हमेशा एक खास अंदाज में ‘वॉओ’ कहकर सैफ अली खान की मिमिक्री की जाती रही है. अच्छी बात यह है कि अपनी पहली फिल्म ‘परंपरा’ में उन्होंने एक भी बार यह शब्द नहीं कहा है. साल 1993 में आई यश चोपड़ा निर्देशित ‘परंपरा’ दो भाइयों के मिलने-बिछड़ने की परंपरागत कहानी दिखाती है. इसमें बड़े भाई आमिर खान और छोटे भाई सैफ अली खान बने थे. फिल्म के सेकंड हाफ में नजर आने वाले इन दोनों अभिनेताओं के ज्यादातर दृश्य साथ में हैं और इनमें से लगभग सभी में आमिर खान, सैफ पर भारी पड़ते नजर आते हैं. इसके बावजूद, सैफ की कुछ खासियतें आपका ध्यान खींचती हैं, हालांकि यह अलग बात है कि ये उनके अभिनय की नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व का हिस्सा हैं.

‘परंपरा’ में पहली झलक में कमजोर एक्सप्रेशन वाला क्लोजअप देने के बाद सैफ अली खान सीधे अभिनेत्री नीलम के साथ नाचते-गाते नजर आते हैं. ऐसा करते हुए वे अपनी नवाबी स्टाइल और रिची-रिच मार्का लुक से खासा प्रभावित करते हैं. उनके इस अंदाज ने तब दर्शकों का ध्यान जरूर खींचा होगा, लेकिन इतना नहीं कि उससे उनके अभिनय की कमियां ढंक जाएं. इस फिल्म से यही अंदाजा लगता है कि उस वक्त तक सैफ अभिनय का सिर्फ ‘ए’ ही सीख पाए थे और ‘बी’ उनसे बहुत दूर था.

फिल्म के जरूरत से ज्यादा हिंदीनिष्ठ संवादों को बोलते हुए अंग्रेजी मिजाज के सैफ को खासी दिक्कत होती है, इसका पता भी कुछ दृश्यों से चलता है. यहां आशीर्वाद, पुत्र या परंपरा जैसे शब्द बोलते हुए उनके बोलने में आने वाला अतिरिक्त ठहराव आपको भली तरह से महसूस होता है. हालांकि ‘परंपरा’ के प्रताप सिंह को देखते हुए इस बात का अंदाजा कतई नहीं लग पाता है कि यही अभिनेता आगे जाकर ओमकारा में लंगड़ा त्यागी बनकर धूम मचा देने वाला है या नेटफ्लिक्स की सेक्रेड गेम्स सीरीज में सरताज सिंह बनकर लोगों को दीवाना बनाने वाला है.

परंपरा में सैफ अच्छा अभिनय भले न कर सके हों, लेकिन उन्होंने अच्छा डॉन्स जरूर किया है. डॉन्स, एक्शन, स्टाइल और उनका बेहद हैंडसम होना ही वे चीजें थीं, जो उनकी पहली फिल्म, और उसके बाद की कई फिल्मों में उन्हें देखने लायक बनाए रखती हैं. उस समय सुनील दत्त जैसे दिग्गज अभिनेता और आमिर खान जैसे नए-नवेले लेकिन परफेक्शनिस्ट अभिनेता के सामने काम करते हुए अगर कोई नोटिस होने की ताब भी रखता है तो यह इस बात का इशारा जरूर था कि वह फिल्मों में लंबी रेस दौड़ने वाला है.

कुल मिलाकर, सैफ की पहली फिल्म से यह भले न पता चलता हो कि वे कैसे अभिनेता हैं लेकिन उस समय भी देखने वालों को यह जरूर एहसास हो गया होगा कि कोई सुदर्शन चेहरा हमारे बीच है जिसे यूं ही नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. यही कारण है कि आज हमारे पास कॉकटेल, आरक्षण, परिणीता, दिल चाहता है, लव आज कल जैसी कुछ खास फिल्में हैं, जिनका नायक आदर्श न होते हुए भी दिलचस्प जरूर है. और हां, बुलेट राजा भी है.