कानून होना और उसका पालन न होना, कानून के न होने से भी बदतर स्थिति है. 24 अगस्त को उत्तराखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए यह बात कही. हाई कोर्ट ने कॉर्बेट और राजाजी नेशनल पार्क में बाघों की गिरती संख्या पर चिंता जताते हुए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण से यह भी पूछा कि क्या वह कुछ समय के कॉर्बेट नेशनल पार्क का प्रबंधन अपने हाथ में ले सकता है.

उत्तराखंड की शान माने जाने वाले कार्बेट और राजाजी नेशनल पार्क वन्य जीव प्रेमियों और पर्यटकों के लिए जबर्दस्त आकर्षण का केंद्र भी हैं. इनकी जैव विविधिता और बाघों के सुलभ दर्शन हो सकने की संभावनाओं के कारण इन पार्कों को राज्य के पर्यटन व्यवसाय का आधार स्तंभ माना जाता है . राज्य की पर्यटन नीति में वाइल्ड लाइफ टूरिज्म को प्रमुखता दी गई है. लेकिन इन दोनों पार्कों की देखभाल के मामले में उत्तराखंड की सरकारों का रवैया इस कदर घोर लापरवाही और गैर जिम्मेदारी वाला रहा है कि उत्तराखंड हाई कोर्ट को स्थिति में हस्तक्षेप करना पड़ा है.

तीन अगस्त को भी उत्तराखंड हाई कोर्ट ने इन पार्कों की बदहाली पर उत्तराखंड सरकार को जमकर फटकार लगाई थी. अदालत ने इन पार्कों में हो रहे अवैध शिकार और बाघों के मारे जाने पर गहरी नाराजगी जताई. उसने राज्य सरकार से पूछा कि कार्बेट नेशनल पार्क में शिकार पर रोक लगाने के लिए स्पेशल टाइगर प्रोटक्शन फोर्स की स्थापना अब तक क्यों नहीं की गई. इस बारे में सरकार के जवाब पर भी कोर्ट ने नाराजगी जाहिर की. उसने पूछा, ‘अगर राज्य सरकार द्वारा स्पेशल टाइगर प्रोटक्शन के गठन के बारे में राज्य सरकार कोई स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं रखती तो हमें बाध्य होकर रक्षा मंत्रालय से कार्बेट में ईको टास्क फोर्स की तैनाती के लिए अनुरोध करना पड़ेगा’. हाई कोर्ट इस बारे में पहले भी राज्य सरकार को निर्देश दे चुका है. 2008 में ही इस प्रोटेक्शन फोर्स के गठन की अनुमति मिल गई थी और राज्य सरकार ने मई 2014 में इसके गठन की घोषणा भी कर दी थी. लेकिन हकीकत में कुछ हुआ ही नहीं.

ऐसा ही मामला वन गूजरों का भी है. उत्तराखंड हाई कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार को निर्देश दिया है कि बिना किसी विलंब के कार्बेट नेशनल पार्क और राजाजी नेशनल पार्क में रह रहे वन गूजरों को तत्काल पार्क से बाहर किया जाए. हाई कोर्ट ने यह निर्देश कार्बेट और राजाजी पार्क की अव्यवस्थाओं और कुप्रबंधन को लेकर दायर एक पुरानी जनहित याचिका पर दिया है. अदालत ने कार्बेट नेशनल पार्क में पर्यटकों को घुमाने वाली जिप्सियों और अन्य वाहनों को लेकर भी उत्तराखंड सरकार को कड़ी फटकार लगाई.

पुरानी समस्या

वन गूंजर इन दोनों पार्कों के लिए एक बड़ी समस्या हैं. 1983 में राजाजी नेशनल पार्क की विधिवत स्थापना से काफी पहले से वन गूजर इस इलाके के जंगलों में रहते रहे थे. पार्क बनने के बाद से इनके वहां रहने पर सवाल उठने लगे. 1998 में पार्क के इलाकों में रहने वाले वन गूजरों की विशेष जनगणना में पता चला कि पार्क के भीतर कुल 1560 वन गूजर परिवार रह रहे हैं हैं. उसके बाद यहां से कुल 1392 परिवारों को हरिद्वार के पथरी और गैंदीखेड़ा इलाके में बसा दिया गया, लेकिन ज्यादा जमीन उपलब्ध न होने के कारण 168 परिवार पार्क से विस्थापित नहीं किए जा सके. वैसे भी सरकार की प्राथमिकता में इनके विस्थापन का मुद्दा कभी रहा ही नहीं इसलिए पार्क में रह रहे वन गूजर परिवारों की संख्या लगभग20 वर्ष में बढ़कर फिर 1600 से अधिक हो चुकी है. इसके अलावा पार्क की सीमा में चिड़ियापुर, श्यामपुर और रसियाबाद इलाकों में भी 910 वन गूजर परिवार रह रहे हैं. हाई कोर्ट ने इन सभी को तत्काल पार्क से बाहर करने के निर्देश दिए हैं क्योंकि इस तरह के सुबूत भी मिले हैं कि कई बार ये वन गूजर इन पार्कों में अवैध शिकार करने वालों की मदद भी करते हैं.

