भारत सहित 16 देशों के बीच क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) को लेकर बीती 30 और 31 अगस्त को सिंगापुर में मंत्री स्तर की वार्ता हुई. इसमें इन सभी देशों के वाणिज्य मंत्री शामिल हुए. बैठक के बाद जारी बयान में कहा गया कि मुक्त व्यापार से जुड़े इस समझौते का आखिरी स्वरूप तैयार करने में जुटे वार्ताकारों से इस काम में तेजी लाने को कहा गया है.

आरसीईपी में शामिल होने को लेकर भारत पिछले छह साल से गंभीर कोशिशें कर रहा है. इस समझौते को लेकर बातचीत 2012 में शुरू हुई थी. उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस समझौते के जबर्दस्त पैरोकार थे और उन्हें लगता था कि इस समझौते में शामिल होने से भारत को कई तरह के फायदे होंगे.

2014 में जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में नई सरकार आई तो इसने भी आरसीईपी में शामिल होने को लेकर बातचीत आगे बढ़ाई. मुख्य रूप से आसियान देशों के इस समूह का भारत की विदेश नीति और आर्थिक तरक्की में क्या योगदान हो सकता है, इसका जिक्र खुद प्रधानमंत्री मोदी कई मौकों पर कर चुके हैं. यही वजह थी कि इस साल गणतंत्र दिवस के मौके पर दस आसियान देशों के राष्ट्राध्यक्षों को मेहमान के तौर पर बुलाया गया था.

आरसीईपी पर जो बातचीत चल रही है उसमें आसियान (ब्रुनेई, कंबोडिया, इडोनेशिया, मलेशिया, म्यांमार, सिंगापुर, थाईलैंड, फिलीपींस, लाओस और वियतनाम) और भारत के अलावा पांच और भागीदार देश हैं. ये हैं चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड.

लेकिन जनवरी से अगस्त आते-आते आरसीईपी को लेकर भारत का रुख बदला-बदला नजर आने लगा है. हाल में भारत सरकार ने केंद्रीय वाणिज्य और नागरिक उड्डयन मंत्री सुरेश प्रभु की अध्यक्षता में एक मंत्री समूह का गठन किया. इस समूह में रेल मंत्री पीयूष गोयल, रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण और शहरी विकास मंत्री हरदीप पुरी को भी शामिल किया गया है. यह समूह आरसीईपी से जुड़े विभिन्न पक्षों के अलावा इस बात पर भी विचार करेगा कि भारत को आरसीईपी में शामिल होना चाहिए या नहीं.

आरसीईपी के तहत वस्तु, सेवा और निवेश समेत तकनीकी और बौद्धिक संपदा अधिकार के मोर्चे पर आपसी सहयोग बढ़ाया जाना है. अभी तक की बातचीत के हिसाब से 90 से 92 फीसदी वस्तुओं पर आयात शुल्क हटाने का प्रस्ताव है और बाकी पर आयात शुल्क घटाकर पांच फीसदी से नीचे लाने की योजना है. इस समूह की संयुक्त ताकत को बेहद अहम माना जा रहा है. इन 16 देशों की कुल आबादी 3.4 अरब है. विश्व व्यापार में इनकी संयुक्त हिस्सेदारी 29 फीसदी है. वहीं पूरी दुनिया की जीडीपी में इन 16 देशों की हिस्सेदारी 38 फीसदी है.

भारत को इससे होने वाले फायदों में यह गिनाया जा रहा है कि इससे उसका व्यापार बढ़ेगा. यह भी कहा जा रहा है कि भारत को आसियान देशों का बाजार मिलेगा. इसके अलावा भारत को यह उम्मीद भी है कि समझौता होने के बाद चीन, जापान और दक्षिण कोरिया से भारत में आने वाला निवेश भी बढ़ेगा. सेवा क्षेत्र में भारत का निर्यात बढ़ने की उम्मीद भी लगाई जा रही है. इसका एक रणनीति लाभ यह भी माना जा रहा है कि पूर्वोत्तर भारत के जरिए अगर इन देशों से व्यापार बढ़ता है तो इससे अभी तक पिछड़े माने जाने वाले पूर्वोत्तर के राज्यों के आर्थिक विकास में भी मदद मिल सकती है.

