दिल्‍ली हाई कोर्ट ने हरियाणा के हिसार (मिर्चपुर गांव) में साल 2010 के दौरान दलितों पर हुए हमले और इस समुदाय के दो लोगों की हत्या के मामले में 20 और आरोपितों को दोषी मानते हुए उन्हें सजा सुनाई है. इन 20 लोगों को एक निचली अदालत ने बरी कर दिया था. इस तरह अब तक इस मामले में कुल 33 आरोपितों को दोषी ठहराया जा चुका है. दिल्ली हाई कोर्ट ने 33 में से 12 आरोपितों को हत्या और एससी-एसटी एक्ट के तहत उम्र कैद की सजा सुनाई है.

इस मामले में जाट समुदाय के कुल 97 लोग आरोपित थे. 24 सितंबर, 2011 को इनमें से 15 लोगों को एक निचली अदालत ने सजा सुनाई थी और अन्य लोगों को रिहा कर दिया था. निचली अदालत के फैसले के खिलाफ पुलिस और पीड़ित पक्ष ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील की थी कि रिहा किए गए आरोपितों को सजा दी जाए और दोषियों की सजा बढ़ाई जाए. वहीं इस मामले में दोषियों ने भी निचली अदालत द्वारा सुनाए फैसले को चुनौती दी थी. इन मामलों पर फैसला सुनाते हुए पर कोर्ट ने यह टिप्पणी भी की है कि आजादी के 71 साल बाद भी अनुसूचित जाति के लोगों के खिलाफ अत्याचार के मामलों में कमी के संकेत नजर नहीं आ रहे हैं.

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि जाट समुदाय के लोगों ने बाल्मीकि समुदाय के सदस्यों के घरों को जानबूझकर निशाना बनाया. कोर्ट ने इस घटना को ‘नियोजित हमला’ बताते हुए कहा कि जाट समुदाय के सदस्यों का मकसद बाल्मीकि समुदाय के लोगों को सबक सिखाना था.

अप्रैल, 2010 में हिसार जिले के मिर्चपुर में जाट समुदाय के लोगों ने दलितों पर हमला करते हुए उनका पूरा का पूरा गांव जला दिया था. इस घटना में एक 60 साल के विकलांग व्यक्ति और उसकी बेटी की मौत हो गई थी. इसके बाद दलित गांव से पलायन कर गए थे. दिल्ली हाई कोर्ट ने आज हरियाणा सरकार को यह निर्देश भी दिया है कि वह पलायन कर चुके दलित परिवारों का पुनर्वास करवाए.