पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अस्थियां बीते रविवार को हरिद्वार में गंगा में विसर्जित कर दी गईं. इसके साथ ही यह खबर भी आई कि दिल्ली स्थित स्मृति स्थल - जहां वाजपेयी का अंतिम संस्कार हुआ- से अस्थियां चुनकर अलग-अलग कलशों में रखी गई हैं. भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की तरफ से कहा गया कि इन अस्थियों को देश की 100 नदियों में विसर्जित किया जाएगा.

यह घोषणा राष्ट्रीय स्तर पर हुई तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अलग से घोषणा की कि वे वाजपेयी की अस्थियों को उत्तर प्रदेश की सभी नदियों में विसर्जित करेंगे. उत्तर प्रदेश की इस घोषणा का असर पड़ोसी बिहार पर भी पड़ा. बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय ने भी लगे हाथ ऐलान किया कि पार्टी की बिहार इकाई भी वाजपेयी की अस्थियों को बिहार की सभी नदियों में विसर्जित करेगी.

नदियों की संख्या का गुणा-गणित अपना है. बिहार-उत्तरप्रदेश में ही छोटी-बड़ी नदियों को मिला दे तो संख्या 100 हो जाती है. लेकिन ऐसा लगता है कि भाजपा केंद्रीय इकाई अपने हिसाब से नदी तय करेगी, उत्तर प्रदेश की सरकार अपने अनुसार और बिहार की भाजपा इकाई अपनी तरह से.

खैर, नदियों का चयन तो अलग बात है, असल बात यह है कि क्या वाजपेयी ने इस तरह की कोई आखिरी इच्छा जताई थी कि उनके न रहने पर उनकी अस्थियों का इस तरह से विसर्जन किया जाए. अगर नहीं तो क्या भाजपा के नेता वाजपेयी के अस्थि विसर्जन में नेहरू मॉडल अपना रहे हैं? भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने तो अपनी वसीयत में अपनी अस्थियों के विषय में लिख दिया था कि उनकी अस्थियों का एक छोटा भाग गंगा में प्रवाहित करवा दिया जाए. उन्होंने यह भी लिखा था कि उनकी अस्थियों का कोई हिस्सा संरक्षित न किया जाए बल्कि बची हुई अस्थियों को ऊपर हवा में ले जाकर उन्हें खेतों में बिखरा दिया जाए जहां भारत के किसान खेती करते हैं, ताकि वे भारत की धरती के साथ मिलकर भारत का एक अभिन्न भाग बन सकें.

गोलवरकर ने तो वसीयत में साफ-साफ लिख दिया था कि उनकी मृत्यु के बाद कोई श्राद्धकर्म न किया जाए और न ही उनके नाम पर तामझाम. एक पत्र में उन्होंने यह भी लिखा था कि उनका कोई स्मारक भी नहीं बनाया जाना चाहिए. 

नेहरू ने अपने वसीयतनामे में इस बात की खास चर्चा अच्छे ही मन से की होगी लेकिन, उस वक्त भी जब तमाम तरह के तामझाम के साथ नेहरू की अस्थियों को देश भर में घूम-घूमकर खेतों में बिखेरा जाने लगा था तो इसकी खूब आलोचना हुई थी. कहा गया था कि वैज्ञानिक समाजवादी नेहरू के निधन के बाद इतना तमाशा क्यों किया जा रहा है. यह आलोचना इसलिए भी थी कि तब तक देश में अंतिम संस्कार को लेकर कई बड़े नेता तरह-तरह के प्रयोग कर चुके थे या कर रहे थे.

इनमें सबसे लंबी लकीर तो समाजवादी राम मनोहर लोहिया ने खींच दी थी. 1945 में जब लोहिया जेल से निकले तो गांधीजी ने उनसे कहा कि वे अब अपने पिता का श्राद्ध कर्म कर दें. लोहिया ने तब गांधीजी को साफ-साफ कह दिया कि उन्हें इस पर विश्वास नहीं. इतना ही नहीं, उन्हीं दिनों लोहिया ने अपनी वसीयत तैयार कर उसमें साफ-साफ लिख भी दिया कि जब उनकी मृत्यु हो तो शव बिजली शवदाह गृह में जलाया जाए और उसके बाद कोई कर्मकांड या तामझाम न किया जाए.

लोहिया तो खैर समाजवादी थे. लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक डॉ गोलवलकर और हिंदू राष्ट्रवादी नेता विनायक दामोदर सावरकर ने भी इस मामले में प्रगतिशील नजीर छोड़ी थी. हिंदुत्व शब्द के जनक कहे जाने वाले सावरकर ने तो खैर मृत्यु से पूर्व सिर्फ इतनी ही इच्छा जाहिर की थी कि मरने के बाद उन्हें विद्युत शवदाह गृह में जलाया जाए, लेकिन गोलवरकर ने तो वसीयत में साफ-साफ लिख दिया था कि उनकी मृत्यु के बाद कोई श्राद्धकर्म न किया जाए और न ही उनके नाम पर तामझाम. अपने देहांत से पूर्व एक पत्र में उन्होंने यह भी लिखा था कि उनका कोई स्मारक भी नहीं बनाया जाना चाहिए.

इन सबके बाद समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण ने भी एक नजीर ही पेश की थी. जब उनकी पत्नी जयप्रभा की मृत्यु हुई तो जयप्रकाश नारायण ने कोई श्राद्धकर्म नहीं किया था और न ही कोई दिखावा या कर्मकांडी तामझाम. इसकी जगह उन्होंने गीता, कुरान और बाइबिल का पाठ करवाया था.

ये सभी बातें इतिहास के दस्तावेजों में दर्ज हैं. जानने को तो भाजपा नेता भी जरूर ही इन किस्सों को जानते होंगे और यह भी जानते होंगे कि नेहरू के अस्थि विसर्जन वाले प्रसंग पर कितने सालों तक चर्चा होती रही थी. जानकारों के मुताबिक सब जानने के बाद भी जब-तब नेहरू मॉडल को कोसने वाले भाजपाई अगर वाजपेयी की अस्थियों को लेकर नेहरू मॉडल को ही अपना रहे हैं तो यह अस्थि विसर्जन से ज्यादा सियासी गुणा-भाग का मामला है.