1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद मैं अपने टीवी शो ‘आईविटनेस’ में उन पर एक श्रद्धांजलि कार्यक्रम करने पर विचार कर रहा था. हमारी योजना थी कि हम इसमें विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को बुलाएंगे और राजीव से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण यादों को साझा करने को कहेंगे. इसके पीछे मकसद यह था कि इसके जरिये लोगों के सामने राजीव के पूरे व्यक्तित्व और लोगों से उनके जुड़ाव पर नजर डाली जा सकी. इसके लिए जब मैंने अटलजी से संपर्क किया तो उन्होंने सोचकर बताने को कहा.

जब इस बारे में दोबारा अटलजी से मुलाकात हुई तो उनसे जो बातचीत हुई उसने हमारे श्रदांजलि कार्यक्रम में एक दिल को छू लेने वाला लम्हा जोड़ दिया. अटलजी ने बातचीत की शुरुआत ही कुछ यूं की- ‘राजीव के बारे में बोलने पर मुझे खुश होगी. लेकिन मैं उनके बारे में बतौर नेता विपक्ष नहीं बोलना चाहूंगा क्योंकि यह पद मुझे इस बात की इजाजत नहीं देगा कि मैं राजीव के बारे में वह बोलूं जो मैं बोलना चाहता हूं. मैं उनके बारे में एक मनुष्य के तौर पर कुछ ऐसा बोलूंगा जिसे उनके सार्वजनिक जीवन में शायद किसी ने नहीं देखा है.’ अटल जी ने कहा,अगर आपको यह ठीक लगे तो मैं आपके श्रद्धांजलि कार्यक्रम में हिस्सा लेने को तैयार हूं.

मुझे ठीक से अंदाजा नहीं था कि अटल जी के दिमाग में क्या चल रहा है. यह प्रस्ताव ठीक तो लग रहा था,लेकिन मैं थोड़ा और जानना चाहता था. सो मैंने उन्हें कुरेदा कि आखिर वे क्या कहना चाहते हैं? तब बात साफ हुई.

वास्तव में प्रधानमंत्री बनने के शुरुआती सालों में ही राजीव गांधी को मालूम पड़ा कि अटलजी को कुछ किडनी संबंधी समस्या है और उन्हें इलाज की जरूरत है. राजीव गांधी ने उन्हें बुलाया और न्यूयार्क में होने वाले संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिवेशन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के साथ जाने का अनुरोध किया. अटलजी के मुताबिक राजीव गांधी ने कहा, ‘मुझे उम्मीद है कि आप मेरा अनुरोध मान लेंगे और अपना इलाज भी करवायेंगे.’ अटलजी ने मुझे बताया कि मैंने वैसा ही किया,जैसा राजीव ने कहा था और संभवतः उसी से मेरी जिंदगी बची. अटलजी ने कहा, ‘राजीव गांधी की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु के बाद मैं यह बात सार्वजनिक रूप से कहना चाहता हूं. अब राजीव को धन्यवाद देने का यही तरीका है.’

विपक्षी नेता एक दूसरे के बारे में इस तरीके से बात नहीं करते. अगर कभी करते भी हैं तो एकांत में. लेकिन अटलजी इस बात को सार्वजनिक रूप से कहने के लिए दृढ़ थे. सबसे महत्वपूर्ण था कि वह जो कहना चाह रहे थे दिल से कहना चाह रहे थे. अटलजी की बात ने मेरे दिल को छुआ था और मैं जानता था कि इसका कुछ ऐसा ही प्रभाव दर्शकों पर भी होगा.

मैंने उनकी बात तुरंत मान ली.अगले दिन हमने रिकार्डिंग की. अटलजी वैसे ही बोले जैसा उन्होंने कहा था. बल्कि उन्होंने जिस तरह बोला वह उससे भी ज्यादा प्रभावशाली था जैसा उन्होंने हमें बताया था. उनके धीरे-धीरे बोलने के नपे-तुले तरीके और स्वाभाविक भावनाओं के मेल ने सभी पर अमिट छाप छोड़ी.

