बीते सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दर्ज़ की गई. इसमें शीर्ष अदालत से अपील की गई कि अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार निरोधक कानून (एससी/एसटी एक्ट) में केंद्र सरकार के हालिया संशोधन को इस याचिका की सुनवाई तक रोका जाए. याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई है कि इस कानून से बेगुनाहों को फंसाया जाएगा. केंद्र सरकार ने हाल ही में एक विधेयक के जरिये यह प्रावधान किया है कि एससी-एसटी एक्ट के तहत गिरफ्तारी होने से पहले किसी तरह की जांच ज़रूरी नहीं होगी.

यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए लाया गया. शीर्ष अदालत ने इस फैसले में कहा था कि एससी-एसटी एक्ट के तहत शिकायत दर्ज होने पर किसी भी लोक सेवक को उसके नियोक्ता प्राधिकारी की लिखित अनुमति के बगैर गिरफ्तार नहीं किया जा सकता. कोर्ट का यह भी कहना था कि यदि आरोपित व्यक्ति लोक सेवक नहीं है तो उसकी गिरफ्तारी के लिए जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की लिखित मंजूरी की जरूरत होगी. अदालत ने यह भी साफ किया कि एससी-एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज़ करने से पहले कम से कम पुलिस उपाधीक्षक स्तर के अधिकारी द्वारा आरोपों की प्राथमिक जांच कराई जा सकती है.

यह फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एससी/एसटी एक्ट का बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल हो रहा है. लेकिन दलित संगठनों ने इस फैसले का बड़े स्तर पर विरोध किया. मोदी सरकार के कुछ सहयोगी संगठनों ने भी उस पर दबाव बनाया. इसे देखते हुए सरकार अदालत के फैसले को पलटते हुए इस कानून को संशोधन के ज़रिए वापस अपने मूल स्वरुप में ले आई.

लेकिन हाल की तीन चर्चित घटनाएं एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग की दलील को वजन देती लगती हैं. ताजा मामला राजस्थान के एक पत्रकार का है. दुर्ग सिंह राजपुरोहित प्रदेश के बाड़मेर जिले से संबध रखते हैं और पिछले करीब 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. बीती 19 अगस्त को बाड़मेर पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेकर बिहार भेज दिया. उसका कहना है कि उसे दुर्ग सिंह की गिरफ़्तारी के लिए पटना की विशेष एससी/एसटी अदालत का वारंट मिला था जिस पर अमल करते हुए यह कार्रवाई की गई.

मामला क्या था?

यह वारंट उस शिकायत के आधार पर जारी हुआ था जो पटना के दीघा घाट निवासी राकेश पासवान के हवाले से अदालत में की गई थी. 31 मई 2018 को दाखिल की गई इस शिकायत में लिखा है कि दुर्गेश सिंह अपने अलग-अलग व्यवसायों में काम के लिए पटना से मजदूरों को ले जाते हैं. शिकायत के मुताबिक वे राकेश पासवान को अपने साथ छह महीने पहले बाड़मेर ले गए और वहां ले जाकर उन्हें पत्थर खनन के काम में लगा दिया. राकेश पासवान का यह भी कहना है कि अप्रैल में उनके पिता की तबीयत हो गई थी, लेकिन वे बड़ी मुश्किल से घर वापिस पहुंचे क्योंकि दुर्गेश सिंह ने मजदूरी के रूप में उन्हें कुछ नहीं दिया था.

इस रिपोर्ट में आगे लिखा है कि पंद्रह अप्रैल को दुर्गेश सिंह अपने साथियों को लेकर पटना आए और राकेश पासवान पर वापस राजस्थान चलने के लिए दबाव बनाया, लेकिन वे नहीं गए. शिकायत के मुताबिक इसके बाद सात मई को दुर्गेश फिर से चार लोगों को लेकर राकेश के घर पहुंचे और उन्हें जबरदस्ती घसीट कर मकान के बाहर घसीटकर उनके साथ मारपीट की. राकेश पासवान के मुताबिक इस दौरान उन्हें जातिवादी शब्दों से संबोधित किया किया. शिकायतकर्ता का कहना है कि पुलिस ने आपसी विवाद कह कर मामले को टाल दिया, इसलिए पुलिस से उन्हें न्याय मिलने उम्मीद नहीं है. उन्होंने दुर्गेश सिंह पर 72 हजार रुपए हड़पने और छह माह तक बेगार मजदूरी करवाने का भी आरोप लगाया है.

