अटल बिहारी वाजपेयी नहीं रहे. वे तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे. हालांकि उनकी यह पहचान उनके राजनीतिक क़द का एक हिस्सा ही थी. उनकी छवि का दायरा यक़ीनन इससे बड़ा था. वे एक ऐसे सुलझे हुए नेता के रूप में जाने जाते रहे जिनका प्रतिद्वंद्वी भी बहुत सम्मान करते थे. इसीलिए उन्हें भारतीय राजनीति का अजातशत्रु कहा जाता था. वे भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से रहे. भाजपा आज जिस मुक़ाम पर है वहां उसे पहुंचाने में अटल बिहारी वाजपेयी ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई.

1980 में जब भारतीय जनसंघ से भाजपा बनी तो उसके पहले अधिवेशन में वाजपेयी ने यादगार भाषण दिया. उस भाषण में उनकी एक पंक्ति उनके बेहतरीन वक्ता होने की मिसाल मानी जाती है. उसमें भाजपा के भविष्य को लेकर उन्होंने विश्वास के साथ कहा था - ‘अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा.’ अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी बात को साबित किया और भाजपा को केंद्र की सत्ता तक पहुंचाने वाले पहले भाजपा नेता बने.

प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी छवि सबको साथ लेकर चलने वाले नेता की बनी. हालांकि, ऐसा भी नहीं था कि अटल बिहारी वाजपेयी का राजनीतिक जीवन शत-प्रतिशत विवादरहित रहा. बाबरी मस्जिद विध्वंस से पहले दिये उनके विवादित भाषण और गुजरात दंगों ने उनकी छवि पर सवाल उठाने के भी मौके दिये. बाबरी मस्जिद मामले में उन पर सांप्रदायिक होने के आरोप लगे, वहीं, गुजरात दंगों के दौरान वे लाचार दिखाई दिए.

लेकिन ये सभी स्पष्ट मामले हैं. इनसे अलग अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़े दो क़िस्से ऐसे भी हैं जिनकी सच्चाई ज्यादातर लोगों को नहीं पता. इसके बावजूद वाजपेयी कभी इनसे अपना पीछा नहीं छुड़ा पाए. इनमें से एक है उनका स्वतंत्रता सेनानियों के ख़िलाफ़ गवाही देना.

दरअसल अलग-अलग मौक़ों पर वाजपेयी पर यह आरोप लगता रहा उन्होंने 1942 में स्वतंत्रता सेनानियों के ख़िलाफ़ गवाही दी थी. फ़रवरी 1998 में फ़्रंटलाइन पत्रिका ने भी एक विशेष रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इसमें बताया गया कि एक सितंबर, 1942 के दिन अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वतंत्रता सेनानियों के ख़िलाफ़ गवाही दी थी.

बात उन दिनों की है जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था. यह आंदोलन नौ अगस्त, 1942 को शुरू हुआ था. उस समय अटल बिहारी वाजपेयी 16 साल के थे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सक्रिय सदस्य थे. जानकार दावा करते हैं कि आरएसएस ने भारत छोड़ो आंदोलन से दूरी बना कर रखी थी. रिपोर्ट में भी इस बात का ज़िक्र किया गया था.

बहरहाल, उन्हीं दिनों वाजपेयी के गांव बटेश्वर में एक घटना घटी. 27 अगस्त, 1942 को ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ गांव के बाज़ार में 200 की संख्या में लोग इकट्ठा हुए. बाद में उन्होंने वन विभाग की एक इमारत में तोड़फोड़ की. रिपोर्ट के मुताबिक़ उस समय अटल बिहारी वाजपेयी अपने भाई प्रेम बिहारी वाजपेयी के साथ वहां से कुछ दूर खड़े थे. इस घटना के अगले दिन पुलिस ने गांव में छापामारी की और कई लोगों को गिरफ़्तार कर आगरा जेल भेज दिया गया. वाजपेयी और उनके भाई भी उनमें शामिल थे. फ़्रंटलाइन को दिए इंटरव्यू में वाजपेयी ने ख़ुद यह बात मानी थी.

