महाराष्ट्र में नक्सलियों से मुकाबला करने के लिए सी-60 के नाम से एक कमांडो फोर्स है. बताया जाता है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार इस फोर्स के कौशल और काबिलियत से खासी प्रभावित है. इसीलिए उसने नक्सल प्रभावित अन्य राज्यों को मशविरा दिया है कि वे भी इसी फोर्स की तरह अपने यहां नक्सलियों से मुकाबला करें.

द टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक केंद्रीय गृह सचिव राजेश गौबा ने इस सिलसिले में नक्सल प्रभावित राज्यों को पत्र लिखा है. इन राज्यों में छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, ओडिशा, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश प्रमुख हैं. हालांकि इन राज्यों में भी नक्सलियों से निपटने के लिए विशेष दस्ते बने हुए हैं. मसलन- इन सभी राज्यों में ख़ास ताैर पर इसके लिए तैनात सीआरपीएफ (केंद्रीय आरक्षित पुलिस बल) ने इस बाबत अलग से अपने कमांडोज़ की ‘कोबरा बटालियन’ बना रखी है.

ओडिशा में नक्सलियों से मुकाबले के लिए एसओजी (विशेष अभियान दस्ता). आंध्र और तेलंगाना में राज्य पुलिस की ग्रेहाउंड फोर्स. छत्तीसगढ़ ने नक्सलियों के गढ़ बस्तर में वहीं के स्थानीय आदिवासियों की ‘बस्तरिया बटालियन’ बनाई है. ये सब नक्सलियों से दो-दो हाथ करने में कुशल माने जाते हैं. लेकिन फिर भी केंद्र का मानना है कि महाराष्ट्र की सी-60 इन सभी से बेहतर और प्रभावी है. इस फोर्स ने इसी अप्रैल में बिना कोई नुकसान उठाए गढ़चिरौली में 39 नक्सलियों को ठिकाने लगाया था.

इसी के बाद केंद्र ने नक्सल प्रभावित राज्यों को सी-60 से सीख लेने की सलाह दी है. यह बटालियन बनाने का मूल विचार महाराष्ट्र के आईपीएस (भारतीय पुलिस सेवा) अधिकारी केपी रघुवंशी (अब रिटायर्ड) का माना जाता है. बात 1989-90 की है. तब उन्हाेंने गढ़चिरौली के 60 ग्रामीण आदिवासियों के साथ इस बटालियन की शुरूआत की थी. इन्हें प्रशिक्षण देकर नक्सलियों से मुकाबले के लिए तैयार किया गया. आज इसमें 800 से ज़्यादा इस तरह के कमांडोज़ 24 टीमों में बंटे हुए हैं.

चूंकि ये कमांडो स्थानीय आदिवासी ही हैं इसलिए इन इलाकों के चप्पे-चप्पे से वाक़िफ़ हैं. स्थानीय- गोंडी और मराठी भाषाएं धाराप्रवाह बोल लेते हैं. स्थानीय लोगों का भी इनसे संपर्क-संबंध सहज है. उनसे इन्हें सक्रिय मदद मिलती है. जंगलों में रहने और वहां की लड़ाईयों में इन्हें महारात हासिल है. बताया जाता है कि इस बटालियन में अधिकांश वे लड़के हैं जिन्होंने नक्सली हिंसा अपने परिवार के किसी न किसी सदस्य को खोया है. इसलिए भी वे ख़ुद होकर इस काम के लिए आगे आए हैं.