यह मामला विवादित क्यों है?

इस मामले में विवाद की शुरुआत अभियुक्त के नाम से ही होती है. जिन्हें पकड़ा गया उनका नाम दुर्ग सिंह है जबकि शिकायत दुर्गेश सिंह के खिलाफ दर्ज़ हुई है. दुर्ग सिंह के पिता गुमान सिंह सत्याग्रह से हुई बातचीत में इस पूरे घटनाक्रम को उनके बेटे के खिलाफ बड़ी साजिश बताते हैं. वे कहते हैं, ‘दुर्ग सिंह ही नहीं बल्कि हमारी तीन पीढ़ियों में से कोई भी पटना या बिहार के सैकड़ों किलोमीटर नजदीक भी नहीं गया.’ दुर्ग सिंह के चचेरे भाई प्रवीण राजपुरोहित भी कुछ ऐसी ही बात दोहराते हैं. वे बताते हैं, ‘दुर्ग के पिता और अन्य तीन भाई सरकारी कर्मचारी हैं. इस पूरे परिवार का पत्थर के काम से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है. तो उसके लिए मजदूर लाने का तो सवाल ही नहीं उठता.’

इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प पहलू एक राष्ट्रीय अखबार की एक ख़बर है. इसके मुताबिक राकेश पासवान ने स्वीकार किया है कि न तो वे दुर्ग सिंह को जानते हैं और न ही कभी बाड़मेर गए हैं. अपनी गिरफ़्तारी के बाद दुर्ग सिंह भी कुछ ऐसी ही बात कहते रहे हैं. राकेश पासवान के हवाले से इस रिपोर्ट में लिखा गया है कि उनसे दीघा निवासी संजय सिंह ने किसी व्यक्ति पर केस करने की बात कही थी, लेकिन उन्होंने इस बात से साफ इन्कार कर दिया. पासवान, सिंह के यहां पर जेसीबी चलाने का काम किया करते थे जिसे दो महीने पहले कुछ लोगों ने जला दिया था.

क्रेडिट- दैनिक भास्कर ई-पेपर
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राकेश पासवान के नाम से दी गई इस शिकायत में यह भी लिखा है कि वे पहले दीघा थाने में अपनी फरियाद लेकर पहुंचे थे, लेकिन पुलिस ने शिकायत दर्ज करने से मना कर दिया. जबकि इस रिपोर्ट की मानें तो दीघा के थानेदार ने ऐसी किसी भी बात से इन्कार किया है.

दुर्ग सिंह के परिवार का यह भी कहना है कि सात मई की जिस तारीख का ज़िक्र शिकायत में किया गया है उस दिन दुर्ग सिंह न सिर्फ बाड़मेर में मौजूद थे बल्कि उन्होंने वहां से एक पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम की लाइव कवरेज भी की थी. परिवार ने सत्याग्रह को उस कवरेज़ के वीडियो भी उपलब्ध करवाए हैं. उस कार्यक्रम में मौजूद कई लोगों ने मीडिया के सामने दुर्ग सिंह के सात तारीख को वहां उपस्थित होने की पुष्टि की है. इसके अलावा परिवार का दावा है कि पंद्रह अप्रैल को भी दुर्ग सिंह एक करीबी रिश्तेदार की शादी में शामिल हुए थे जिसके भी वीडियो और फुटेज उनके पास मौजूद हैं.

