेत्ता. इनमें से हर कोई अपने-अपने क्षेत्र से जुड़े कठिनतम सवाल पाषाणकालीन नायक से पूछते हैं - ताकि उसके झूठ का पर्दाफाश कर सकें - और इन सवालों के ‘जवाब’ ही इस फिल्म को बुद्धिमता के सूचकांक में बेहद उच्च के अंक देते हैं.

बस आपसे एक गुजारिश है. पल-पल पर हैरान करने वाली इस निराली साइंस-फिक्शन फिल्म को देखते वक्त दांतों तले उंगलियां मत दबाइएगा. कट जाने का खतरा होगा! खासकर तब, जब गौतम बुद्ध के बाद नायक पार्श्व में बजते बिथोवन के संगीत की टेक लेकर जीसस का जिक्र करेगा.

(‘द मैन फ्रॉम अर्थ’ को आप एमेजॉन प्राइम वीडियो पर भी देख सकते हैं.)