इस घटना के बाद एक सितंबर, 1942 को वाजपेयी ने मजिस्ट्रेट एस हसन के सामने एक बयान दिया. उन्होंने कहा, ‘27 अगस्त, 1942 को बटेश्वर बाज़ार में प्रदर्शनकारी इकट्ठे हुए थे.’ उन्होंने बताया कि ‘दोपहर क़रीब दो बजे ककुआ उर्फ़ लीलाधर और महुआ वहां आए और भाषण दिया. उन्होंने लोगों को वन क़ानूनों का उल्लंघन करने को राज़ी किया. (उसके बाद) 200 लोग वन विभाग के यहां गए. मैं अपने भाई के साथ उस भीड़ में शामिल था. मैं और मेरा भाई पीछे खड़े रहे. बाक़ी लोग इमारत में घुस गए. मैं वहां ककुआ और महुआ के अलावा किसी को नहीं जानता... मुझे लगा कि (इमारत की) ईंटें गिरने वाली हैं. मुझे नहीं पता दीवार कौन गिरा रहा था, लेकिन उसकी ईंटें निश्चित ही गिर रही थीं... मैं और मेरा भाई मयपुरा जाने लगे. भीड़ हमारे पीछे थी. जिन लोगों (ककुआ और महुआ) का ज़िक्र पहले किया वे मवेशियों के बाड़े से होते हुए बाहर निकल आए थे. उसके बाद भीड़ बिचकोली की तरफ़ जाने लगी. वन विभाग में दस-बारह लोग थे. मैं 100 ग़ज़ की दूरी पर खड़ा था. सरकारी इमारत गिराने में मेरा कोई हाथ नहीं था. उसके बाद हम अपने-अपने घर वापस लौट गए.’

इस बयान के बाद जज एस हसन ने अपनी टिप्पणी दर्ज कराई. उसमें उन्होंने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी को स्पष्ट कर दिया गया था कि वे बयान देने के लिए बाध्य नहीं हैं, और अगर वे ऐसा करते हुए कोई बात स्वीकार करते हैं तो उसका इस्तेमाल उनके ख़िलाफ़ हो सकता है. जज हसन ने कहा, ‘मुझे यक़ीन है कि यह बयान स्वेच्छा से दिया गया. यह मेरी सुनवाई के दौरान लिया गया और अटल बिहारी को पढ़ कर सुनाया गया. उन्होंने माना कि बयान सही है और पूरी ज़िम्मेदारी के साथ दिया गया है.’ वाजपेयी के उस बयान को उर्दू में लिखा गया था. दस्तावेज़ पर उनके हस्ताक्षर भी थे. हालांकि पत्रिका को दिए इंटरव्यू में वाजपेयी का कहना था कि उन्हें बयान पढ़ कर नहीं सुनाया गया था.

रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि वाजपेयी का बयान कोर्ट में अभियोजन पक्ष द्वारा इस्तेमाल नहीं किया गया था. स्वतंत्रता सेनानियों को लेकर जो फ़ैसला कोर्ट ने दिया, उसकी कॉपी से भी यह साफ़ हो गया था कि वाजपेयी का बयान सुनवाई के दौरान इस्तेमाल नहीं हुआ था. वाजपेयी भी दावा करते थे कि अपने बयान में उन्होंने सेनानियों को लेकर कोई सबूत नहीं दिया था. वे यह भी कहते थे कि उस समय वे नाबालिग़ थे और सरकार के पास उनके ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं था. हालांकि पत्रकार मानिनी चटर्जी जैसे कई जानकार इसकी एक अलग ही तस्वीर पेश करते रहे. यह हमेशा विवादित मुद्दा रहा और कांग्रेस व अन्य विरोधी वाजपेयी पर ‘अंग्रेज़ सरकार का अनुमोदक (या समर्थक)‘ होने का आरोप लगाते रहे और वे (वाजपेयी) इससे इनकार करते रहे.

