बीते हफ्ते तिब्बत के धर्मगुरू दलाई लामा की पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर की गई टिप्पणी खासी चर्चा में रही थी. गोवा में एक मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट में बोलते हुए उन्होंने कहा – ‘महात्मा गांधी चाहते थे कि जिन्ना देश के पहले प्रधानमंत्री बनें लेकिन नेहरू इसके लिए तैयार नहीं हुए.’ इस दौरान बौद्ध धर्मगुरू ने पूर्व प्रधानमंत्री के ‘आत्मकेंद्रित रवैये’ को देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए कहा था कि वे एक बुद्धिमान और अनुभवी नेता थे लेकिन उनसे भी गलतियां हुई हैं. हालांकि बाद में दलाई लामा ने अपने इस बयान पर माफी मांगी, लेकिन तब तक इसकी चर्चा राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक फैल चुकी थी.

सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं में ज्यादातर लोगों ने बौद्ध धर्मगुरू पर राजनीति से प्रेरित होकर बयानबाजी करने का आरोप लगाया. राजनीति के जानकारों का भी मानना है कि यह नेहरू के खिलाफ बने माहौल से फायदा उठाने की कोशिश हो सकती है. इन सबसे हटकर अगर दलाई लामा के कहे की बजाय उनके लिखे पर गौर किया जाय तो उनका हालिया बयान जरा कम समझ आता है. दलाई लामा की आत्मकथा ‘मेरा देश निकाला’ में उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से हुई कई मुलाकातों का जिक्र किया है और इनसे नेहरू की जो तस्वीर बनती है, वह बौद्ध धर्मगुरू के ताजा बयान के एकदम उलट है. अब 83 साल के हो रहे दलाई लामा की स्मृति का कमजोर होना और बोलते हुए उतनी सटीक बात न कह पाना स्वाभाविक हो सकता है लेकिन किसी के बारे में उनकी राय का एकदम बदल जाना चौंकाता है. चलिए, उनकी आत्मकथा के उन पांच उद्धरणों पर गौर करते हैं, जिनमें उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के बारे में बताया है.

1- 1957 में जब पहली बार दलाई लामा भारत आए तो उन्होंने इस यात्रा का जिक्र करते हुए लिखा है कि ‘जब पहली बार हम भारत की राजधानी में उतरे, तब भारत के खुलेपन और सहजता की भावना और भी दृढ़ हुई. प्रधानमंत्री नेहरू और उपराष्ट्रपति डॉ राधाकृष्णन के साथ यहां सैनिक सलामी का प्रबंध था. यहां चीन की अपेक्षा कहीं ज्यादा शान-शौकत तो थी ही, इसके साथ गहरी आत्मीयता भी थी. भले ही प्रधानमंत्री द्वारा स्वागत में कहे हुए शब्द हों अथवा व्यक्तिगत रूप से किसी सामान्य अधिकारी से हुई बातचीत हो. यहां लोग अपनी वास्तविक भावनाएं ही व्यक्त करते थे, जरूरी मानकर कहे हुए शब्द नहीं बोलते थे. कहीं कोई बनावट नहीं थी.’

इसी यात्रा के दौरान नेहरू जी से हुई अन्य मुलाकातों के बारे में बताते हुए दलाई लामा ने उनके व्यक्तिगत व्यवहार से लेकर लोकतंत्र में उनके विश्वास और बतौर राजनेता पड़ोसी देशों के प्रति उनके रवैये का जिक्र किया है -

‘दरअसल मैं पंडित नेहरू से कई दफ़ा मिला. वे लंबे, सुदर्शन, व्यक्ति थे, नार्डिक नाक-नाक्श, सिर पर नुकीली गांधी टोपी. माओ की तुलना में उनमें कम आत्मविश्वास प्रतीत होता था, लेकिन उनके व्यवहार में तानाशाही बिल्कुल नहीं थी. वे देखने से ही ईमानदार लगते थे. जब पहली बार हमारी भेंट हुई, तो मैंने बड़े विस्तार से बताया, कि चीनियों ने हमारी शांतिप्रिय धरती पर आक्रमण किया, कि ऐसे शत्रु से लड़ने की शक्ति हमारे देश में नहीं है. जैसे ही मुझे यह ज्ञान हो गया कि दुनिया का कोई भी देश हमारी स्वाधीनता के न्यायपूर्ण दावे को स्वीकार करने को तैयार नहीं है, उस समय से मैं किस प्रकार बड़ी कठिनाई से चीनियों को सहन करने का प्रयत्न कर रहा हूं.

