43 साल के रणदीप हुड्डा पिछले कुछ समय से नवाज की याद दिलाने लगे हैं. उस ‘काल्पनिक’ नवाजुद्दीन सिद्दीकी की याद जिसे मान लीजिए कि संघर्ष भरे बेहिसाब दिनों के बाद भी वाजिब सफलता नहीं मिली होती. आज नवाज एक असाधारण अभिनेता हैं जो इंडिपेंडेंट और स्टार-मुक्त सिनेमा के भी पथिक हैं और स्टार-युक्त सिनेमा में भी अपने कदम मजबूती से रख रहे हैं. लेकिन जरा सोचिए कि वह नवाज कैसा होता जिसे आज भी यह दुनिया उसके हिस्से की सफलताएं और प्रशंसाएं नहीं देती? क्या वह आज भी लगातार उम्दा अभिनय करते चलता और हिट फिल्मों का रेज्यूमे हाथ में न होने के बावजूद अपने अंदर की आग को जलाए रखता?

रणदीप हुड्डा के साथ कुछ-कुछ यही हो रहा है. वे पिछले कुछ सालों से लगातार उम्दा अभिनय कर रहे हैं, बिना किसी कैंप का हिस्सा बनकर कहानियों पर तथा कम चर्चित निर्देशकों पर भरोसा कर रहे हैं और जानबूझकर बुद्धिहीन मसाला फिल्मों में मुख्य भूमिकाएं करने से खुद को बचा रहे हैं. लेकिन फिर भी ऐसे ‘बैंकेबल’ स्टार नहीं बन पा रहे कि सिर्फ उनके दम पर कोई फिल्म चल सके और निर्देशक को ओवर द टॉप अभिनय करती किसी ऐश्वर्या राय की जरूरत न पड़े. ‘सरबजीत’ में रणदीप का अभिनय किसी को भी उनका कायल बनाने और आंखें नम करने के लिए काफी है, लेकिन फिर भी कुछ ऐसा हो रहा है कि उनके शानदार अभिनय से सजी फिल्में न तो ज्यादा चल रही हैं, न उन्हें लगातार अच्छी फिल्में मिल रही हैं और न ही पब्लिक मेमोरी में वे अपनी आदमकद जगह ही बना पा रहे हैं.

वैसे यह सच है कि वे नवाज के स्तर के अभिनेता नहीं हैं और न ही हम नवाज और रणदीप को यहां साथ लाकर उनके अभिनय को साथ तौल रहे हैं. हम तो बस उस संघर्ष की तकलीफ समझना चाहते हैं जो उम्दा अभिनय करते रहने के बावजूद वाजिब सफलता न मिलने पर सतत महसूस होती है.

लंबे वक्त बाद ही सही नवाज को अपने हिस्से की सफलता मिली. कंगना रनोट को भी सालों की कोशिशों का फल मिला. एक वक्त में इरफान खान को भी इसी तरह लंबे संघर्षों के बाद सफलता मिली थी और कई जमाने पहले नसीर साहब भी इसी अंदाज में स्टार-मुक्त और स्टार-युक्त फिल्मों के दरमियान किसी सी-सॉ झूले पर बीच में बैठकर संतुलन साधने की कोशिश किया करते थे. इन सभी असाधारण अभिनेताओं के बीच ही कहीं रणदीप हुड्डा खड़े हैं जिन्हें हम नवाज या इरफान तो नहीं कह सकते, लेकिन कमर्शियल फिल्मों का भूखा वह महत्वाकांक्षी स्टार भी नहीं कह सकते जो 100-200 करोड़ी सिनेमा की खातिर बुद्धिहीन फिल्मों की कतार लगा देता है.

ऐसा करना रणदीप हुड्डा के लिए सबसे सरल करियर ग्राफ तैयार करना होता. ग्रीक खुदाओं टाइप दिखते हमारे कई अभिनेता ऐसा ही करते रहे हैं और हमेशा करेंगे. खुद रणदीप ने भी किया था. करियर की शुरूआत में जब उन्होंने राम गोपाल वर्मा की गैंगस्टर फिल्म ‘डी’ (2005) से इंटेंस अभिनय की झलक दिखाने के बाद इधर-उधर की मसाला फिल्में का रुख किया और इसी हीरो-छाप महत्वाकांक्षा की वजह से सिनेमाप्रेमियों की नजरों में चढ़ने की जगह नीचे गिरते चले गए. 2001 में वे पहली बार ‘मानसून वेडिंग’ में नजर आए थे और उसके चार साल बाद ‘डी’ में, जिसके बाद की कई कमजोर फिल्मों की वजह से वे सीधे 2010 में ही पहली बार परदे पर कुछ बेहतर करते नजर आए. ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई’ में.

