2016 में हुई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से मोदी सरकार पर भारतीय सेना के राजनीतिकरण करने का आरोप लगता रहा है. बीते जून में इसका वीडियो सामने आने के बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा था, ‘देश जानना चाहता है कि जब भी मोदी सरकार नाकाम होती है, जब भी अमित शाहजी की भाजपा हारने लगती है, तब वे अपने राजनीतिक फायदे के लिए सेना की बहादुरी का गलत इस्तेमाल क्यों करने लगते हैं.’

कुछ इसी तरह के आरोप 1999 के आम चुनाव के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी और उनकी सरकार पर भी लगे थे. यह उस साल सितंबर-अक्टूबर की बात है. इससे करीब छह महीने पहले ही यानी अप्रैल, 1999 में सरकार एक वोट से विश्वासमत हार गई थी. इसके बाद चुनाव आयोग ने अगले कुछ महीनों के दौरान बारिश के मौसम को देखते हुए सितंबर-अक्टूबर में चुनाव की तारीख तय की. इस बीच, कारगिल युद्ध (मई-जुलाई) में भारत की जीत ने अगले आम चुनाव को देखते हुए कार्यकारी वाजपेयी सरकार का आत्मविश्वास कहीं ऊंचा कर दिया. बाद के दिनों में चुनावी प्रचार के दौरान पार्टी इसका पूरा फायदा उठाने की कोशिश करती हुई भी दिखी.

13वीं लोक सभा यानी 1999 के चुनाव के दौरान कारगिल युद्ध और सेना पर भाजपा और कांग्रेस के बीच जुबानी जंग को देखते हुए चुनाव आयोग ने दोनों पार्टियों को इससे बचने का निर्देश दिया था. सेना को कारगिल युद्ध पर आधारित डॉक्यूमेंटरी भी चुनाव के बाद दिखाने को कहा गया था. इस डॉक्यूमेंटरी में रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस की तस्वीर का इस्तेमाल किया गया था. हालात यहां तक पहुंच गए थे कि तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल वेद प्रकाश मलिक को कहना पड़ा था कि उन्हें (सेना) उनके हाल पर छोड़ दिया जाए.

लेकिन, किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी. खुद अटल बिहारी वाजपेयी मध्य प्रदेश इन निर्देशों की धज्जियां उड़ाते हुए दिखे. इंदौर में आयोजित एक जनसभा में उनका कहना था, ‘कोई आचार संहिता हमें अपने सैनिकों को कारगिल में उनकी विजय पर खुशी प्रकट करने और उन्हें बधाई देने से रोक नहीं सकती.’ कांग्रेस की ओर इशारा करते हुए उन्होंने आगे कहा, ‘जब दूसरे कारगिल में पाकिस्तानी घुसपैठ की आलोचना करने से बाज नहीं आते तो हम अपनी विजय की बात क्यों न करें? कारगिल इस चुनाव का मुद्दा बन गया है.’

कारगिल विजय को लेकर चुनाव में भारतीय सेना का इस्तेमाल यही नहीं रुका. जनसत्ता के पूर्व संपादक प्रभाष जोशी ने 29 अगस्त, 1999 को लिखे एक आलेख में लिखा कि हरियाणा के करनाल में एक चुनावी सभा हुई थी. इसमें वाजपेयी भी मौजूद थे. इस सभा के लिए तैयार मंच के पीछे एक बड़ा सा चित्र लगाया गया था. इस तस्वीर में तोलोलिंग की चोटी पर विजयी सैनिकों को दिखाया गया था. साथ ही, तीनों सेनाओं के प्रमुख वर्दी में अपनी-अपनी उंगलियों से विक्ट्री साइन बनाते हुए दिखाए गए थे. प्रभाष जोशी ने लिखा, ‘प्रधानमंत्री इसके पहले और बाद भी कहते-कहते नहीं थकते थे कि कारगिल में विजय देश और सेनाओं की हुई है. लेकिन, यह विशाल चित्र सेना ही नहीं, सेनापतियों को भी विजय का चिन्ह बनाए भाजपा के पीछे खड़ा दिखा रहा था.’

बताया जाता है कि चुनाव आयोग ने इस बारे में भाजपा को नोटिस जारी किया था. वहीं, भाजपा ने भी माना कि उससे गलती हुई. पार्टी की ओर से नरेंद्र मोदी ने माफी मांगी थी, जिन पर चुनावी अभियान की जिम्मेदारी थी. हालांकि, अटल बिहारी वाजपेयी के बचाव में यह कहा गया कि प्रधानमंत्री मंच पर जाते हुए और वहां बैठने के दौरान विशाल तस्वीर को देख नहीं पाए क्योंकि वे अपने बॉडीगार्ड्स से घिरे हुए थे. पार्टी के मुताबिक मंच से उतरते हुए वाजपेयी की नजर इस तस्वीर पर पड़ी थी और उन्होंने इस पर अपनी नाराजगी भी जताई थी.