पहले तो वे मेरी बात सुनते रहे और नम्रता से सिर हिलाते रहे. लेकिन मेरा ख्याल है कि मेरी कहानी जरा ज्यादा ही भावुक और लंबी थी, इसलिए कुछ देर बाद उनका ध्यान टूट गया, जैसे नींद आने लगी हो. अंत में उन्होंने जैसे धीरज खोते हुए कहा कि, ‘आपको समझना चाहिए कि भारत आपकी सहायता नहीं कर सकता.’ वे बड़ी सुंदर और स्पष्ट अंग्रेजी में बोल रहे थे और ये शब्द कहते हुए उनका निचला होंठ इस तरह कंपित हुआ जैसे उनकी आवाज के साथ ताल मिला रहा हो.

2- जवाहरलाल नेहरू से अपनी पहली मुलाकात का जिक्र करते हुए दलाई लामा ने अपनी किताब में बताया है कि नेहरू ने उन्हें भारत में शरण देने से इंकार करते हुए अपने देश लौट जाने की सलाह दी थी मगर साथ ही चीन के साथ संवाद करने में उनकी मदद का आश्वासन भी दिया था. दलाई लामा बताते हैं कि उन्होंने जहां नेहरू जी की सलाह मान ली, वहीं नेहरू ने भी अपना किया हुआ वादा निभाया. अपनी इस किताब में उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया है कि पहली बार भारत में उन्हें रहने की अनुमति देने से इंकार करने के बावजूद जब वे तिब्बत छोड़कर भारत पहुंचे तो नेहरू जी की तरफ से एक तार उन्हें एक आत्मीय संदेश प्राप्त हुआ था:

‘ल्हासा छोड़ने के तीन सप्ताह बाद हम भारत पहुंच गए, यद्यपि हमें लग रहा था कि एक युग बीत गया है. यहां मुझे प्रधानमंत्री नेहरू जी का यह तार मिला:

मैं और मेरे सहयोगी भारत सुरक्षित पहुंच जाने के लिए आपका स्वागत करते हैं. हमें आपको, आपके परिवार को तथा साथियों को भारत में निवास के लिए आवश्यक सुविधाएं प्रदान करने में प्रसन्नता होगी. भारत की जनता, जिसके मन में आपके प्रति गहरा भक्तिभाव है, आपको सदा अपना पारम्परिक आदर प्रदान करती रहेगी. सद्भावनापूर्वक – नेहरू.’

3- दलाई लामा द्वारा जवाहरलाल नेहरू को आत्मकेंद्रित बताए जाने के पीछे उनका निजी अनुभव भी हो सकता है. उनकी आत्मकथा से ही पता चलता है कि तिब्बत की मदद करने के साथ-साथ चीन के साथ मैत्री बनाए रखने का दबाव भी नेहरू पर था, इसलिए कुछ मौकों पर दलाई लामा की बात न मानने के अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं था.

‘24 अप्रैल को पंडित नेहरू स्वयं मसूरी आए. हम चार घंटे तक, एक दुभाषिए की सहायता से, अकेले बातें करते रहे. मैंने उन्हें पिछली दफा तिब्बत लौटने से लेकर – मैंने उन्हें बताया कि उन्हीं के आग्रह पर मैं वापस लौटा था – अब तक हुई एक-एक घटना बताई. मैंने बताया कि मैंने वही सब कुछ किया जो उन्होंने मुझसे कहा था, चीनियों के साथ सही और ईमानदारी से व्यवहार किया, जहां जरूरी समझा उनकी आलोचना भी की और सत्रहसूत्री अनुबंध का भरपूर पालन करने चेष्टा की. फिर मैंने स्पष्ट किया कि आरंभ में मैं भारत का आतिथ्य नहीं चाहता था बल्कि ल्हुन्त्से ज़ोंग में अपनी सरकार स्थापित करना चाहता था. ल्हासा से खबर मिलने के बाद मेरा दिमाग बदला. यह बात सुनकर वे चिढ़-से गए. बोले – ‘लेकिन भारत सरकार तो इसे मान्यता नहीं दे सकती थी, आप भले ही देते.’ उनके रुख का मुझ पर कुछ ऐसा प्रभाव पड़ा जैसे वे मुझे बच्चा समझते हैं जिसे थोड़ी-थोड़ी देर बाद डांटते रहने की जरूरत होती है.