जब मैंने उन्हें इसके लिए धन्यवाद कहा तो उन्होंने उल्टे मुझे इस वाकये का जिक्र करने का मौका देने के लिए धन्यवाद कहा. उन्होंने कहा, ‘मैं बहुत समय से यह बात कहना चाह रहा था, लेकिन समझ नहीं पा रहा था कैसे कहूं. उन्होंने कहा कि अब उनके दिमाग से एक बोझ उतर गया.’

अटलजी मेरे साथ विशेष लगाव रखते हैं कि इसका दूसरी बार एहसास मुझे तब हुआ जब वे प्रधानमंत्री थे. गुयाना के राष्ट्राध्यक्ष आए थे और मुझे भी राष्ट्रपति भवन में आमंत्रित किया गया था. मैं अशोका हाल के एक ओर कुछ और मेहमानों के साथ खड़ा था. तभी प्रधानमंत्री जी आ गए. घुटनों की तकलीफ के कारण वे लिफ्ट से आए थे जो दूसरी तरफ थी. वे धीरे-धीरे एक कमरे की तरफ बढ़ रहे थे.

तभी एकाएक उन्होंने एकाएक हाथ हिलाया जैसे किसी को बुला रहे हों. किसी को पता नहीं था कि वे किसको बुला रहे हैं. कई लोग आगे बढ़े. इस पर अटल जी हंसने लगे और वे लोग पीछे लौट आए. काफी देर बाद मुझे एहसास हुआ कि वे मुझे बुले रहे थे. मैं उनके पास गया तो उन्होंने कहा कि मैं आपकी तरफ ही तो इशारा कर रहा था.

मैं उनके साथ आगे बढ़ा. दरअसल, इसके या दो दिन पहले ही मैंने एक लेख लिखा था और उसमें उनकी आलोचना की थी. मैं वही सोच रहा था कि अटलजी ने कहा, ‘आपका लेख मैंने पढ़ा था.’ यह कहकर वह हंसने लगे. शायद वे मुझे छेड़ रहे थे. खैर, मुझे इस पर कोई ग्लानि नहीं थी, लेकिन मैं थोड़ा असहज जरूर हो गया. मैंने उनसे बिना सोचे-समझे ही कह दिया, ‘मेरी मां ने भी वह लेख पढ़ा और मुझे पागल कहा.’ अटलजी ने जोर से ठहाका लगाया और कहा, ‘मां हमेशा गलत नहीं होती.’

इसके बाद उन्होंने दो-चार मिनट मेरे कंधे पर हाथ रखकर बात की. मुझे यह समझने में थोड़ा वक्त लगा कि प्रधानमंत्री मेरे बहाने बहुतों को बहुत कुशलता से एक संदेश दे रहे हैं. वहां मौजूद बहुत से लोगों ने मेरा लेख पढ़ा था, जिसमें अटलजी की आलोचना थी. अटलजी ने मेरे साथ मित्रवत व्यवहार कर बाकियों को भी संदेश दिया था कि प्रधानमंत्री आलोचना से घबराते नहीं हैं. एक अच्छे लोकतांत्रिक और बुद्धिमान राजनीतिज्ञ के तौर पर वे इससे ऊपर उठ चुके हैं.

मेरे लिए यह वाकया एक ठोस सबूत के तौर पर था कि अटलजी न केवल एक बेहतर इंसान हैं, बल्कि एक दक्ष राजनीतिज्ञ भी हैं. एक छोटी सी भाव-भंगिमा से उन्होंने कैसे एक बड़ा संदेश दे दिया. और सबसे बड़ी बात यह थी कि उनमें यह सब करने की बहुत सहज योग्यता थी. यह केवल एक उदाहरण था. उनके कई दशकों के राजनीतिक जीवन में इस तरह के हजारों मौके आए होंगे.

( यह लेख जाने-माने पत्रकार करण थापर की हाल में आई किताब ‘डेविल्स एडवोकेट’ के एक अध्याय ‘फोर मेमोरेबल प्राइम मिनिस्टर्स के एक अंश का अनुवाद है)