पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने एस गुरुमूर्ति को भारतीय रिजर्व बैंक के निदेशक मंडल में शामिल करने का निर्णय लिया. गुरुमूर्ति की पहचान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े स्वदेशी चिंतक की रही है. वे स्वदेशी जागरण मंच के संस्थापकों में से एक हैं.

गुरुमूर्ति पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और इस नाते भी उनकी ख्याति रही है. इस पेशे और आर्थिक मामलों में खास दिलचस्पी होने की वजह से संघ और भाजपा के लोग आर्थिक विषयों पर उनकी राय को तवज्जो देते हैं. गुरुमूर्ति एक दौर में इंडियन एक्सप्रेस समूह के सर्वेसर्वा रामनाथ गोयनका के करीब रहे. उस दौर में उन्होंने रिलायंस और इसके संस्थापक धीरूभाई अंबानी के खिलाफ कई खोजी खबरें की थीं.

गुरुमूर्ति की एक और पहचान संकटमोचक की भी है. वे यह काम दो तरह से करते आए हैं. देश के कुछ कारोबारी घरानों में जब आपसी खींचतान की वजह से विवाद बढ़ा तो उन मामलों को सुलझाने का श्रेय गुरुमूर्ति को ही दिया गया. ऐसे ही वे भाजपा के अंदर के कुछ विवादों को भी सुलझाते आए हैं. जब 2013 में नरेंद्र मोदी को 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए चुनाव अभियान समिति का प्रमुख नियुक्त किया गया था और पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी इससे नाराज हो गए थे तो उस वक्त भी संकटमोचक का काम गुरुमूर्ति ने ही किया था.

गुरुमूर्ति भाजपा में भले ही किसी औपचारिक पद पर नहीं रहे हों, लेकिन पार्टी और संघ में उनकी पैठ ऐसी है कि 2014 में मोदी सरकार बनते वक्त यह चर्चा भी चल रही थी कि वे कैबिनेट मंत्री बन सकते हैं और उन्हें कोई महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंपा जा सकता है. लेकिन ऐसा नहीं हो सका और अब गुरुमूर्ति रिजर्व बैंक के निदेशक मंडल में हैं.

संघ की भूमिका

गुरुमूर्ति देश की आर्थिक नीतियों में स्वदेशी रुख अपनाने के हिमायती रहे हैं. इसी तरह की बात नीति आयोग के मौजूदा उपाध्यक्ष राजीव कुमार भी करते आए हैं. कहा जा रहा है कि राजीव कुमार और गुरुमूर्ति दोनों की नियुक्ति में संघ की भूमिका रही है. संघ के पदाधिकारियों के बीच लंबे समय से यह बात चलती रही है कि देश की आर्थिक नीतियां स्वदेशी मिजाज की नहीं हैं और दुनिया के बड़े देशों और आर्थिक संस्थाओं से प्रभावित होकर बनती रही हैं.

जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तो उस वक्त भी संघ और सरकार के बीच आर्थिक नीतियों को लेकर मतभेद था. शुरुआती सालों में नरेंद्र मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर भी संघ में बहुत उत्साह का भाव नहीं रहा. यही वजह रही कि कई बार संघ के कुछ सहयोगी संगठनों ने सरकार के खिलाफ आलोचनात्मक रुख अपनाया. भारतीय मजदूर संघ ने श्रम सुधार से संबंधित सरकार की नीतियों की आलोचना सार्वजनिक तौर पर की थी.

जिस नोटबंदी और जीएसटी को मोदी सरकार और भाजपा अपनी सबसे बड़ी कामयाबी बताती है, उसे लेकर खुद संघ प्रमुख मोहन भागवत ने एक बार कहा था कि आर्थिक नीतियां बनाते वक्त देश के छोटे कारोबारियों का ध्यान रखा जाना चाहिए. उस वक्त उनके बयान का यह मतलब निकाला गया था कि उन्होंने सरकार को नोटबंदी और जीएसटी से छोटे कारोबारियों को हुई परेशानियों को दूर करने का संकेत दिया है. कुछ लोगों ने यह भी कहा कि भागवत का वह बयान गुरुमूर्ति से चर्चा करने के बाद आया था.

कहा जा रहा है कि नीति आयोग में राजीव कुमार को लाकर और भारतीय रिजर्व बैंक में गुरुमूर्ति को लाकर संघ ने आर्थिक नीतियों में अपना दखल बढ़ाने की कोशिश की है. सत्याग्रह ने संघ में काम कर चुके कई लोगों से बातचीत की. उनके मुताबिक संघ पदाधिकारियों को कई बार यह लगता है कि पार्टी से जो लोग सरकार में जाते हैं, वे वहां की मजबूरियों में बंध जाते हैं और कई बार उनके पास विशेषज्ञता भी नहीं होती. ऐसे में अधिकारियों की ओर से जो सलाह उन्हें दी जाती है, उसमें वे बंध जाते हैं. संघ का मानना है कि अगर गुरुमूर्ति जैसे किसी व्यक्ति को महत्वपूर्ण पद पर बैठाया जाता है तो बहुत संभव है कि ऐसा न हो, वह स्वतंत्र रूप से संघ की आर्थिक दृष्टि के हिसाब से नीतियां तय करने में अपनी भूमिका निभाए.

हालांकि, गुरुमूर्ति की नियुक्ति रिजर्व बैंक में अंशकालिक निदेशक के तौर पर है. इसका मतलब यह हुआ कि सीधे-सीधे रिजर्व बैंक की नीतियों के निर्धारण में उनकी भूमिका कम से कम आधिकारिक तौर पर नहीं होगी. लेकिन सरकार की ओर से नियुक्त किए जाने के चलते और संघ के साथ-साथ भाजपा से नजदीकी की वजह से गुरुमूर्ति की राय को दरकिनार करना केंद्रीय बैंक के लिए आसान नहीं होगा.

पहले नीति आयोग और अब रिजर्व बैंक में स्वदेशी आर्थिक माॅडल की बात करने वाले लोगों को बैठाकर संघ ने आर्थिक नीतियों में अपना दखल बढ़ाने की कोशिश तो की है लेकिन इससे आम लोगों को लाभ पहुंचाने वाले क्या नतीजे आते हैं, यह देखा जाना अभी बाकी है.