पिछले लेख में हमने ज़िक्र किया था कि मोरारजी देसाई की सरकार के गिरने के पीछे जनता पार्टी गठबंधन में शामिल भारतीय जनसंघ के सांसदों की दोहरी सदस्यता अहम मुद्दा था. मोरारजी के बाद कांग्रेस के सहारे को लेकर चरण सिंह प्रधानमंत्री तो बने पर उनकी अगुवाई वाली सरकार एक संसदीय सत्र भी न देख पायी. तय रणनीति के तहत कांग्रेस ने समर्थन वापस लेकर उसे गिरा दिया. राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी को आम चुनावों की घोषणा करनी पड़ी. इंदिरा गांधी ज़बरदस्त जीत के साथ दोबारा प्रधानमंत्री बनीं.

उसी साल एक घटना और हुई. छह अप्रैल 1980 को जनसंघ से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई. पहले भाजपा के बनने की बात करते हैं.

बात ज़्यादा पुरानी नहीं है. इसी साल फ़रवरी में प्रधानमंत्री ने दिल्ली में भाजपा के नए कार्यालय का उद्घाटन किया था. इस अवसर पर उन्होंने कहा था कि भाजपा का पुराना अवतार यानी जनसंघ देश के अहम आंदोलनों का हिस्सा रहा है. यह नरेंद्र मोदी का सोचा समझा वाक्य था. लेकिन इसकी गहराई में जाएं तो कुछ और ही नज़र आता है.

भारतीय जनसंघ यानी भाजपा के पुराने अवतार की स्थापना 1951 में श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने की थी. तब से लेकर 60 के दशक तक भारतीय जनसंघ राजनैतिक अखाड़े में हाशिये पर रहा. हां, यह जरूर है कि उसके पितृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अनुशासित सदस्य तब भी जनसंघ के लिए जी-जान से जुटे रहते थे . इसके बावजूद अगर 1952 से शुरू हुए आम चुनाव से लेकर 1980 तक के चुनावों पर नज़र डाली जाए तो हम पाते हैं कि 545 सदस्यों वाली लोकसभा में पार्टी का वोट प्रतिशत कभी भी दहाई का अंक नहीं छू पाया. तो ऐसे में हुए अहम आंदोलनों में उसकी हिस्सेदारी एक प्रश्नचिन्ह ही है.

हां, 70 के मध्य में ज़रूर जनसंघ एक आंदोलन से जुड़ता है. पर वह भी एक बड़े झूठ का सहारा लेकर और वही भारतीय जनता पार्टी की स्थापना का आधार भी बनता है. वह कौन सा आंदोलन था?

इस सवाल का जवाब हमें जयप्रकाश नारायण तक ले जाता है. 1974 में जब जेपी ने ‘परिवर्तन’ की मांग पर आंदोलन शुरू किया था तो हर विपक्षी पार्टी उनसे जुड़ना चाहती थी. कारण यह था कि जेपी छात्रों के आंदोलनों की अगुवाई कर रहे थे. 1968 में फ्रांस में हुए छात्र आंदोलन ने दुनिया भर में छात्रों को प्रेरित कर उनके देशों की राजनीति को प्रभावित किया था. इसी लालच में जब भारतीय जनसंघ के नेता जेपी को सहारा देने के लिए लपके, तो जेपी ने उनके सामने एक शर्त रख दी. शर्त यह थी कि उनके साथ मंच साझा करने के लिए जनसंघ के नेताओं को आरएसएस की सदस्यता छोड़नी होगी. यह शर्त जनसंघ के नेताओं के सामने यक्ष प्रश्न जैसी थी. ‘हां’ कहने पर आरएसएस से पार्टी की नाल कटने का ख़तरा था और ‘न’ कहने पर आज़ादी के बाद हुए सबसे बड़े आंदोलन से दूर रह जाने का डर था.

