उत्तराखंड हाई कोर्ट ने खुद को राज्य की गायों का कानूनी संरक्षक नियुक्त करते हुए कई निर्देश दिए हैं. हाई कोर्ट ने शुक्रवार को मौखिक रूप से यह आदेश दिया था जिसे सोमवार को लिखित में जारी किया गया. हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक उत्तराखंड हाई कोर्ट के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा और जस्टिस मनोज कुमार तिवारी ने कहा, ‘गायों और दूसरे आवारा मवेशियों की भलाई के लिए कोर्ट देश के कानूनी संरक्षक होने के सिद्धांत का इस्तेमाल करते हुए अनिवार्य निर्देश जारी करता है.’ खबर के मुताबिक यह सिद्धांत कोर्ट को ऐसी चीजों का संरक्षक होने की अनुमति देता है जो खुद का खयाल रखने की स्थिति में नहीं होतीं.
कोर्ट ने हरिद्वार के रहने वाले एक किसान आलिम अली की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया. अली का कहना था कि आवारा मवेशियों को मारा जा रहा है और बूचड़खाने से निकला उनका खून पानी वाली जगहों पर जाकर मिल रहा है. इस पर आदेश देते हुए कोर्ट ने गायों के लिए 25 गांवों के समूह वाला एक आश्रय स्थल बना दिया है और गायों को मारने पर प्रतिबंध लगा दिया है. साथ ही, अदालत ने मारने के मकसद से किसी भी गाय, बैल या बछड़े के निर्यात पर भी रोक लगा दी है. वहीं, इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक कोर्ट ने पूरे उत्तराखंड में बीफ और बीफ उत्पादों पर भी रोक लगा दी है. कोर्ट ने सभी सर्किल अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे ग्रामीण इलाकों में 24 घंटों में एक बार गश्त जरूर लगाएं ताकि गायों की रक्षा सुनिश्चित हो सके.
उत्तराखंड गोवंश संरक्षण अधिनियम के तहत राज्य में गायों, बैलों और बछड़ों को काटे जाने पर पहले से प्रतिबंध लगा हुआ है. इसका उल्लंघन करने पर दस साल तक का कारावास या दस हजार रुपये का जुर्माना या दोनों का प्रावधान है. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि इस कानून के तहत उन लोगों के खिलाफ भी मामले दर्ज किए जाएं जिन्होंने अपनी गायों को सड़कों और सार्वजनिक जगहों पर छोड़ दिया है. कोर्ट ने कहा कि कुमाऊं और गढ़वाल इलाके में जानवरों की रक्षा करने के लिए विशेष जत्था बनाया जाए जिसका नेतृत्व कम से कम पुलिस उप-अधीक्षक के रैंक वाला अधिकारी करेगा. इसके अलावा जत्थे में एक पशु चिकित्सक को भी बतौर सदस्य शामिल किया जाए.
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