लेकिन इतने लंबे अरसे तक संघर्ष करने के दौरान यह अच्छा हुआ कि अपने करियर के शुरुआत में ही उन्होंने नसीरुद्दीन शाह का थियेटर ग्रुप ‘मोटली’ जाइन किया. यहां वे कभी एक्टर बने, कभी लेखक तो कभी सिर्फ शागिर्द. शुरुआत में नसीर उन्हें अपने ग्रुप में लेना नहीं चाहते थे और बकौल रणदीप, ‘मैं पैसे उधार लेकर कुत्ते की तरह नसीर साहब के पीछे-पीछे देशभर में हर उस जगह जाता था जहां वे वर्कशॉप कर रहे होते थे’. बाद में इन्हीं नसीर ने रणदीप पर सबसे ज्यादा भरोसा दिखाया और 15-16 साल लंबी शागिर्दी ने न सिर्फ उनके अभिनय को तराशा बल्कि फिल्मों के प्रति उनका नजरिया भी इन्हीं नसीर ने बदला.

हाल ही में गुजरी गुरूपूर्णिमा के दिन अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर रणदीप ने नसीर के साथ किसी प्ले की पुरानी तस्वीर साझा करते हुए लिखा भी, ‘अगर वो वाकई में समझदार है तो तुम्हें अपनी समझ में ढालने के बजाय तुम्हें तुम्हारी खुद की पूरी क्षमता की ओर ले जाएगा.’ इस एक वाक्य से दोनों के बीच का रिश्ता स्पष्ट हो जाता है.

2010 में ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई’ में पुलिस अफसर के उनके रोल की प्रशंसा ने ही उन्हें तिग्मांशु धूलिया की ‘साहब बीवी और गैंगस्टर’ दिलाई थी जिसमें उनके अभिनय को सभी ने सराहा. उन्होंने ‘जन्नत 2’ में भी अच्छा काम किया और कहते हैं कि वह फिल्म देखने के बाद नसीर ने उनसे कहा था कि इस परफॉर्मेंस के बाद तू आसानी से अगले 10 साल तक इस इंडस्ट्री में टिका रहेगा. गलत कहा था, क्योंकि इसके बाद रणदीप फिर फिसले और ‘जिस्म 2’, ‘हीरोइन’, ‘मर्डर 3’ और ‘जॉन डे’ जैसी बेहद कमजोर मसाला फिल्मों में अति साधारण अभिनय किया. ओवरएक्टिंग भी की और कमर्शियल सिनेमा का रथ तेज रफ्तार से चलाने के चक्कर में अपने चक्के जाम भी किए.

लेकिन यह आखिरी निराशा थी. इसके बाद ‘हाईवे’ (2014) आई और तब से लेकर अब तक रणदीप हुड्डा ने हमें सिर्फ अपना मुरीद ही बनाया है. जैसा अकसर मेहनती अभिनेताओं के साथ होता है कि कई सालों तक डगमगाता और रॉ अभिनय करने के बाद यकायक वे हमें एक नए रूप में मिलते हैं और सबकुछ बदल जाता है. रणदीप भी इसी अंदाज में बदले और ‘हाईवे’ में अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ किरदारों में से एक किरदार महाबीर भाटी में जान फूंक दी. एक गरीब आदमी के गुस्से को, मां से जुड़े दर्दनाक अतीत को, और अपने बाहरी कठोरपन को लगातार बनाए रखने की जद्दोजहद को रणदीप ने न सिर्फ चेहरा और शरीर दिया बल्कि प्राण भी दिए. आलिया भट्ट के विस्मित कर देने वाले अभिनय ने बदकिस्मती से उनके इस काम को कम ही तारीफें दीं, लेकिन ‘हाईवे’ पसंद करने वालों के लिए यह फिल्म आज भी जितनी आलिया की है, उतनी रणदीप की भी है.

रणदीप को लेकर यह भी गौर करने वाली बात है कि फिल्मी सितारों के साथ उनके संघर्ष के दिनों के किस्से हमेशा जुड़े रहते हैं. लेकिन ऐसे किस्से रणदीप के बारे में कम सुनने को मिलते हैं. शुरुआती कुछ फिल्मों के दौरान आस्ट्रेलिया में कार धोने की नौकरी और वेटर बनने के किस्सों के अलावा रणदीप हुड्डा के संघर्ष वाले दिनों की कहानियां कम ही छपती हैं. अब तो उनके अफेयर के चर्चे भी नहीं होते और उनके लगातार थियेटर से जुड़े रहने की कहानियां भी नहीं छपतीं. न ही रणदीप अपने संघर्ष के दिनों को महिमामंडित करने वाले साक्षात्कार देते नजर आते हैं और न ही संघर्षों के बारे में पूछने पर नाटकीय अंदाज में रुक-रुककर कुछ अनसुना ही सुनाते हैं. उनमें एक अक्खड़पन है जो शाहरुख की तरह का तो नहीं, लेकिन एक जाट वाला है, जो कि पास आए लोगों को इंटिमिडेट भी करता है और उन्हें दूर से देख रहे दर्शकों को खूब पसंद भी आता है.

रणदीप रियल लाइफ शख्सियतों पर तीन बायोपिक फिल्में भी कर चुके हैं. ऐसा तीनों खान तो छोड़िए, अमिताभ बच्चन और नसीरुद्दीन शाह भी अभी तक नहीं कर पाए हैं. ‘मैं और चार्ल्स’ (2015) तथा ‘सरबजीत’ (2016) में हुड्डा ने अपने किरदारों को इतना गहरे उतरकर आत्मसात किया था कि हमारे लिए अब चार्ल्स शोभराज और सरबजीत सिंह हमेशा रणदीप हुड्डा ही रहेंगे. 2008 में राजा रवि वर्मा पर बनी ‘रंगरसिया’ – जो नवम्बर 2015 में ही रिलीज हो पाई - के लिए भले ही उन्होंने बाकी दोनों फिल्मों बराबर मेहनत नहीं की, लेकिन अब वे परदे पर इतने जंचने लगे हैं कि ‘रंगरसिया’ देखते वक्त धीरे-धीरे आप पर उनका असर चढ़ने लगता है.

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रियल लाइफ शख्सियत पर बनी उनकी चौथी बायोपिक ‘बैटल ऑफ सारागढ़ी’, जिसे राजकुमार संतोषी निर्देशित करने वाले थे, फिलहाल ठंडे बस्ते में चली गई है. इस फिल्म में रणदीप उन हवलदार ईशर सिंह की भूमिका निभाने वाले थे जिनके नेतृत्व में सन् 1897 में 21 सिख सैनिकों ने दस हजार अफगान सैनिकों का डटकर मुकाबला किया था. रणदीप पिछले दो-तीन साल से वे इसी फिल्म में अपने को पूरी तरह झोंके हुए थे. बाल लंबे करने के अलावा सिखों वाली लंबी दाढ़ी और मूंछों तक को बढ़ाकर वे एकदम मैथड़ एक्टिंग मोड में प्रवेश कर चुके थे! और आप खुद भी याद कर सकते हैं कि 2016 में चार मुख्य व पसंद की गई फिल्में करने के बावजूद (‘लाल रंग’, ‘सरबजीत’, ‘दो लफ्जों की कहानी’ व ‘सुल्तान’), 2017 में उनकी एक भी फिल्म रिलीज नहीं हुई. 2018 में भी वे केवल ‘बागी 2’ में एक बेहद छोटी भूमिका में नजर आए. रुक-रुककर बन रही किसी फिल्म के लिए इतना समर्पण आजकल कोई एक्टर नहीं दिखाता.

रणदीप की दूसरी बायोपिक ‘मैं और चार्ल्स’ एक बेहद बढ़िया फिल्म होने के साथ-साथ हमारे समय की एक अभागी फिल्म भी है. सीरियल किलर पर बनी यह बेहद स्टाइलिश फिल्म जो कि सम्मोहित करने वाला अभिनय करने वाले रणदीप का अलहदा ही आयाम दिखाती है, किसी ने देखी ही नहीं. जिन्होंने देखी वे चार्ल्स शोभराज की जीवन-यात्रा और कैरेक्टर-स्टडी देखना चाहते थे, लेकिन यह फिल्म सिर्फ जेल से भागने की एक घटना के आसपास की कहानी कहती थी. उससे ज्यादा कुछ नहीं. गलत तरीके के प्रमोशन की शिकार इस अभागी फिल्म में रणदीप ने एक बार फिर सर्वश्रेष्ठ अभिनय किया था - इतना बेहतरीन कि उन्हें किसी बड़े अवॉर्ड से नवाजा जाना चाहिए था - लेकिन जिस अभिनय की चहुंओर प्रशंसा होनी थी वो एक बार फिर सिमटकर चंद लोगों तक ही सीमित रह गया.

इसी अभागेपन का एक्सटेंशन रणदीप का फिल्मी करियर भी रहा है. रणदीप अब भले ही बेहद खिलता हुआ अभिनय करने लगे हैं लेकिन बॉक्स-आफिस के लिए वे अभी भी खोटे सिक्के ही हैं. ‘हाईवे’ ज्यादा चली नहीं, ‘मैं और चार्ल्स’ भी नहीं, ‘रंगरसिया’ और ‘लाल रंग’ फ्लॉप रही और उसके बाद रिलीज हुई ‘सरबजीत’ भी कम चली. ये सारी वे फिल्में हैं जिनमें रणदीप ने उम्दा से लेकर बेहद उम्दा तक की रेंज का अभिनय किया (और ‘सरबजीत’ को छोड़कर सभी फिल्में दर्शनीय से लेकर बेहद अच्छी फिल्मों की श्रेणी में भी आती हैं), लेकिन बावजूद अभिनय के प्रति इस समर्पण के, इन पांच फिल्मों में से एक भी हिट या सुपरहिट नहीं हुई. क्या आप अभी भी उन्हें हमारे समय का सबसे बदकिस्मत सितारा नहीं मानेंगे?

नहीं मिल पा रही यही कमर्शियल सफलता हासिल करने की छटपटाहट रणदीप हुड्डा में दिखती भी है. वे न सिर्फ सलमान खान के नजदीक रहने के लिए ‘सुल्तान’ और ‘किक’ जैसी विशाल फिल्मों में छोटे रोल करते हैं बल्कि उन्होंने ‘ऊप्स’ और ‘टॉम डिक एंड हैरी’ जैसे हादसे रचने वाले दीपक तिजोरी की फिल्म भी की. दीपक तिजोरी के निर्देशन वाली फिल्म ‘दो लफ्जों की कहानी’ में रणदीप बेहद स्मार्ट लगकर ग्रीक खुदाओं में भी सबसे सुंदर खुदा वाले रूप में नजर आए और इमोशनल दृश्यों में प्रभावित भी किया. लेकिन कथित तौर पर एक कोरियाई फिल्म ‘ऑलवेज’ का रीमेक यह सिनेमा बॉलीवुड की मसाला और मेलोड्रामा फिल्मों के संयुक्त छौंक सा लगता है जिसकी यही विशेषता इसे ले डूबती है.

रणदीप को इसी तरह की फिल्मों से बचने की जरूरत है. क्योंकि ऐसी फिल्में उनके अंदर मौजूद स्टार वाली विशेषताओं को सही ऑडियंस देने का वायदा करने के बाद सिर्फ उसका दोहन करेंगी और पिछली फिल्मों में उनके द्वारा किए बेहद सुघड़ अभिनय को व्यर्थ कर देंगी. ऐसी फिल्मों का संसार गुड-लुकिंग अभिनेताओं को हमेशा से कच्चा अभिनेता और अच्छा क्राउड-पुलर मानता है और ऐसा मानकर उन्हें कमर्शियल-मसाला फिल्मों के मकड़जाल में हमेशा के लिए जकड़ लेता है. हॉलीवुड में ब्रैड पिट जैसे अच्छे अभिनेताओं को और हमारे यहां शशि कपूर से लेकर विनोद खन्ना जैसे गुड-लुकिंग अभिनेताओं को इसीलिए बतौर एक सीरियस अभिनेता स्थापित होने में लंबा अरसा लगा और कई रहे जिन्हें लंबा अरसा लगने के बाद भी सफलता का साथ नहीं मिला.

रणदीप हुड्डा इस मामले में खुशकिस्मत हैं. अपनी दो से लेकर चार साल पुरानी पांच फिल्मों का उदाहरण देकर उन्होंने गुड-लुकिंग अभिनेताओं से जुड़ा यह स्टीरियोटाइप तोड़ा है. साबित किया है कि स्मार्ट और सेक्सी दिखने वाला स्टार भी कड़क एक्टर हो सकता है. अब उनको सिर्फ एक आसान काम और करना है! संयमित रहकर मसाला फिल्मों की अय्यारी से बचते रहना है, और जल्द ही कमर्शियल सक्सेस हासिल कर यह साबित कर देना है कि हमारे यहां एक कड़कमेल एक्टर भी 100 करोड़ी स्टार हो सकता है.