लाल किले की प्राचीर से नरेंद्र मोदी ने करीब डेढ़ घंटे लंबा भाषण दिया. इस कार्यकाल में प्रधानमंत्री के तौर पर उनके पास यह आखिरी मौका था जब वे लाल किले से अपनी सरकार का रिपोर्ट कार्ड सौंप सकते थे. लाल किले पर मौजूद भाजपा के ही एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक प्रधानमंत्री का भाषण अच्छा तो था लेकिन ऐसा नहीं था जिस पर 2019 के चुनाव प्रचार का शिलान्यास किया जा सके.

नरेंद्र मोदी के भाषण को सुबह-सुबह जगकर राहुल गांधी ने भी गौर से सुना और उनके करीबी बताते हैं कि कांग्रेस राहत में है कि करीब सवा चार साल सरकार चलाने के बाद भी मोदी ने ऐसा कोई बंपर ऐलान वाला अचूक शस्त्र नहीं छोड़ा जिसकी काट कांग्रेस न ढूंढ सके.

अब लोकसभा चुनाव में सिर्फ आठ महीने बचे हैं और संघ के एक प्रचारक की मानें तो मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने में एक बड़ा व्यवधान अभी मौजूद है. 2014 का चुनाव प्रचार इस बात पर लड़ा गया कि मोदी 60 महीने में 60 साल की बीमारी का इलाज़ कर देंगे. लेकिन 50 महीने बीत जाने के बाद भी मोदी सरकार के पास ऐसा कोई रामबाण नहीं है जिसे वह अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बता सके.

संघ के प्रचारक आगे समझाते हुए बताते हैं कि ‘मोदी सरकार के पास कामयाबी के तौर पर खुदरा योजनाएं तो हे जैसे कि उज्जवला, मुद्रा, आयुष्मान, जनधन योजना आदि. लेकिन एक पॉलिटिकल सर्जिकल स्ट्राइक की कमी आज भी महसूस हो रही है. कुछ ऐसा जिसके बल पर 2019 में कहा जा सके कि यह तो सिर्फ मोदी ही कर सकते हैं इसलिए दोबारा उन्हें प्रधानमंत्री बनाओ.’

भाजपा के बड़े-बड़े नेता इन दिनों मंथन कर रहे हैं, एक ऐसा विजय-मंत्र ढूंढ रहे हैं जिससे दोबारा मोदी लहर पैदा की जा सके. देश के लिए सिर्फ मोदी ही कड़े और बड़े फैसले ले सकते हैं ऐसा संदेश भाजपा 2019 में देना चाहती है. इस संदेश का आधार बन सकते हैं लोक सभा के साथ देश के कई राज्यों के विधानसभा चुनाव.

लालकिले पर नरेंद्र मोदी ने एक बात कही थी जिस पर मीडिया की ज़्यादा नज़र नहीं पड़ी - मेरे लिए दलहित से बड़ा देशहित है. दरअसल यही पंक्ति 2019 के चुनाव प्रचार के लिए उनकी पंचलाइन बन सकती है. भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के करीब रहने वाले कुछ नेताओं से अनौपचारिक बातचीत के बाद पता चला कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी 2019 में सियासत का सबसे बड़ा जोखिम उठाने वाली है. एक ऐसा फॉर्मूला तैयार किया जा रहा है जिससे देश में लोकसभा के साथ-साथ 10-11 राज्यों के विधानसभा चुनाव भी हो जाएं.

2018 के आखिर-आखिर में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव होने हैं. हाल ही में हुए एक समाचार चैनल के ओपीनियन पोल में बताया गया कि भाजपा के हाथ से ये तीनों राज्य निकल सकते हैं. यह वही चैनल है जो हाल में सुर्खियों में रहा और संपादक के इस्तीफे के बाद अब इसे भी ‘मोदीभक्त’ चैनल की संज्ञा सोशल मीडिया पर मिलने लगी है. भाजपा के अंदर भी ऐसी रिपोर्ट मिली है कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मुकाबला कांटे का है लेकिन राजस्थान में पार्टी की हार तय है.