लेकिन फायदों के साथ भारत को इस प्रस्तावित समझौते से कई नुकसान होने का अंदेशा भी जताया जा रहा है. नीति आयोग के सदस्य वीके सारस्वत ने कुछ महीने पहले इस बारे में एक शोध पत्र आयोग को सौंपा है. इसमें उन्होंने यह कहा है कि आरसीईपी में शामिल होने से पहले इसके हानिकारक पक्षों की भी पड़ताल जरूरी है. सुरेश प्रभु की अध्यक्षता में मंत्री समूह बनाने के पीछे की वजहों में एक वजह वीके सारस्वत के शोध पत्र को भी माना जा रहा है. मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम और पूर्व विदेश सचिव एस जयशंकर भी आरसीईपी को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दे चुके हैं.

आरसीईपी में शामिल होने को लेकर भारत की सबसे बड़ी आशंका चीन से जुड़ी हुई है. इसमें शामिल होने के बाद उसे चीन को भी मुक्त व्यापार की छूट देनी पड़ेगी. ऐसा होने पर भारत को डर है कि चीन के साथ उसका व्यापार घाटा और बढ़ जाएगा. 2017 में भारत ने चीन को 16.34 अरब डॉलर का निर्यात किया जबकि चीन से भारत ने 68.10 अरब डॉलर का आयात किया. इस हिसाब से भारत का व्यापार घाटा 51.75 अरब डॉलर का है. सारस्वत समेत कई आर्थिक जानकारों को यह लग रहा है कि आरसीईपी में आने के बाद यह घाटा और बढ़ सकता है. आरसीईपी लागू होने के बाद दक्षिण कोरिया, आॅस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ भी भारत का व्यापार घाटा बढ़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है. इसलिए भारत चाहता है कि आरसीईपी समझौते के अंदर ही भारत को चीन, आॅस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड पर आयात शुल्क लगाने का अधिकार उसके पास बना रहे.

इसके अलावा भारत की एक और बड़ी चिंता सेवाओं को लेकर है. सेवा क्षेत्र का सबसे अधिक योगदान भारत की जीडीपी में होता है. वस्तुओं के व्यापार से जो कुल घाटा भारत को होता है, उसके आधे की भरपाई वह सेवा क्षेत्र में व्यापार से होने वाली अतिरिक्त आमदनी के जरिए करता है. सेवाओं के व्यापार को लेकर उस तरह की छूट भारत को अभी तक आरसीईपी में मिलती नहीं दिख रही है जिस तरह की छूट की उम्मीद भारत से वस्तुओं के व्यापार के मामले में की जा रही है. भारत चाहता है कि सेवा क्षेत्र में काम करने वाले भारतीयों को मुक्त रूप से आरसीईपी देशों में सेवा देने का अवसर मिले.

समझौते के तहत आयात शुल्क खत्म करने को भारत के कृषि आधारित उद्योगों, वाहन, दवा और स्टील क्षेत्र के लिए ठीक नहीं माना जा रहा है. भारतीय कारोबारियों और सरकार के बीच जो बातचीत चल रही है उसमें यह चर्चा भी होर ही है कि नोटबंदी और जीएसटी के झटके से अभी भारतीय उद्योग जगत ठीक से उबरा नहीं है और ऐसे में आरसीईपी में जाने से भारत के घरेलू उद्योगों को नुकसान हो सकता है.

आरसीईपी के तहत बौद्धिक संपदा को लेकर जिन नियमों की बात की जा रही है, उन्हें भारत में जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता के लिए ठीक नहीं माना जा रहा है. माना जा रहा है कि आरसीईपी लागू होने के बाद भारत के जेनेरिक दवा निर्माताओं को कड़े नियमों का सामना करना पड़ेगा और महंगी दवाओं का जेनेरिक संस्करण आने में देरी हो सकती है. इससे न सिर्फ भारत में जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता प्रभावित होगी बल्कि इन दवाओं के निर्यात पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है. आरसीईपी को लेकर एक झंझट यह भी है कि कई सालों से लगातार कई दौर की वार्ता के बावजूद यह समझौता आगे नहीं बढ़ पा रहा है.

बहरहाल, आरसीईपी से जुड़ी आशाओं और आशंकाओं के बीच मंत्री समूह की बैठकें शुरू हो गई हैं. इन बैठकों में कैबिनेट सचिव भी शामिल हो रहे हैं. मोदी सरकार आने के बाद मंत्री समूह की व्यवस्था खत्म हो गई थी. लेकिन जिस तरह से मंत्री समूह बना है और कैबिनेट सचिव के स्तर पर भागीदारी हो रही है, उससे यही लगता है कि आरसीईपी को लेकर भारत आर-पार की मुद्रा में है.