दुनिया में भारत की पहचान की रेखाओं को रेखांकित करें या फिर भारत की ओर से दुनिया को देन की फेहरिस्त तैयार करें, भारतीय संगीत दोनों ही तरफ अनिवार्य रूप से शामिल होगा. वजह भी वाजिब है. आज दुनियाभर में भारतीय संगीत (शास्त्रीय) के प्रति दीवानगी है. न जाने कहां-कहां से लोग भारतीय संगीत सीखने-जानने-समझने अपने देश आ रहे हैं. न जाने कितने मुल्कों में भारत के अनेकों कलाकार रहकर नाम, काम और दाम तीनों हासिल कर रहे हैं.

लेकिन यह जो स्थिति आज है या कि पिछले करीब एक सदी से भारतीय संगीत का इतिहास सिर्फ स्वर्णिम ही स्वर्णिम दिखता है, वह सब इतनी आसानी से हासिल नहीं हुआ. इसे हासिल करने के लिए एक संगीतकार-कलाकार ने अपना पूरा जीवन ही इसमें लगा दिया था. उसी कलाकार की जिद, जुनून, लगन और समर्पण की ही कीमत पर आज भारतीय शास्त्रीय संगीत इतने बड़े फलक पर विस्तारित दिखता है और यह एक प्रतिष्ठित पेशा भी बन चुका है. उस कलाकार का नाम था विष्णु दिगंबर पलुस्कर. आज पलुस्कर जी का जन्मदिन है. आगे इस कलाकार की कहानी को जानें, इसके पहले यह जान लें कि पलुस्कर नेत्रहीन थे और औपचारिक रूप से सिर्फ चौथी कक्षा तक ही पढ़े थे!

पलुस्कर का जन्म आज ही के दिन 1872 में महाराष्ट्र के कुरूंदवाड़ में हुआ था. उनके पिता दिगंबर पंडित कीर्तनिया गायक थे. पलुस्कर अभी बच्चे ही थे कि आतिशबाजी के दौरान हुए हादसे में उनकी आंखों की रोशनी चली गयी. अब आगे पढ़ना-लिखना मुश्किल हो गया.

इसके बाद पिता ने नेत्रहीन बेटे को संगीत की शिक्षा के लिए मिरज में पंडित बालकृष्ण बुवा इचलकरंजीकर के पास भेज दिया. पलुस्कर वहां पहुंचे तो फिर 12 साल वहीं रह गए. कहावत और मुहावरे की तरह एक बात बताई जाती है कि पुराने ज़माने में पढ़ने वाले लड़के अपनी चोटी को रस्सी से बांध लेते थे, ताकि उन्हें नींद न आये, दिलचस्प बात है कि पलुस्कर सच में ऐसा करते थे!

कहते हैं कि पलुस्कर पूरी-पूरी रात चुटिया को रस्सी से बांध तानपूरे पर रियाज किया करते थे. फिर जब वे अपने गुरू के पास से शिक्षित-दीक्षित होकर निकले तो उस समय के चलन के हिसाब से रजवाड़ों के पास पहुंचे ताकि उनकी कला का मान मिले, प्रदर्शन का मौका मिले और जीवन का गुजारा हो. तब संगीत या तो राजे-रजवाड़ों की कृपा पर उनके महलों तक सीमित था या फिर दूसरा ठिकाना तवायफों का कोठा था.

पलुस्कर संगीत के बड़े संरक्षक माने जाने वाले ग्वालियर और बड़ौदा के रजवाड़े में पहुंचे. लेकिन रजवाड़ों के यहां जाने के बाद यहां मदद मांगते हुए गुजारा करना उन्हें ज्यादा समय तक जमा नहीं. फिर उन्होंने उस दौर में सार्वजनिक कार्यक्रम यानी पब्लिक कॉन्सर्ट करने का फैसला किया. यह उनका असाधारण फैसला था. एक नई राह बनाने की शुरुआत थी.

उस वक्त तक शास्त्रीय संगीत का आम लोगों के बीच, आम लोगों के सहयोग से प्रदर्शन का कहीं कोई चलन नहीं था. फिर भी इस बीच पलुस्कर ने पहला शो सौराष्ट्र यानी अब के गुजरात में किया और उसके बाद वे अपने राज्य महाराष्ट्र लौट आए. यहां वे गांव-गांव घूमने लगे. लेकिन जहां भी जाते, एक संगीतकार व कलाकार होने के नाते उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता. उच्च घराने-वाले तो उबकाई भरे नजरिये से देखते. सिर्फ पलुस्कर को नहीं बल्कि सभी संगीतकारों और कलाकारों को ही तब का समाज उपेक्षित नजर से देखता.