मध्य प्रदेश में कांग्रेस के लिए अच्छी बात यह है कि दशकों बाद सिंधिया, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह गुट एक साथ चुनाव लड़ने के मूड में दिख रहे हैं. कांग्रेस के एक सांसद ने इस एकजुटता की वजह भी खोली, उन्होंने बताया कि राहुल गांधी की तरफ से तीनों ही नेताओं को साफ संदेश दिया गया है कि जो इस बार गड़बड़ करेगा उसका सियासी वनवास तय है. दिल्ली में भाजपा नेतृत्व और भोपाल में शिवराज दोनों ही कांग्रेस के अंदर लगे फेवीकोल के इस नये जोड़ को तोड़ने में अभी असफल हो रहे हैं.

मोदी-शाह और संघ नेतृत्व तीनों को ही यह आभास है कि अगर मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव परिणाम राहुल गांधी के पक्ष में आ गए तो बाकी विरोधी पार्टियां भी उन्हें अपना नेता मान सकती है. इस वजह से 2019 के शुरुआती महीनों में मोदी लहर के उलट एंटी मोदी लहर का प्रसार-प्रचार शुरू हो सकता है. इसलिए एक नए पहलू पर विचार किया जा रहा है: मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही तीनों राज्यों के मुख्यमंत्री इस्तीफा दे दें और केंद्र सरकार यहां राष्ट्रपति शासन लगा दे. इसके बाद कहा यह जाए कि भारत का पैसा बचाने के लिए देश में लोक सभा के साथ ही विधानसभा के भी चुनाव होंगे.

इसी तरह 2019 के लोकसभा चुनाव के साथ-साथ ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और मिजोरम में भी चुनाव होने हैं. यहां भाजपा की सरकारें नहीं है इसलिए चुनाव तय समय पर ही होंगे. भाजपा नेतृत्व को उम्मीद है कि अगर मोदी लहर का निर्माण हो पाया तो इन चार राज्यों में भी पार्टी को फायदा हो सकता है.

2019 के आखिर में महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड में चुनाव तय हैं. यहां की विधानसभा का कार्यकाल 2019 में पूरा हो रहा है. इन तीन राज्यों में भी भाजपा सरकारें ही हैं और लोकसभा चुनाव परिणाम का सीधा असर यहां होने वाले विधानसभा चुनाव पर भी पड़ना तय है. 2014 में भी ऐसा ही हुआ था जब हरियाणा जैसे राज्य में, जहां भाजपा कभी दहाई के आंकड़े के लिए भी तरसती थी, भाजपा की सरकार बन गई. यह 2014 की मोदी लहर का ही उफान था जो शिवसेना से अलग चुनाव लड़कर भी देवेंद्र फड़णवीस को भाजपा ने महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बना दिया.

महाराष्ट्र में शिवसेना अपना मुख्मंत्री बनाने पर अड़ी है इसलिए यहां भाजपा के साथ उसका गठबंधन किसी भी वक्त टूट सकता है. भाजपा में राय बन चुकी है कि अगर अलग चुनाव लड़ना ही है तो क्यों न लोकसभा के साथ ही यहां विधानसभा का चुनाव भी करा लिया जाए ताकि मोदी के नाम पर एक साथ दो वोट मिल सकें. झारखंड में भी यह तय है कि कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा चुनाव साथ लड़ेंगे इसलिए भाजपा यहां भी लोकसभा के साथ ही विधानसभा चुनाव में भी दो-दो हाथ कर लेना चाहती है.

भाजपा को सबसे बड़ा फैसला बिहार का करना है. बिहार में 2020 में विधानसभा के चुनाव होने हैं. नीतीश की पार्टी जनता दल यूनाइटेड भी एक साथ चुनाव कराने की पैरवी करती रही है. अगर यहां पर भी ऐसा हो सका तो लोकसभा की ज्यादातर सीटों पर भाजपा चुनाव लड़ेगी और विधानसभा की ज्यादातर सीटों पर नीतीश अपने उम्मीदवार उतारेंगे. इससे दोनों के बीच झगड़े का एक बड़ा मसला भी सुलझ जाएगा.

कुल मिलाकर अगर चुनाव आयोग ने हाथ खड़े नहीं किए तो भाजपा इसी मास्टरप्लान पर काम कर रही है कि देश में लोकसभा के साथ-साथ मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र, हरिय़ाणा, झारखंड, ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, मिजोरम और बिहार के भी चुनाव करा लिए जाएं.