2019 के लोकसभा चुनाव से पहले राज्यसभा के उपसभापति का चुनाव महागठबंधन के शक्ति परीक्षण जैसा था. इसका परिणाम जब आया तो राज्यसभा में ऐसा ही कोई सांसद होगा जो चौंका होगा. क्योंकि इस इम्तेहान का पर्चा पहले ही ‘लीक’ हो गया था. पिछले चार साल में यह पहला चुनाव होगा जिसे राहुल गांधी जीत सकते थे और मोदी-अमित शाह की जोड़ी के इसमें हारने की पूरी संभावना थी. चुनाव से दो दिन पहले तक पूरा मैच 109-109 वोट पर टाई था. लेकिन आखिर के 48 घंटे में राहुल पिछड़ गए और मोदी-अमित शाह ने गैरों को अपना बना लिया. यह काम सिर्फ अमित शाह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी नहीं कर सकती थी. इसलिए जानबूझकर नीतीश कुमार के उम्मीदवार को चुना गया ताकि वोट मांगने की शुरुआत नीतीश करें. संसद के अंदर और बाहर की खबर रखने वाले सूत्रों की मानें तो नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने राज्यसभा के नंबर दो की कुर्सी के जरिए तीन बड़े प्रयोगों का सफल परीक्षण कर लिया.

नीतीश कुमार 2019 तक नरेंद्र मोदी के साथ

बिहार से दिल्ली तक खबर उड़ी थी कि नीतीश कुमार और भाजपा में अंदर ही अंदर झगड़ा चल रहा है और 2019 से पहले नीतीश कुमार या तो खुद एकला चलो रे की राह पकड़ेंगे या फिर भाजपा उनसे संबंध-विच्छेद करेगी. लेकिन अकाली दल का मोह छोड़कर नीतीश कुमार के करीबी माने जाने वाले पूर्व पत्रकार हरिवंश को एनडीए का उपसभापति उम्मीदवार बनाना भाजपा की रणनीति का एक गुप्त हथियार है. जनता दल यू से संबंध रखने वाले एक नेता की मानें तो नीतीश को भी शुरु में अंदाज़ा नहीं था कि भाजपा उन्हें ऐसा ऑफर देगी. अकाली दल तो मानकर बैठी थी कि नरेश गुजराल को एनडीए उम्मीदवार बनाया जाएगा. लेकिन पटना में अमित शाह और नीतीश कुमार की मुलाकात के दौरान जो भरोसे की कमी महसूस हुई थी उसे पूरा करने के लिए मोदी ने यह मास्टरस्ट्रोक चला.

नीतीश कुमार के एनडीए में शामिल होने के बाद भी भाजपा ने उनके किसी सांसद को मोदी मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया जबकि बिहार में भाजपा के विधायक नीतीश मंत्रिमंडल में मंत्री और उपमुख्यमंत्री तक हैं. पटना की तरह ही दिल्ली में भी यह रिश्ता दीर्घकालिक दिखे इसलिए मोदी ने खुद नीतीश कुमार से राज्यसभा के उपसभापति के लिए नाम मांगा और नीतीश ने हरिवंश का नाम सुझाया. इस कदम से नीतीश इसलिए भी खुश हुए क्योंकि एनडीए में शामिल होने के बाद पहली बार उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री से आगे बढ़कर अपने राष्ट्रीय नेता के कद का एहसास हुआ. इसके बाद नीतीश कुमार ने अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से लेकर ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर को फोन किया और उनसे संमर्थन मांगा. पटना से खबर आई कि जब हरिवंश चुनाव जीत गए तो नीतीश की खुशी देखने लायक थी. उन्होंने खुद फोन कर नेताओं को धन्यवाद दिया. नीतीश के आस-पास के लोगों का कहना है कि मोदी-शाह के एनडीए में नीतीश की वापसी पहले हुई लेकिन इसमें भरोसे का सीमेंट अब जाकर लगा है.

मोदी का महागठबंधन तैयार राहुल को महागठबंधन का इंतजार

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह 2018 में ही महागठबंधन की हवा खराब करना चाहते हैं. राहुल गांधी, अखिलेश यादव, मायावती और तेजस्वी यादव बार-बार महागठबंधन शब्द का इस्तेमाल करते सुनाई देते हैं. लेकिन असली महागठबंधन बनाने की तैयारी मोदी-शाह ने शुरू कर दी है. भाजपा के एक राज्यसभा सांसद ने आगे की राजनीति की तरफ इशारा करते हुए कहा कि मोदी-अमित शाह उस हालात की तैयारी करके बैठे हैं जब अगर सरकार बनाने के लिए 20-30 सीटें कम पड़ जाए तो उनका इंतजाम कहां से होगा? कुछ लोगों को ऐसा लग सकता है कि नवीन पटनायाक और केसीआर ने सिर्फ राज्यसभा में एनडीए का साथ दिया लोकसभा में इनका रुख अलग होगा. लेकिन इसकी संभवना कम है. इन दोनों नेताओं से मोदी के अपने अच्छे निजी संबंध हैं. इसलिए चंद्रबाबू की शिकायत करते वक्त नरेंद्र मोदी ने लोकसभा के अंदर के चंद्रशेखर राव की जमकर तारीफ की थी और चंद्रबाबू की तुलना में उन्हें ज्यादा समझदार बताया था.

इसी तरह ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से उनके राज्य में भाजपा अब भी कुश्ती के मूड में है लेकिन दिल्ली में दोस्ती जारी है. कुछ लोगों को ऐसा लगता है कि इन दोनों नेताओं से भाजपा चुनाव पूर्व समझौता कर सकती है. लेकिन भाजपा की तरफ से 2019 की रणनीति बनाने वाले संघ के एक प्रचारक ने बताया कि तेलंगाना हो या ओडिशा इन दोनों राज्यों में भाजपा अकेले चुनाव लड़ेगी ताकि कांग्रेस को तनिक भी जगह न मिल सके. चुनाव के बाद अगर जरूरत पड़ी तो नवीन बाबू या केसीआर की मदद ली जा सकती है. नवीन पटनायक और केसीआर भी अपने राज्य में कांग्रेस को दोबारा ज़िंदा नहीं होने देना चाहते इसलिए इनके लिए भी मुफीद है कि ये अपने अपने सूबे में भाजपा विरोध की सियासत करें और दिल्ली में मोदी से दोस्ती बनाए रखें.

बीजेडी के एक पूर्व सांसद जो नवीन बाबू के बेहद करीब हैं उन्होंने बताया कि इस पूरे प्रकरण में कमी राहुल गांधी की तरफ से है. अब तक राहुल गांधी ने एक बार भी खुलकर नवीन पटनायक की तरफ दोस्ती का हाथ नहीं बढ़ाया है. जबकि प्रधानमंत्री महीने में चार-पांच बार नवीन बाबू से बात करते रहते हैं. कांग्रेस के कुछ नेताओं को शायद यह गलतफहमी है कि नवीन पटनायक अगला विधानसभा चुनाव भाजपा के खिलाफ लड़ेंगे इसलिए मजबूर होकर कांग्रेस को ही समर्थन देंगे. लेकिन ओडिशा की जमीनी हकीकत उत्तर प्रदेश-बिहार से अलग है. विधानसभा चुनाव नवीन पटनायक अपने लिए लड़ सकते हैं और चुनाव के बाद लोकसभा में मोदी का साथ दे दें तो इससे उनकी साख पर कोई फर्क नहीं पड़ता.

उत्तर प्रदेश में अखिलेश अलग रास्ते निकले

राज्यसभा के उपसभापति का चुनाव खत्म होने के बाद पहली कड़ी प्रतिक्रिया मुलायम सिंह यादव की आई. जब संसद में पत्रकारों ने उनसे पूछा तो नेताजी ने तपाक से जवाब दिया कि महागठबंधन अब नहीं बचा है. जब तक उत्तर प्रदेश में सीटों का बंटवारा नहीं हो जाता महागठबंधन की बातें हवा-हवाई है. अखिलेश भी अब राहुल के न्योते का इंतजार नहीं करना चाहते. वे उत्तर प्रदेश में साइकिल यात्रा पर निकलने वाले हैं. समाजवादी पार्टी के एक पूर्व सांसद ने हताश होकर ही सही पर बता दिया कि अब लगता है अखिलेश को अगला लोकसभा चुनाव मायावती और राहुल गांधी के बिना भी लड़ना पड़ सकता है. अखिलेश अब और देर करना नहीं चाहते इसलिए उन्होंने 2019 के चुनाव प्रचार को अकेले दम पर बढ़ाने का फैसला कर लिया है. अगर मायावती ने साथ दिया तो ठीक वरना वे अपने उम्मीदवार को जिताने और मायावती-राहुल के साझा उम्मीदवार को हराने से भी पीछे नहीं हटेंगे. भाजपा भी इसी मौके की तलाश में है जब अखिलेश की साइकिल अकेले सड़क पर निकले.