फ़्रंटलाइन की यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई थी जब अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे. पत्रिका ने बताया कि उसने उस केस में सज़ा पाए लीलाधर वाजपेयी का भी इंटरव्यू लिया था. उन्होंने बताया कि भले ही वाजपेयी का बयान उनके ख़िलाफ़ चलाए गए ट्रायल में इस्तेमाल नहीं हुआ लेकिन, उससे अभियोजन पक्ष को उनके ख़िलाफ़ केस बनाने में काफ़ी मदद मिली और उन्हें सज़ा हुई. महुआ उर्फ़ शिवकुमार को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया था. लीलाधर ने यह भी बताया कि उनके नाम का ज़िक्र करने वाले अटल बिहारी वाजपेयी अकेले नहीं थे. गांव के और लोगों ने भी पुलिस को उनके नाम बताए थे. लेकिन वे सभी अशिक्षित थे, जबकि अटल और उनके भाई अच्छे पढ़े-लिखे थे.

अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़े इस विवाद ने कभी भी उनका पीछा नहीं छोड़ा. उनके जीवन के अंतिम चुनाव तक भी. जब 2004 में लोकसभा चुनाव हो रहे थे तो उस समय वाजपेयी के ख़िलाफ़ जाने-माने वकील राम जेठमलानी चुनाव लड़ रहे थे. उस दौरान वे एक प्रेसवार्ता में लीलाधर वाजपेयी को ले आए और वही दावा किया कि अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वतंत्रता सेनानियों के ख़िलाफ़ गवाही दी थी. हालांकि यह बयान स्वतंत्रता सेनानियों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल नहीं हुआ था.

इंदिरा गांधी को ‘दुर्गा’ कहा था?

अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ा एक और क़िस्सा है जिसने उनका पीछा कभी नहीं छोड़ा. हालांकि यह क़िस्सा सभी के लिए विवाद नहीं है. कांग्रेस इस क़िस्से को वक़्त-वक़्त पर ख़ुशी से याद करती रहती है. यह बात 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध से जुड़ी हुई है. तब भारत ने पाकिस्तान को बुरी तरह हराया था. उस युद्ध के बाद पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए और बांग्लादेश अस्तित्व में आया.

तब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं. दावा किया जाता है कि युद्ध में मिली जीत की ख़ुशी में अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी को हिंदू देवी ‘दुर्गा’ की उपमा दी थी. यह बात इतनी बार दोहराई जा चुकी है कि ज़्यादातर लोग इसे सच मानते हैं. हालांकि अटल इससे इनकार करते रहे कि उन्होंने इंदिरा को दुर्गा कहा था. हक़ीक़त क्या है इस सवाल पर यह दावा अभी भी हावी है कि उन्होंने इंदिरा गांधी को दुर्गा बुलाया था. कांग्रेस के अलावा लेफ़्ट के नेता भी यह दावा करते हैं. यहां तक कि कई वरिष्ठ पत्रकार भी यह बात दोहराते हैं.

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ऊपर दिए वीडियो में अटल बिहारी वाजपेयी के एक पुराने इंटरव्यू का हिस्सा देखा जा सकता है. इसमें वे बता रहे हैं कि दुर्गा वाला बयान उनके नाम से छप गया था लेकिन उन्होंने कभी भी इंदिरा गांधी को दुर्गा नहीं कहा. उन्होंने यह भी बताया कि कैसे इंदिरा पर पुस्तक लिखने के इच्छुक एक लेखक ने इस बयान को संसद की लाइब्रेरी में ख़ूब खोजा और सारी संसदीय कार्रवाइयां देख लीं लेकिन उन्हें वह बयान नहीं मिला.