उत्तराखंड राज्य बने लगभग 18 वर्ष पूरे होने के बाद भी वन गूजरों को अन्यत्र बसाने के लिए किसी नीति का न बन पाना दिखाता है कि राज्य सरकार इस गंभीर सवाल को लेकर कितनी संवेदनशील है. धन और जमीन की कमी जैसी बंदिशें इन वन गूजरों के विस्थापन में आड़े आती हैं. राज्य सरकार और उसके वन विभाग के पास इस बारे में कोई नीति का न होना भी समस्या को जटिल बनाता रहा है.

राजाजी की तरह कुछ वन गूजर कार्बेट पार्क से जुड़े इलाकों में भी रह रहे हैं. अगस्त 2017 में हुई विशेष गणना के मुताबिक 131 वन गूजर परिवार पूर्व में कॉर्बेट पार्क का हिस्सा रहे अमानगढ़ टाइगर रिजर्व में भी पाये गये थे. हाई कोर्ट के आदेश में इन परिवारों को भी दूसरी जगह बसाने की बात कही गई है. अदालत ने कॉर्बेट पार्क से जुड़े इलाकों में बन गूजरों की उपस्थिति को बेहद गंभीर माना है. हाई कोर्ट के आदेशों के बाद वन गूजरों में भी इस बात की उम्मीद जगी है कि शायद अब उनके रहने का कोई ठीक-ठाक इंतजाम हो सकेगा और सरकार उनके हालात पर ध्यान देने को बाध्य होगी.

निजी हाथियों पर भी आपत्ति

नैनीताल हाई कोर्ट ने कार्बेट नेशनल पार्क में स्थानीय पर्यटन व्यवसाइयों द्वारा पालतू निजी हाथियों के जरिए पर्यटकों को घुमाने पर भी घोर आपत्ति जताई है. अदालत ने कहा कि इन हाथियों को जिस तरह जंजीरों से बांध कर रखा जा रहा है, इनके साथ जिस तरह की क्रूरता की जा रही है वह 1975 के वाइल्ड लाइफ एक्ट की धारा 40 और 42 का सरासर उल्लंघन है. अदालत ने राज्य के चीफ वाइल्ड लाइफ वाईन को निर्देश दिया कि इन निजी हाथियों का पार्क में प्रवेश तुरंत रोका जाए और सभी हाथियों को सरकारी संरक्षण में ले लिया जाए. वन्य जीव विशेषज्ञ भी मानते हैं कि पार्क के भीतर बाहरी पालतू पशुओं के आने जाने से पार्क के वन्य जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और इससे पार्क के वन्य जीवों में गंभीर बीमारियों के फैलने की भी आशंका बनी रहती है.

अदालत ने कार्बेट और राजाजी में वाहनों की अंधाधुंध आवाजाही को भी प्रतिबंधित कर दिया है. हाई कोर्ट ने निर्देश दिया है कि कार्बेट नेशनल पार्क और राजाजी में प्रतिदिन 100 से अधिक वाहनों की आवाजाही नहीं की जाए. अदालत ने पार्कों की बदहाल व्यवस्था पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा ‘सरकार की भूमिका सिर्फ दर्शक की नहीं हो सकती. यह बेहद चिन्ताजनक स्थिति है. युद्धस्तर पर ऐसे इन्तजाम जल्दी से जल्दी किए जाने जरूरी हैं ताकि वन्य जीवों को बचाया जा सके.’

हाई कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद राज्य सरकार के अधिकारियों में खलबली मची हुई है. अदालत की फटकार के अगले ही दिन कार्बेट पार्क में पर्यटकों के लिए इस्तेमाल किए जा रहे साथ हाथियों को कार्बेट प्रशासन ने अपने कब्जे में ले लिया. हालांकि इनकी देख-रेख अब अधिकारियों के लिए मुसीबत बन गई है.

इसी तरह कार्बेट पार्क में वाहनों की संख्या प्रतिबंधित करने के लिए भी कदम उठाये जा रहे हैं. स्पेशल टाइगर प्रोटक्शन फोर्स के गठन के लिए भी अस्थाई प्रबंध कर दिए गये हैं. 15 अगस्त से कार्बेट पार्क के छह अलग-अलग क्षेत्रों में पार्क में पहले से तैनात वन्य जीव रक्षकों के अतिरिक्त 6-6 सुरक्षा कर्मियों को तैनात कर दिया गया है. इनमें पूर्व सैनिकों को भी शामिल किया गया है. इसी तरह कार्बेट के बाहरी इलाकों में रिसॉर्ट मालिकों के अवैध अतिक्रमणों के खिलाफ भी कार्रवाई की जा रही है.

पार्कों से जुड़े पर्यटन व्यवसायी इन निर्देशों के बाद से हताशा से गुजर रहे हैं. उनमें से अनेक तो ऐसे हैं जिन्होंने सरकार की पर्यटन नीति के तहत कर्ज लेकर अपना कारोबार शुरू किया है. कोर्ट के प्रतिबंधों से उनका काम ठप भी हो सकता है. इसलिए वे आंदोलन की राह पर हैं. इन कारोबारियों को सरकार से इस बात की नाराजगी है कि उसकी नीति एक ओर वन्य पर्यटन को बढ़ाने के लिए तरह तरह की योजनाओं पर जोर देती है, लेकिन अधिकारियों की लापरवाही व भ्रष्टाचार के कारण पार्कों की व्यवस्था लगातार बिगड़ती जा रही है. इसलिए वे भी अब अदालत की ओर ही उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं.