दो-तीन दिनों तक देश भर में चर्चा में रहने के बाद बिहार के बिहियां बाजार में सब कुछ तेजी से सामान्य होता जा रहा है. मीडिया में भी भोजपुर जिले के इस कस्बे की खबर तेजी से हाशिये की राह पर है. जो घटना घटी थी, वह सबको मालूम है कि भीड़ ने एक महिला को उसके घर में घुसकर उसे निकाला था, उसके घर को आग के हवाले करने की कोशिश की थी और आखिर में उसे सरेआम निर्वस्त्र कर बाजार में घुमाया था. भीड़ का कहना था कि वह महिला एक हत्या में शामिल थी, इसलिए उसे सजा दी गई. तर्क यह भी था कि वह नचनिया समुदाय की है, थियेटर चलाती है इसलिए उसे नंगा करने का स्वाभाविक अधिकार समाज के पास था और है.

इस घटना के बाद पीड़िता को दो लाख रुपये का मुआवजा दे दिया गया है. 15 लोग गिरफ्तार हो चुके हैं. एक थानेदार और कुछ पुलिसवालों को निलंबित किया जा चुका है. बिहियां में पिछले दो दिनों से रोज आरा (भोजपुर का जिला मुख्यालय) से आवाजाही कर वहां का बनता-बिगड़ता माहौल देखने वाले आशुतोष पांडेय कहते हैं कि अब बिहियां में स्वाभाविक आक्रोश कम है, अराजक उल्लास ज्यादा है. वे बताते हैं, ‘भोजपुर (जिसे ज्यादातर आरा जिला कहते हैं) में हिंसक से हिंसक घटनाओं के बाद जो होता आया है, वही बिहियां की घटना के बाद होना तय था और वही हो रहा है.’ यानी कस्बा अपनी स्वाभाविक गति में वापस आ गया है.

उधर, राजधानी पटना में इस मुद्दे सियासत शुरू हो गई है. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने राज्य सरकार को बर्खास्त करने की मांग की है. दूसरी ओर राज्य के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी अलग ही तर्क के साथ आरजेडी नेता तेजस्वी यादव से भिड़ते दिख रहे हैं. वे ट्विटर पर जंग लड़ रहे हैं और कह रहे हैं कि जिस पार्टी के लोग इस घटना में शामिल हैं, वे महिलाओं की सुरक्षा पर बात कर रहे हैं. उनका कहना है कि सरकार ने तो थानाध्यक्ष समेत आठ पुलिसकर्मियों को निलंबित कर सख्त रवैया दिखाया है.

ये दो प्रमुख नेता ही नहीं, लगभग सभी नेता इसे मूल विषय से भटकाकर जातीय और दलीय फ्रेम में बांधने में ऊर्जा लगाए दिखते हैं. राज्य के कृषि मंत्री डॉ प्रेम कुमार से बात होती है तो उनका रुख भी कुछ ऐसा ही नजर आता है. वे कहते हैं, ‘घटना शर्मनाक है, लेकिन इसमें तो विपक्षी दल के कुछ लोगों के शामिल रहने की बात आ रही है फिर विपक्षी दल के नेता कैसे महिला सुरक्षा की बात कर रहे हैं?’

बिहियां के लोग कहते हैं कि यह तो होना ही था. यहां की निवासी प्रियंका कहती हैं इस इलाके में हिंसा की ऐसी हर घटना राजनीतिक समीकरण साधने का जरिया बनती रही है. प्रियंका एक-एक कर घटनाएं गिनाती हैं. यह बताते हुए वे कई दशक पहले तक चली जाती हैं. वे कहती हैं, ‘एक समय में यहां नक्सलवाद के परवान चढ़ने का दौर आया तो उसे भी पॉलिटिकली कैश किया जाता रहा. नरसंहारों का दौर चला तो तब भी ऐसा ही हुआ. रणबीर सेना जैसी निजी सेना का उदय हुआ तो भी. रोजमर्रा के जीवन में अपराध बढ़ने लगे तो सब अपराधियों को अपने-अपने हिसाब से राजनीतिक संरक्षरण मिलता रहा.’

