हाल ही में रूस ने अफगानिस्तान को लेकर एक बड़ी घोषणा कर दुनिया को चौंका दिया. रूस ने कहा है कि उसने इस महीने अफगानिस्तान के मुद्दे पर ‘सोची’ में होने वाली बैठक के लिए तालिबान को भी निमंत्रण भेजा है जिसे तालिबान ने स्वीकार कर लिया है. रूसी सरकार का कहना है कि अफगानिस्तान के आधे से अधिक क्षेत्र पर तालिबान का कब्जा है और ऐसे में उसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता.

रूस ने तालिबान को लेकर यह कदम अचानक नहीं उठाया है. तालिबान से बढ़ती उसकी नजदीकियों की चर्चा करीब दो साल पहले शुरू हुई थी. साल 2016 में रूस और तालिबान की नजदीकियों की खबरें आने के बाद रूस ने माना था कि वह तालिबान के संर्पक में है और आतंकी संगठन आईएस को लेकर उससे खुफिया जानकारी भी साझा करता है. यह भी बताया जाता है कि रूस ने सार्वजनिक रूप से यह बात तब ही स्वीकार की थी जब उसके और तालिबान के बीच गठजोड़ को लेकर अंतिम बातचीत हो चुकी थी. ब्रिटिश अखबार द टाइम्स के अनुसार सितंबर 2015 में ताजिकिस्तान में खुद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और तालिबान के पूर्व मुखिया मुल्ला अख्तर मंसूर के बीच आमने-सामने बातचीत हुई थी.

रूस और तालिबान दशकों तक एक-दूसरे के दुश्मन रहे हैं. 1989 में सोवियत संघ की फौजों को तालिबानी लड़ाकों के कारण ही अफगानिस्तान छोड़ना पड़ा था. यही वजह है कि अब इन दोनों के बीच बन रहे इस नए गठजोड़ से कई लोग हैरान हैं. उनके मन में यह सवाल भी उठ रहा है कि युद्ध से तबाह हो चुके अफगानिस्तान में रूस आखिर क्या हासिल करना चाहता है.

कुछ रूसी राजनयिक और विदेश मामलों के जानकार रूस और तालिबान के बीच उलटी बह निकली इस गंगा के पीछे कई वजह बताते हैं. ये लोग कहते हैं कि इसकी पहली और सबसे बड़ी वजह आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) है. इन लोगों की मानें तो रूस अफगानिस्तान में बढ़ रही आईएस की सक्रियता से खासा परेशान है. उसे लगता है कि अब अफगानिस्तान आईएस की नई सुरक्षित शरणस्थली बन सकता है.

इस समय जितनी जरूरत रूस को तालिबान की है उतनी ही तालिबान को भी उसकी है | फोटो : एएफपी
इस समय जितनी जरूरत रूस को तालिबान की है उतनी ही तालिबान को भी उसकी है | फोटो : एएफपी

जानकारों की मानें तो रूस अच्छे से जानता है कि सीरिया की असद सरकार के पक्ष में उतरने के बाद से वह आईएस के निशाने पर है. अक्टूबर 2015 में मिस्र में आईएस द्वारा रूसी एयरलाइन का विमान गिराए जाने और फिर 2016 में सेंट पीटर्सबर्ग मेट्रो में आतंकी हमले के बाद से रूस आईएस को लेकर खासा सतर्क है. वह मध्य एशिया के पड़ोस में आईएस की उपस्थिति बिलकुल नहीं चाहता. क्योंकि अगर आईएस ने अफगानिस्तान में पैर पसार लिए तो उसका अगला लक्ष्य मध्य एशियाई देशों और रूस तक पहुंचना होगा और फिर इस काम में उसे ज्यादा समय भी नहीं लगेगा.

रूसी राजनयिकों के बयानों से भी रूस की इस चिंता का पता लगता है. अफगानिस्तान में रूसी राजदूत अलेक्जेंडर मैनटीटस्की का हाल में एक कार्यक्रम के दौरान कहना था, ‘अब आईएस अफगानिस्तान के 34 में से नौ प्रांतों में सक्रिय हो चुका है. हमारी चिंता यह है कि वह न केवल अफगानिस्तान के हालात खराब करेगा. बल्कि, यह मध्य एशिया, पाकिस्तान, चीन, ईरान, भारत और यहां तक कि रूस के लिए भी एक बड़ा खतरा है. ऐसे में हमें आगे आकर इसे यहां से खत्म करना होगा.’ रूसी राजनयिक ने आगे कहा कि इस काम में रूस तालिबान की मदद चाहता है.