पुलिस की भूमिका भी सवालों के घेरे में

इस पूरे मामले में बाड़मेर पुलिस की भूमिका पर बड़े सवालिया निशान लगाए जा रहे हैं. दुर्ग सिंह के परिवार का आरोप है कि जिला एसपी को किसी आधिकारिक माध्यम के बजाय वाट्सएप के ज़रिए यह वारंट मिला था जिस पर उन्होंने अतिसक्रियता दिखाते हुए यह कार्रवाई की. गुमान सिंह बताते हैं, ‘हमने एसपी से कुछ दिन की मोहलत मांगी थी ताकि इस मामले से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया के बारे में जानकारी जुटा सकें. लेकिन एसपी ने तुरंत दुर्ग को गिरफ्तार करते हुए पटना रवाना कर दिया.’ गुमान सिंह शिकायत भरे लहज़े में कहते हैं, ‘मेरे बेटे के साथ पुलिस ऐसे पेश आई जैसे वह कोई कुख्यात आतंकवादी या देशद्रोही हो.’

कानून के जानकार बिहार की अदालत के वारंट पर राजस्थान पुलिस की इस सक्रियता को चौंकाने वाला बताते हैं. नियमों के हवाले से उनका कहना है कि दुर्गसिंह की गिरफ्तारी और मामला दर्ज़ होने के जिलों के अलग-अलग होने की वजह से पहले उन्हें स्थानीय अदालत में (ट्रांजिट रिमांड की मंजूरी लेने के लिए) पेश किया जाना चाहिए था. लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ. इतना ही नहीं कानूनन दुर्ग सिंह को बिहार लाने की जिम्मेदारी भी वहीं की पुलिस की थी. लेकिन इस काम को भी राजस्थान पुलिस ने खुद ही निभाना उचित समझा. बाड़मेर के ही वरिष्ठ पत्रकार और दुर्ग सिंह के करीबी देवकिशन ने मीडिया को बताया है कि राजस्थान पुलिस ने बिहार जाने के लिए सरकारी के बजाय निजी वाहन का इस्तेमाल किया जिसे बुक भी उनसे ही करवाया गया.

दुर्ग सिंह
दुर्ग सिंह

बाड़मेर के राजनैतिक और प्रशासनिक गलियारों में इस बात को लेकर चर्चा है कि बिहार के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक के बार-बार जिला भाजपा की नेता प्रियंका चौधरी के घर आने-जाने को लेकर दुर्ग सिंह ने सवाल उठाए थे. इसके अलावा बाड़मेर में ही एक कैफे के उद्घाटन के दौरान मलिक द्वारा लव जिहाद मामले के आरोपित एक लड़के के साथ तस्वीर खिंचवाने पर भी दुर्ग सिंह ने सोशल मीडिया पर आपत्ति ज़ाहिर की थी.

सत्याग्रह से हुई बातचीत में राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ कहते हैं कि यदि दुर्ग सिंह की पत्रकारिता को लेकर किसी को कोई शिकायत थी तो उसके लिए संविधान में तमाम विकल्प मौजूद हैं, लेकिन इस मामले में कानून का जबरदस्त दुरुपयोग हुआ है. वे कहते हैं, ‘यह एक विरली घटना है जिसमें एक पत्रकार के ख़िलाफ इस तरह का कानून का इस्तेमाल किया गया हो.’ इस मामले को जोर-शोर से उठाने वाले वरिष्ठ पत्रकार श्रवण सिंह राठौड़ भी किसी पत्रकार को इस तरह से गिरफ़्तार किए जाने को मीडिया की आजादी पर सीधे हमले के तौर पर देखते हैं.

पत्रकार और दलित कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी का इस मामले में कहना है कि इस तरह किसी भी एक्ट का दुरुपयोग निंदनीय है. वे आगे जोड़ते हैं, ‘ताज्जुब है कि पुलिस इतनी सक्रिय और दक्ष कब से हो गई? आमतौर पर देखने को मिलता है कि सक्षम ही इस कानून का दुरुपयोग करते हैं. जबकि वास्तविक मामलों में फरियादियों को दर-बदर की ठोकरें खानी पड़ती हैं और पुलिस भी भारी ढिलाई बरतती है.’