लेकिन, नाराजगी के इस दावे की केवल दो दिन बाद ही गुजरात के कापड़वंच में आयोजित एक चुनावी सभा में हवा निकल गई. इस सभा में भी पहले की तरह कारगिल का पोस्टर लगाया गया. साथ ही, कारगिल में शहीद हुए दिनेश वाघेला के माता-पिता को मंच पर बुलाकर प्रधानमंत्री से मिलवाया गया. चुनाव आयोग से इसकी शिकायत भी की गई थी.

इससे पहले राजस्थान में हुईं चुनावी सभाओं में अटल बिहारी वाजपेयी युद्ध की तैयारियों के बारे में बताते हुए दिखे थे. उन्होंने बताया था कि यदि युद्ध लंबा खींचता तो नौसेना ने इसके लिए क्या-क्या तैयारियां कर रखी थीं. युद्ध को लेकर सेनाएं अपनी योजनाएं बनाकर तैयार रहती ही हैं. लेकिन, उन्हें गोपनीय माना जाता है और सार्वजनिक मंच से इनका जिक्र करने से बचा जाता है.

प्रभाष जोशी ने इन घटनाओं को लेकर अटल बिहारी वाजपेयी की कड़ी निंदा की थी. उन्होंने कहा, ‘इस प्रधानमंत्री को हुआ क्या है? चुनाव जीतने के जुनून में इसे न तो प्रधानमंत्री पद की साधारण जिम्मेदारियों का भान है और न वह जानता है कि शपथ लेकर जिन बातों को गोपनीय रखने के लिए वह बाध्य है, उन्हें चुनावी सभा में न बताया जाए.’ प्रभाष जोशी का यह भी कहना था कि देश और सेना, उनकी सरकार, पार्टी और गठबंधन में विलीन हो गए हैं. यह भी कि इन बातों से चुनाव आयोग की संवैधानिकता और सेना की सांस्थानिकता को जो नुकसान होगा, उसकी कीमत एनडीए और कामचलाऊ प्रधानमंत्री नहीं बल्कि, जनता और लोकतांत्रिक परंपरा ही चुकाएगी.

ऐसा नहीं है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने कारगिल विजय का इस्तेमाल चुनावी प्रचार के दौरान ही किया. उनकी जीवनगाथा ‘हार नहीं मानूंगा : एक अटल जीवनगाथा’ में लेखक और वरिष्ठ पत्रकार विजय विद्रोही लिखते हैं, ’15 अगस्त,1999 | लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण में कारगिल जीत का जश्न था. वाजपेयी को समझ में आ गया था कि अगली बार (15 अगस्त, 2000) लाल किले की प्राचीर से भाषण देने के लिए कारगिल का उत्साह, जश्न और शहादत को याद दिलाए रखना (मतदाताओं को) जरूरी है.’

अटल बिहारी वाजपेयी के करीबी माने जाने वाले विजय विद्रोही अपनी किताब में आगे बताते हैं कि वाजपेयी आम आदमी की नब्ज को गहराई से समझते थे. इसकी पुष्टि इससे होती है कि उन्होंने अपने इस भाषण में आगे कहा, ‘कहा जाता है कि युद्ध के समय और उसके तुरंत बाद हम अपने सैनिकों को याद करते हैं, लेकिन समय गुजरते ही उन्हें भूल जाते हैं. यह अफसोस की बात है कि जिन बहादुरों ने पिछली लड़ाइयों में अपना जीवन न्यौछावर किया या घायल हुए, उन्हें हमने शायद कुछ भूला दिया. मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि इस बार ऐसा नहीं होगा.’ इन बातों के जरिए उन्होंने कांग्रेस पर भी निशाना साधा था, क्योंकि सभी बड़े युद्ध कांग्रेस की सरकार में ही हुए थे.

इससे पहले मई, 1998 में हुए पोखरण परमाणु परीक्षण को लेकर भी कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि इसके पीछे वाजपेयी सरकार की राजनीतिक लाभ लेने की मंशा थी. वरिष्ठ पत्रकार किंशुक नाग अपनी किताब ‘अटल बिहारी वाजपेयी : अ मैन फॉर ऑल सीजन्स’ में लिखते हैं कि 19 मार्च को बनी गठबंधन (एनडीए) की सरकार को दो महीने भी नहीं हुए थे कि वाजपेयी ने दुनिया को हिला देने वाला यह कदम उठाया. किंशुक नाग के मुताबिक 1996 में 13 दिन की सरकार चलाने के बाद वाजपेयी जनता को यह बताना चाहते थे कि इस बार की उनकी सरकार मजबूत है.

तब इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था, ‘इस मौके (परमाणु परीक्षण) को करोड़ों भारतीय मजबूत आत्मनिर्भर भारत के उदय के रूप में देख रहे हैं.’ हालांकि, इस परीक्षण के बाद अमेरिका और चीन सहित कई देशों ने भारत पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए और देश को इनकी कीमत चुकानी पड़ी. लेकिन, माना जाता है कि वाजपेयी मानसिक रूप से इसके लिए पहले से ही तैयार थे.