अफगानिस्तान में रूस के विशेष दूत ज़मीर कूलुलोव रूसी न्यूज़ एजेंसी तास से कहते हैं, ‘अफगानिस्तान के आधे से ज्यादा क्षेत्र पर तालिबान का नियंत्रण है. तालिबान ने वहां की सरकार के समानांतर अपना सिस्टम बना रखा है, अपनी संस्थाएं और अपनी अदालतें तक बना रखी हैं. उसके क्षेत्र में रहने वाले आम नागरिक उसके शासन में ज्यादा खुश हैं.’ कूलुलोव के मुताबिक ऐसे में तालिबान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और उसकी ताकत को देखते हुए सुरक्षा के लिहाज से उसके साथ बेहतर संबंध जरूरी हैं.

अफगानिस्तान के हालात पर नजर रखने वाले कुछ जानकार यह भी बताते हैं कि इस समय जितनी जरूरत रूस को तालिबान की है उतनी ही तालिबान को भी उसकी है. ये लोग कहते हैं कि अफगानिस्तान की सत्ता हासिल करने के एकमात्र लक्ष्य के साथ चल रहा तालिबान भी आईएस की वजह से अब काफी परेशान है. अब उसे अफगान-अमेरिकी फौज के साथ-साथ आईएस से भी जूझना पड़ रहा है. पिछले दो साल में तालिबान और आईएस के बीच सैकड़ों झड़पें हुई हैं जिनमें दोनों ओर के हजारों लड़ाके मारे गए. जानकार कहते हैं कि ऐसे हालात में तालिबान को भी रूस की कम जरूरत नहीं है. इसके अलावा रूस का साथ तालिबान को वैश्विक स्तर पर एक आतंकी संगठन से अलग पहचान भी दे सकता है.

बीते जुलाई में अफगानिस्तान के जवाजन प्रांत में तालिबान और आईएस के बीच हुए एक संघर्ष में दोनों ओर के 300 से अधिक लड़ाके मारे गए | फोटो : एएफपी
बीते जुलाई में अफगानिस्तान के जवाजन प्रांत में तालिबान और आईएस के बीच हुए एक संघर्ष में दोनों ओर के 300 से अधिक लड़ाके मारे गए | फोटो : एएफपी

रूस के अफगानिस्तान में दखल देने का एक कारण वहां अमेरिकी नीतियों का नाकाम होना भी है. अफगान मामलों के जर्मन विशेषज्ञ मसूद सैफुल्लाह अपनी एक टिप्पणी में लिखते हैं, ‘रूस को लगता है कि अफगानिस्तान में अमेरिकी नीतियां अब नाकाम हो गई हैं और इसीलिए अब उसे हस्तक्षेप करना चाहिए.’ रूस का मानना है कि अफगानिस्तान में अगर कुछ दिन और ऐसे ही चलता रहा तो अमेरिका और तालिबान की लड़ाई का सबसे ज्यादा फायदा आईएस को होगा.

हालांकि, रूस अब ऐसा क्यों कर रहा है इसकी भी वजह है. दरअसल, रूस को अब इस बात का विश्वास हो गया है कि पहले क्रीमिया और फिर सीरिया में मुंह की खाने के बाद अफगानिस्तान में अमेरिका उससे सीधा लोहा नहीं लेना चाहेगा. उधर, अमेरिका अच्छे से जानता है कि जिस तरह रूस ने सीरिया में तुर्की, ईरान और हिजबुल्लाह के साथ मिलकर उसके मंसूबों पर पानी फेर दिया, वैसे ही वह अफगानिस्तान में चीन, पाकिस्तान और ईरान को साथ लेकर कर सकता है.

तालिबान से संबंध अच्छे कर रूस और मध्य एशियाई देश अपनी एक और बड़ी समस्या हल करना चाहते हैं. इन देशों में ड्रग्स का अवैध कारोबार दशकों से एक बड़ी समस्या रहा है. केवल रूस में ही करीब 70 हजार लोग हर साल ड्रग्स की वजह से अपनी जान गंवाते हैं. इन देशों में अवैध ड्रग्स कारोबार का सबसे बड़ा कारण तालिबान को माना जाता है, जो रूस और मध्य एशियाई देशों में 90 फीसदी तक अफीम की आपूर्ति करता है.

रूस सहित ये सभी देश इस समस्या को लेकर कई बार तालिबान से बात भी कर चुके हैं लेकिन इन कवायदों का कभी कोई सार्थक नतीजा नहीं निकल सका. दरअसल, तालिबान की कमाई का सबसे बड़ा स्रोत अफीम की खेती ही है. वह अफीम से लगभग 400 मिलियन डॉलर (2500 करोड़ रुपए से ज्यादा) हर साल कमाता है और इसीलिए इस मामले में कोई समझौता करने को राजी नहीं होता.

लेकिन, पिछले कुछ समय में संबंधों में आए बदलाव को देखते हुए रूस के नीति निर्माताओं का मानना है कि भले ही तालिबान अब तक इस मामले पर कोई समझौता करने को तैयार न हुआ हो, लेकिन अगर रूस के तालिबान से घनिष्ठ संबंध बन जाते हैं तो निश्चित ही वह समझौते के लिए तैयार हो जाएगा.