पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन और कार्यशैली में कई ऐसी बातें रहीं हैं, जिनका इस पीढ़ी के नेताओं में अभाव दिखता है. और यह किसी एक पार्टी की बात नहीं. बहुतों का मानना है कि इस लिहाज से देखा जाए तो राजनीतिक वर्ग की ओर से अटल बिहारी वाजपेयी को वास्तविक श्रद्धांजलि यही होगी कि उनकी कुछ बातों को वह जीवन में उतारे और भारत की राजनीतिक संस्कृति को समृद्ध करते हुए लोकतंत्र को मजबूत बनाने का काम करे.

सहयोगियों को भी विरोधियों के सम्मान की सीख

इस दौर में विपक्षी नेताओं पर निजी हमले करना बेहद आम हो गया है. यह प्रवृत्ति हर पार्टी के नेताओं में दिखती है. ऐसा करने वालों को अब पार्टी की ओर से रोका भी नहीं जाता. लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी का इस मामले में एक अलग मानदंड था.

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद वाजपेयी सरकार में भी मंत्री थे. उन्हें एक बार कोयला मंत्रालय का भी जिम्मा सौंपा गया था. एक बार रविशंकर प्रसाद ने बिहार जाकर लालू यादव के खिलाफ कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया. यह बात अटल बिहारी वाजपेयी को ठीक नहीं लगी. उन्होंने रविशंकर प्रसाद को चाय पर बुलाया और पूरी मुलाकात के दौरान कुछ नहीं कहा. परेशान रविशंकर जब जाने लगे तो वाजपेयी बोले, ‘रवि बाबू! अब आप भारत गणराज्य के मंत्री हैं, सिर्फ बिहार गणराज्य के नहीं, इस बात का आपको ध्यान रखना चाहिए.’ यह किस्सा वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ने अटल बिहारी वाजपेयी की जीवनी ‘हार नहीं मानूंगाः एक अटल जीवन गाथा.’ में दर्ज किया है.

संघीय ढांचे का सम्मान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहयोगात्मक संघीय ढांचे और टीम इंडिया की बातें तो करते हैं, लेकिन जिन राज्यों में विपक्षी दलों की सरकार है, उन राज्यों में से कई मुख्यमंत्रियों ने यह आरोप लगाए हैं कि केंद्र सरकार संघीय ढांचे की भावना का सम्मान नहीं कर रही. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तक कई मुख्यमंत्री इस तरह के आरोप केंद्र सरकार पर अक्सर लगाते रहते हैं. मनमोहन सिंह सरकार पर भी ऐसे आरोप लगते थे. उनके कार्यकाल में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं जयललिता इस बारे में बेहद मुखर थीं.

अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ी एक घटना से इस पीढ़ी के नेता संघीय ढांचे के बारे में काफी कुछ सीख सकते हैं. कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. सूबे के राज्यपाल से उन्हें कुछ दिक्कत हो रही थी. उन्होंने यह बात प्रधानमंत्री वाजपेयी को बताई. प्रधानमंत्री ने राज्यपाल को हिदायत दी कि वे चुनी हुई सरकार के कामकाज में दखल न दें. लेकिन इस दौर में ऐसा नहीं हो रहा है. अब तो उच्चतम न्यायालय को ऐसे मामलों में दखल देना पड़ रहा है. कुछ समय पहले दिल्ली में चुनी हुई सरकार और उपराज्यपाल के टकराव में देश की सबसे बड़ी अदालत को दखल देना पड़ा जबकि कायदे से यह विवाद राजनीतिक दखल से सुलझना चाहिए था.

दूसरी घटना भी मध्य प्रदेश से ही जुड़ी हुई है. 2002-03 में मध्य प्रदेश में सूखा पड़ा था. दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे. उनकी सरकार के 10 साल पूरे होने वाले थे और कुछ महीनों बाद चुनाव होने वाले थे. भाजपा हरसंभव कोशिश कर रही थी कि अगले चुनाव में उसकी सरकार बन जाए. सूखा राहत के लिए केंद्र सरकार को भारी रकम जारी करनी थी. बताया जाता है कि इसी बीच मध्य प्रदेश से भाजपा के कई नेता प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिले और उनसे आग्रह किया कि वे पैसा जारी न करें, क्योंकि पैसा केंद्र देगा और इसका फायदा चुनावों में राज्य सरकार को मिलेगा.

विजय त्रिवेदी लिखते हैं कि यह सुनते ही वाजपेयी नाराज हो गए. उन्होंने कहा, ‘आप लोगों ने इस तरह की बात सोच कैसे ली? दिग्विजय सिंह अभी चुने हुए मुख्यमंत्री हैं और सूखा राहत का पैसा राज्य का अधिकार है तो उसे कैसे रोका जा सकता है? मैं पैसा जारी करूंगा और चुनाव कैसे लड़ना है, यह आप लोग देखिए.’

अपने पूर्ववर्तियों का सम्मान

आम तौर पर अब ऐसा होता है कि कोई भी नेता सत्ता में आता है तो वह और उसके सहयोगी पहले से सत्ता में रहे लोगों पर निशाना साधने लगते हैं. मौजूदा केंद्र सरकार के कार्यकाल में भी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बारे में काफी कुछ कहा जाता रहा है. अपने पूर्ववर्तियों का सम्मान कैसे करते हैं, यह मौजूदा पीढ़ी के नेताओं को वाजपेयी से सीखना चाहिए.