बातचीत के दौरान वे अक्सर मेज पर घूंसा जमा देते थे. एक-दो बार उन्होंने गुस्से में मुझसे पूछा – ‘ऐसा कैसे हो सकता है?’ लेकिन मैं, यह जानकर भी कि उनका व्यवहार कुछ दबंग की तरह होता है, अपनी बात कहता रहा. अंत में मैंने उनसे स्पष्ट कहा कि अब मेरे उद्देश्य दो हैं – ‘मैं तिब्बत को स्वाधीन करने के लिए दृढ़संकल्प हूं, और इस समय मैं चाहता हूं कि रक्तपात रोका जाए.’ यह सुनकर तो वे अपना आपा खो बैठे. उन्होंने बड़ी तीखी आवाज में कहा- ‘यह संभव नहीं है! एक तरफ तो आप कहते हैं कि मुझे तिब्बत की स्वतंत्रता चाहिए और उसी के साथ यह कि आप रक्तपात नहीं चाहते! असंभव है यह!’ यह कहते हुए उनका निचला होंठ कांपने लगा था.’

4- लेकिन पिछले उदाहरण से यह साबित नहीं होता कि नेहरू एक आत्मकेंद्रित व्यक्ति थे. वह भी तब जब तिब्बत के धर्मगुरू, खुद यह बताते हैं कि नेहरू जी ने किस तरह भारत में बसने में तिब्बती जनता की दोनों हाथ खोलकर मदद की थी. न सिर्फ उनके लिए रहने और रोजगार का इंतजाम किया बल्कि सबसे ज्यादा जोर वे तिब्बती बच्चों की शिक्षा पर दे रहे थे. दलाई लामा ने इसका जिक्र करते हुए लिखा है कि जिस तेजी से ये काम हो रहे थे, वे उससे खासे प्रभावित थे -

‘मैंने नेहरू जी से कहा कि यदि इन लोगों को, जहां जैसे हैं, वैसे ही छोड़ दिया जाएगा तो ज्यादातर लोग मर जाएंगे. यह सुनकर वह चिढ़े-से नजर आए. कहने लगे कि मैं बहुत ज्यादा उम्मीद कर रहा हूं. मुझे याद रखना चाहिए कि भारत एक गरीब विकासशील देश है. लेकिन शीघ्र ही उनकी मानवता जागने लगी. पहले ही भारतीय अधिकारियों से काशाग की बात हो गई थी कि उत्तर भारत के सड़क शिविरों में शरणार्थियों को काम पर लगाया जाए, और अब नेहरू जी ने कहा कि वे जल्द इसकी व्यवस्था कराएंगे. इससे उनकी रोज़ी-रोटी का प्रबंध भी हो जाएगा और रहने के लिए भी ज्यादा उपयुक्त स्थान प्राप्त हो जाएंगे.

इसके बाद उन्होंने शरणार्थियों के बच्चों की शिक्षा के बारे में बात करनी शुरू की, और बहुत जल्द इसकी योजनाएं इतने उत्साह से बनाने लगे कि मीटिंग समाप्त होते समय यह लगने लगा कि इसे उन्होंने अपना व्यक्तिगत मसला बना लिया है. उन्होंने कहा कि जहां तक उनका अपना सवाल है, वे हमें काफी समय के लिए भारत का मेहमान मानते हैं, और हमारे बच्चे ही हमारे भविष्य की सबसे मूल्यवान सम्पत्ति हैं. उन्हें बहुत अच्छी शिक्षा मिलनी चाहिए. और तिब्बती संस्कृति को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि उनके लिए अलग स्कूलों की व्यवस्था की जाए. भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वतंत्र सोसायटी फॉर तिब्बतन एजुकेशन होना चाहिए. उन्होंने कहा कि इन सब स्कूलों का व्यय भी भारत सरकार ही वहन करेगी. (आज तक वह इस कार्यक्रम का अधिकांश व्यय वहन कर रही है.)