लेकिन जेपी को जनसंघ के नेताओं की आरएसएस की सदस्यता से क्या दिक्कत थी? बात यह है कि आरएसएस पर जेपी के गुरु, यानी महात्मा गांधी की हत्या का आरोप था. सिर्फ़ आरोप ही था, कभी सिद्ध नहीं हुआ पर सिद्धांतवादी जेपी को यह बात गवारा नहीं थी कि आरएसएस के सदस्य उनके साथ जुड़ें. उधर, भारतीय जनसंघ को यह गवारा नहीं था कि वह उस आंदोलन का हिस्सा न बने जो देश की तकदीर बदलने जा रहा है. जेपी को यकीन दिलाया गया कि जैसा वे चाहते हैं, हो जाएगा. यानी जनसंघ के सदस्य आरएसएस से अलग हो जाएंगे.

आपातकाल के बाद हुए चुनावों में जनता पार्टी की सरकार आई. इसमें शामिल जनसंघ ने पहली बार सत्ता का स्वाद चखा. लेकिन इसके बाद वह जेपी को दिया हुआ वादा भूल गया. इसी मुद्दे पर चरण सिंह ने मोरारजी देसाई की सरकार गिरा दी थी.

अब बात यह भी है कि आखिर भारतीय जनसंघ को नए नामकरण, यानी भारतीय जनता पार्टी, की ज़रूरत क्यों पड़ी. भारतीय जनसंघ की नाल आरएसएस से जुड़ी थी. जानकारों के मुताबिक आरएसएस पर एक तरफ़ तो गांधी की हत्या का आरोप लगा था, दूसरी तरफ मुसलमानों की इससे दूरी थी, तीसरी तरफ़ हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग हिंदुत्व की बात से सहमत नहीं था. इस वजह से पार्टी का आधार बढ़ नहीं रहा था. यह बात 1980 के आम चुनावों में से भी ज़ाहिर हो जाती है. भारतीय जनसंघ को तब महज़ 16 सीटें ही मिली थीं. फिर फ़ैसला हुआ कि एक नयी पार्टी बनाई जाए जो जनसंघ की छवि से अलग हो. और इस तरह भारतीय जनता पार्टी का उदय हुआ. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इसके पहले अध्यक्ष थे.

अगर 1980 के चुनावों की बात की जाए तो इंदिरा गांधी के लिए राह बिलकुल आसान थी. जनता पार्टी की कारगुजारियां ही उसके पतन का कारण बन गयी थीं. अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गयी थी, मुद्रास्फीति की दर काबू से बाहर जा रही थी, हड़तालों का दौर फिर शुरू हो गया था, वेतन वृद्धि को लेकर कामगारों का आए दिन चक्का जाम करना आम बात हो गयी थी. कांग्रेस ने ‘ग़रीबी हटाओ’ वाले नारे को छोड़कर स्थाई सरकार देने के मुद्दे पर चुनाव लड़ा. उधर, आपातकाल में नसबंदी कार्यक्रम की वजह से छिटक कर दूर चले गए मुसलमानों से संजय गांधी ने माफ़ी मांगकर उन्हें अपनी ओर मिला लिया.

नतीजा, कांग्रेस (आई) को भारी जीत (353 सीटें) मिली. बदले की भावना से कार्य करने के लिए मशहूर इंदिरा गांधी ने जनता पार्टी की राह पर चलकर ग़ैर कांग्रेसी राज्य सरकारों को बर्खास्त किया. चरण सिंह और मोरारजी देसाई का राजनैतिक जीवन लगभग ख़त्म हो गया. इंदिरा गांधी फिर देश की सर्वोच्च नेता बन गई थीं.

1980 का साल इंदिरा के लिए एक बड़ा झटका लेकर भी आया. 23 जून को एक विमान हादसे में उनके राजनैतिक वारिस माने वाले संजय गांधी की मृत्यु हो गयी. वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने ‘बियॉन्ड द लाइन्स’ में लिखा है कि हादसे के बाद इंदिरा घटनास्थल पर गई थीं जहां हवाई जहाज का मलबा पड़ा हुआ था. वहां से उन्होंने कोई चीज़ उठकर अपने पास रख ली. वे आगे लिखते हैं, ‘वो क्या था, ये आज तक रहस्य बना हुआ है. क्या वो संजय गांधी के स्विस बैंक के अकाउंट नंबर की जानकारी थी?’