स्थानीय राजनीति पर नजर रखने वाले कहते हैं कि इस सबसे मुक्ति के लिए ही आरावालों ने पिछली लोकसभा में एक प्रयोग किया. अपनी भाषा के प्रति कट्टर भाव रखने वाले भोजपुर के लोगों ने गैर भोजपुरी आरके सिंह को सांसद बना दिया. इस उम्मीद के साथ कि सख्त प्रशासक की पहचान रखने वाले एक पूर्व गृह सचिव सांसद बनेगा तो इलाके को अराजक पहचान से मुक्ति मिलेगी. लेकिन आरके सिंह के बारे में अब यह मशहूर है कि वे अपनी सुविधानुसार ही आरा आना पसंद करते हैं.

प्रियंका कहती हैं, ‘राजनीति ने दगा दिया तो मुक्ति की कामना के साथ आरा और भोजपुरवाले लग-भिड़कर एक संत के साथ हो लिये और बीते साल यहां दुनिया का सबसे बड़ा यज्ञ आयोजित करवाया कि शायद इससे शांति मिले, पहचान बदले. लेकिन साफ है कि ऐसे तमाम प्रयोगों का कोई नतीजा नहीं निकल रहा.’

प्रियंका की बातों को आधार बनाकर देखें और उतना पहले न जाकर हालिया घटनाओं पर ही नजर दौड़ाएं तो एक बात साफ दिखती है. बिहियां में जिस तरह चंद लोग भीड़ का रूप बनाकर एक महिला को निर्वस्त्र करने में जरा भी नहीं हिचकते तो इसके लिए जरूरी दुस्साहस अचानक नहीं आया है. लगातार कई सालों से जारी अपराध और अराजकता के चलते इलाके का मिजाज ऐसा बना है.

ज्यादा पीछे नहीं जाते. कुछ साल पहले जाते हैं, जब आरा से ही सटे कुरमुरी बाजार में एक घटना घटी थी. छह महादलित लड़कियों और महिलाओं को बंधक बनाकर सरेआम सामूहिक बलात्कार की खबर आई थी. खूब हो-हल्ला हुआ था. लेकिन कुछ दिनों में ही हल्ला करने वाले शांत हो गये थे. वह घटना भी कोई मामूली घटना नहीं थी. उसी वक्त एक और घटना घटी थी. आरा से बिक्रमगंज रोड पर पड़ने वाले एक गांव में एक दलित बच्चे को दिनदहाड़े गांव वालों के सामने इसलिए जलाकर मारा गया था कि उसकी बकरी किसी के खेत में चली गयी थी. इसी तरह जब आरा में रणवीर सेना प्रमुख ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या हुई तो उसके बादा शव को लेकर पटना पहुंचे उनके समर्थकों ने राजधानी में कैसा उत्पात मचाया था, यह भी सबको याद है. इतना पीछे न भी जाएं तो कुछ महीन पहले ही आरा से सटे गड़हनी बाजार के पास एक पत्रकार की मौत पर यह बात भी सामने आयी थी कि एक छुटभैये नेता ने उसे गाड़ी से रौंदकर मार दिया.

आरा-भोजपुर वाले अपनी इस अराजक-भयावह पहचान से मुक्ति की कोशिश नहीं करते, ऐसा नहीं है. इस इलाके में एक बड़ा वर्ग है, जिससे बात करेंगे तो वे 1857 की क्रांति के नायकों में से एक बाबू वीर कुंवर सिंह को इलाके की पहचान से जोड़ेंगे, जगजीवन राम का नाम लेकर इस जगह का बखान करेंगे. लेकिन इस जमात की संख्या तेजी से घटती जा रही है और आरा-भोजपुर का इलाका अपने गढ़े पुराने मुहावरे के साथ ही आगे बढ़ रहा है - आरा जिला घर बा तो कवना बात के डर बा.