अंत में उन्होंने मुझे सचेत करते हुए कहा कि यद्यपि यह आवश्यक है कि बच्चों को अपने इतिहास तथा संस्कृति का भरपूर ज्ञान हो, यह भी जरूरी है कि उन्हें आधुनिक दुनिया की भी जानकारी हो. मैं इससे पूरी तरह सहमत था. इसलिए उन्होंने कहा कि शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी को बनाना सही होगा – क्योंकि वह भविष्य की विश्वभाषा है.

5- दलाई लामा, नेहरू जी के उदारवादी रवैये का जिक्र भी करते हैं. वे बताते हैं कि नेहरू के मशविरे के खिलाफ जाने पर भी जब उन्हें संयुक्त राष्ट्रसंघ में पहली सफलता हासिल हुई तो भारतीय प्रधानमंत्री ने खुले दिल से उन्हें बधाई दी. वे लिखते हैं कि –

‘दिसंबर में मैंने फिर दिल्ली के लिए छह घंटे की यात्रा की, जो मेरी नई तीर्थ यात्रा का पहला चरण था. मैं उन स्थानों पर ज्यादा समय बिताना चाहता था, जहां मैं सन 1957 के आरंभ मे गया था. जाने से पहले मैं नेहरू जी से मिलने गया. मुझे इस बात की चिंता थी कि राष्ट्रसंघ में पारित प्रस्ताव के प्रति उनका क्या रुख होगा और आधी संभावना यही थी कि वे इससे चिढ़े हुए होंगे. लेकिन उन्होंने गर्मजोशी से मुझे बधाई दी. अब मेरी समझ में यह आने लगा कि कभी-कभी अपनी उग्रता के बावजूद वे बहुत उदार व्यक्ति हैं. एक बार फिर मुझे लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ पता चला. यद्यपि मैंने उनकी राय को ठुकरा दिया था, लेकिन तिब्बतियों के प्रति उनके व्यवहार में कोई अंतर नहीं आया था. इसका परिणाम यह हुआ कि अब मैं उनकी बातों पर ज्यादा ध्यान देने लगा. यह चीन में हुए मेरे अनुभव के एकदम विपरीत था. नेहरू जी ज्यादा मुस्कुराते नहीं थे. वे उत्तर देने से पहले चुपचाप बात को सुनते थे, और उनका जरा-सा बाहर निकला होंठ धीरे-धीरे हिलता रहता था. वे बेबाक ईमानदारी से बात करते थे. सबसे बड़ी बात यह थी कि उन्होंने मुझे अपनी आत्मा का आदेश मानने की स्वतंत्रता दे रखी थी. इसके विपरीत चीनी हर वक्त धोखे भरी मुस्कुराहटें फेंकते रहते थे.

दलाई लामा ने अपनी आत्मकता में कई बार और कई उदाहरणों से इस बात का जिक्र किया है कि जवाहरलाल नेहरू एक विवेकशील, बुद्धिमान और संवेदनशील व्यक्ति थे. दलाई लामा की छवि और भारत में तिब्बतियों की स्थिति और इतिहास को देखते हुए ऐसा लगता नहीं है कि उनका हालिया बयान राजनीति से प्रेरित होगा, लेकिन फिर भी यह उनकी ही पिछली बातों से मेल नहीं खाता है. मजे-मजे में यह कहा जा सकता है कि लगभग तीस साल पहले जब दलाई लामा ने आत्मकथा लिखी थी, तब उनकी स्मृति अच्छी रही होगी और ये घटनाएं बीते भी ज्यादा समय नहीं हुआ रहा होगा. इसलिए उनके कहे से ज्यादा, उनके लिखे पर भरोसा करना अधिक सही जान पड़ता है.