अटल बिहारी वाजपेयी 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार में विदेश मंत्री बनाए गए थे. उस समय की एक घटना का भी उनकी जीवनी में उल्लेख है. वाजपेयी जब पहले दिन अपने दफ्तर गए तो दीवारों पर नजर पड़ते ही लगा कि कुछ गायब है. वाजपेयी ने अपने सचिव से कहा, ‘यहां तो पंडित जी की फोटो लगी होती थी. पहले कई बार मैं इस दफ्तर में आया हूं, तब होती थी. अब कहां गई? उसे फिर से लगाइए.’ अफसरों को लगा था कि नए विदेश मंत्री को नेहरू की तस्वीर देखकर अच्छा नहीं लगेगा, क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को नेहरू पसंद नहीं थे. वाजपेयी भी नेहरू की नीतियों की आलोचना करते थे. लेकिन फिर भी अटल बिहारी वाजपेयी को यह ठीक नहीं लगा कि नेहरू की फोटो विदेश मंत्रालय से हटा दी जाए.

जोड़-तोड़ की राजनीति से तौबा

जोड़-तोड़ की राजनीति इस दौर की सियासत का एक कड़वा सच बन गई है. सत्ताधारी भाजपा इसमें सबसे आगे भले ही दिखती हो, लेकिन कोई भी ऐसा दल नहीं है जो इस तरह की राजनीति में शामिल न हो. जिसे जहां मौका मिलता है, वहां वह सरकार बनाने और सरकार बचाने के लिए जोड़-तोड़ की राजनीति में शामिल हो जाता है.

इस बारे में भी अटल बिहारी वाजपेयी इस पीढ़ी के नेताओं को राह दिखा सकते हैं. जब जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ तो पार्टी के पहले अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी बने. अपने पहले भाषण में उन्होंने कहा था, ‘भाजपा अध्यक्ष का पद अलंकार का विषय नहीं है. यह पद नहीं, दायित्व है, प्रतिष्ठा नहीं, परीक्षा है. हम राजनीति को मूल्यों पर आधारित करना चाहते हैं. इसे सिर्फ कुर्सी का खेल नहीं रखना चाहते.’ उन्होंने आगे कहा, ‘अब शिखर की राजनीति के दिन लद गए. जोड़-तोड़ की राजनीति का कोई भविष्य नहीं है. पैसा और प्रतिष्ठा के लिए पागल होने वालों के लिए जगह नहीं है. जिनमें आत्मसम्मान का अभाव हो, दिल्ली के दरबार में मुजरे झाड़ने वालों के लिए यहां कोई जगह नहीं है.’ तेजी से रंग बदलनेवाली राजनीति की दुनिया में वही कह सकते थे कि ‘पार्टी तोड़कर सत्ता के लिए नया गठबंधन करके अगर सत्ता हाथ में आती है तो ऐसी सत्ता को मैं चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूंगा.’

खुद से ऊपर पार्टी

भाजपा और कांग्रेस समेत अधिकांश क्षेत्रीय पार्टियों में व्यक्ति पूजा स्पष्ट तौर पर दिखती है. इनमें एक नेता को दल से भी ऊपर समझा जाता है. इससे इन पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र का स्पष्ट अभाव दिखता है. इस विषय पर भी इन दलों के नेता अटल बिहारी वाजपेयी से काफी कुछ सीख सकते हैं.

पहली घटना है लालकृष्ण आडवाणी की राम रथयात्रा से जुड़ी है. वाजपेयी ने इस रथयात्रा का यह कहते हुए विरोध किया था कि राजनेताओं को धार्मिक मसलों में दखल नहीं देना चाहिए. लेकिन जब पार्टी इस यात्रा के पक्ष में दिखी तो उन्होंने पार्टी के फैसले को मानते हुए आडवाणी की यात्रा को दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में हरी झंडी दिखाई.

जब संसदीय दल की बैठक होती थी और संसद के अंदर पार्टी की रणनीति के तहत यह तय होता था कि किसी मसले पर सदन के वेल में जाना है तो अटल बिहारी वाजपेयी अक्सर इससे असहमत रहते थे. वे कहते थे कि कुएं में कूदने की क्या जरूरत है? चर्चा कीजिए, बोलना सीखिये, इसका अभ्यास कीजिए. लेकिन यदि पार्टी में सबकी राय सदन की कार्यवाही में बाधा डालने या वेल में जाने की होती तो फिर वाजपेयी मान भी जाते थे और कहते थे कि जरूरी है तो कूदिए, कुएं में कूदिए.

गुजरात दंगों के बाद मुख्यमंत्री पद से नरेंद्र मोदी के इस्तीफे के मसले पर भी ऐसा ही हुआ. वाजपेयी मोदी का इस्तीफा लेना चाहते थे, लेकिन आडवाणी इसके पक्ष में नहीं थे. आडवाणी की राय के साथ पार्टी का बड़ा वर्ग खड़ा होते हुए उन्हें दिखा. अटल बिहारी वाजपेयी ने इस बार भी पार्टी की बात मान ली.