यह अकेला मामला नहीं

दुर्गसिंह की ही तरह पिछले दिनों नोएडा के एक रिटायर्ड कर्नल बीएस चौहान के खिलाफ भी एससी/एक्ट के गलत इस्तेमाल के मामले ने भी खूब चर्चाएं बटोरी थीं. 1965 और 1971 की लड़ाई में हिस्सा ले चुके चौहान के खिलाफ उनके पड़ोसी एडीएम हरीश चंद्र की पत्नी ने छेड़छाड़ और एससी/एक्ट कानून के तहत मामला दर्ज़ करवाया था. इसके चलते चौहान को पुलिस ने बिना तफ्तीश किए जेल भेज दिया. लेकिन सीसीटीवी फुटेज में यह साफ हुआ कि हरीश चंद्र अपने मकान में अवैध निर्माण कर रहे थे जिस पर चौहान द्वारा एतराज किए जाने के बाद हरीश और उनके साथियों ने 14 अगस्त को चौहान के साथ मारपीट की थी और अपने रसूख़ का इस्तेमाल कर उनके खिलाफ फर्ज़ी केस भी दर्ज करवा दिया था. फुटेज आने के बाद कोर्ट ने पुलिस को फटकार लगाई. इसके बाद न सिर्फ कर्नल चौहान को जमानत मिली बल्कि हरीश चंद्र को निलंबित करते हुए उनके खिलाफ मामला भी दर्ज़ किया गया. उनके द्वारा किए गए अवैध निर्माण को भी तोड़ दिया गया.

ऐसा ही एक और चौंकाने वाला मामला उत्तर प्रदेश के ही श्रावस्ती जिले से सामने आया था जब निबिहनपुरवा गांव के रहने वाले विद्याराम के तीन साल के बेटे पर पुलिस ने एससी एसटी/एक्ट के खिलाफ मामला दर्ज़ कर उसे न्यायालय में पेश होने का फरमान भेज दिया. ख़बरों के मुताबिक गांव के ही एक परिवार के साथ विद्याराम के परिवार का पिछले साल विवाद हो गया था जिसके बाद दूसरे पक्ष की एक महिला ने विद्याराम के परिवार पर एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज करवा दिया. इसी पर पुलिस ने यह कार्रवाई की. जब इसी साल मई में विद्या राम अपने बेटे को गोद में लेकर कोर्ट पहुंचे तो वहां हड़कंप मच गया. बच्‍चे को देखकर न्यायधीश ने भी पुलिस को जमकर लताड़ लगाई.

फिलहाल दुर्ग सिंह वाले मामले की गंभीरता देखते हुए बिहार सरकार ने इसकी उच्चस्तरीय जांच के आदेश दे दिए हैं. राजस्थान सरकार ने भी मामले की उच्चस्तरीय जांच कराए जाने का ऐलान किया है. दुर्ग सिंह को जमानत भी मिल गई है.

पिछले कुछ वर्षों में एससी/एसटी कानून के दुरुपयोग के मामलों में चिंताजनक बढ़ोतरी देखने को मिली है. इस बारे में नारायण बारेठ कहते हैं, ‘इस तरह गलत इस्तेमाल से न सिर्फ यह कानून बल्कि इसको बनाने के पीछे दलित और आदिवासी समाज को मजबूत करने की जो मंशा थी, वह भी निश्चित तौर पर कमज़ोर होगी.’

लेकिन कइयों के मुताबिक दूसरी तरफ भी मुश्किल है. उनका मानना है कि इस कानून के कड़े प्रावधानों में कुछ छूट देने की स्थिति में दलित और आदिवासियों को मिलने वाले न्याय की सुनिश्चितता के प्रभावित होने का ख़तरा है. इसे लेकर भंवर मेघवंशी का कहना है, ‘बजाय प्रावधानों को बदलने के सरकार को चाहिए कि वह न्याय व्यवस्था में तेजी लेकर आए ताकि पीड़ित को समय रहते न्याय मिल सके और बेगुनाह परेशान होने से बच सकें.’