कुल मिलाकर तब जिन कलाकारों को रजवाड़ों का संरक्षण नहीं मिलता या फिर तवायफें अपने कोठे पर जगह नहीं देतीं, उनका जीवन गुजारना भी मुश्किल था. हालांकि इन स्थितियों में भी पलुस्कर ने हिम्मत नहीं हारी. आंखों में बिना रोशनी के ही वे गांव-गांव घूमने लगे.

कहते हैं कि इसी दौरान उन्होंने संकल्प लिया कि वे जब तक भारतीय संगीत को, संगीतकारों को, कलाकारों को आम जनमानस से जोड़ेंगे नहीं, उनके बीच स्थापित और प्रतिष्ठित नहीं करेंगे, तब तक घूमते रहेंगे. इसके लिए उन्होंने गीतों में बदलाव शुरू किया. जो प्रेम और श्रृंगार के गीत थे, उनसे भद्दे शब्द हटाकर भक्तिभाव को जोड़ने लगे. जाहिर है इस बदलाव से लोगों में धीरे-धीरे उनके गीत-संगीत के प्रति रुचि भी जगी.

पलुस्कर का प्रयोग सफल हुआ. लोग उनसे जुड़ते चले गये. इसी क्रम में वे 1901 में लाहौर पहुंच गये. उन्होंने वहां जाकर गंधर्व महाविद्यालय शुरू किया. यह मानना उनका साहस और आत्मविश्वास ही था कि लोग अपने बच्चों को संगीत की शिक्षा के लिए उनके पास जरूर भेजेंगे. काफी हद तक वे अपने इस मकसद में सफल भी रहे. इस बीच उनके पिता की मृत्यु की सूचना भी पहुंची लेकिन वे अपने काम में इतने मगन थे कि उसी में लगे रहे.

फिर 1908 में पलुस्कर मुंबई आ गये. यहां भी उन्होंने गंधर्व महाविद्यालय की शाखा शुरू की. पलुस्कर तब तक महाराष्ट्र के आम जनमानस में संगीत को बिठा चुके थे. इसी का नतीजा था कि मुंबई में ज्यादा बच्चे पढ़ने आने लगे. पलुस्कर का मन बढ़ा तो वे गंधर्व महाविद्यालय को और विस्तार देने के बारे में सोचने लगे ताकि ज्यादा से ज्यादा बच्चों को संगीत की शिक्षा दी जा सके. इसके लिए पलुस्कर ने फिर यहां-वहां से कर्ज लिया और खुद दिन-रात की सुधी छोड़कर ज्यादा से ज्यादा कॉन्सर्ट करने लगे. लेकिन यहां उनकी मेहनत ज्यादा सफल नहीं हो पाई. वे सही समय पर कर्ज नहीं चुका पाए और 1924 में जब वे अपने कार्यक्रम के सिलसिले में कहीं बाहर गए थे, कर्ज देने वालों ने महाविद्यालय की बिल्डिंग ही नीलाम कर दी.

इस सबके बाद पलुस्कर की जगह शायद कोई और होता तो टूट-बिखर जाता, लेकिन वे लगे रहे. इस बीच वे स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ चुके थे. महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, पंडित मदनमोहन मालवीय आदि के साथ उनका संपर्क हो चुका था और वे गांधी के प्रिय भी बन चुके थे. महात्मा गांधी के सबसे प्रिय भजन ‘रघुपति राघव राजाराम...’ के पहले कंपोजर और पहले मौलिक गायक कलाकार पलुस्कर ही थे. और फिर ‘वंदे मातरम’ आज जिस मौलिक धुन में बजता है, सुना जाता है, उसे कंपोज करने वाले भी वही थे.

पलुस्कर का काम सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है. नेत्रहीन होने के बावजूद इस दौरान वे संगीत की किताबें भी रच रहे थे. उन्होंने संगीत के ऊपर करीब 50 किताबें लिखी हैं. उनके बारे में एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि वे उस दौर में संगीत को राजे-रजवाड़े से ही मुक्त नहीं करा रहे थे, बल्कि महिला कलाकारों के लिए संभावनाओं की राह बनाने की कोशिश भी शुरू कर चुके थे. उन्होंने महिला संगीत के लिए अलग से किताब लिखी है.

इसके आगे पलुस्कर की भारतीय संगीत को एक बहुत बड़ी देन यह भी है कि उन्होंने पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, पंडित विनायक राव पटवर्धन, प्रो. बीआर देवधर, पंडित नारायण राव व्यास और पंडित वामन राव पाध्ये जैसे उम्दा और कालजयी कलाकारों को अपने सान्निध्य में तैयार किया था. यही वे कलाकार थे जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा को इस तरह आगे बढ़ाया, औरों को सिखाया कि इस तरह फिर उसका दुनियाभर में प्रतिष्ठित होना करीब-करीब तय हो गया.