अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने चौंकाने वाले ट्वीट्स के लिए अक्सर चर्चा बटोरते रहते हैं. विवादों से अलग उनके ट्वीट्स की एक और खासियत यह है कि उनमें जमकर विस्मयादिबोधक चिह्न यानी एक्सक्लेमेशन मार्क का इस्तेमाल किया जाता है. आंकड़ों की बात करें तो साल 2016 में ट्रंप के ट्विटर अकाउंट से किए गए 2,251 ट्वीट्स ऐसे हैं जिनमें उन्होंने एक्सक्लेमेशन मार्क का इस्तेमाल किया है. डोनाल्ड ट्रंप के बोलने पर भी अगर आप गौर करें तो उनके चेहरे पर कई तरह के एक्सप्रेशंस आते-जाते दिखते हैं. शायद यही वजह है कि जब वे लिखकर कुछ कहना चाहते होंगे तो इस चिह्न का इस्तेमाल करते हैं और कई-कई बार करते हैं.

2006 में एक्सक्लेमेशन मार्क पर हुए एक शोध में बताया गया था कि यह चिह्न 100 में से 73 बार महिलाओं और 27 बार पुरुषों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है. आमतौर पर ऑफिस में जो महिलाएं नरमी से बात करती हैं, उन्हें ज्यादा पसंद किया जाता है. यह चिन्ह लिखित में होने वाली बातचीत में शामिल इसी नरमी को भी दिखाता है. यही वजह है कि महिलाएं इसका ज्यादा इस्तेमाल करती हैं.
एक्सक्लेमेशन मार्क के इतिहास पर गौर करें तो ऐसा दावा किया जाता है कि चौदहवीं सदी के इटैलियन पोएट लाकपो अल्पलो ड अर्बसाया ने इसकी खोज की थी. पुनर्जागरण काल में जब इटली-रोम की सभ्यता में क्रांतिकारी बदलाव हो रहे थे तब अर्बसाया ने भाषा को यह चिह्न दिया जिसका नाम उन्होंने पुंक्टुस एडमरीटिव्स या पुंक्टुस एक्सक्लेमेटिव्स रखा था. इटली के अलावा बाकी जगह इसे पॉइंट ऑफ एडमायरेशन कहा जाता था, यानी किसी की तारीफ करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला. सत्रहवीं सदी आते-आते इसे उत्साह, प्रशंसा और आश्चर्य के प्रतीक की तरह भी इस्तेमाल किया जाने लगा.
किसी तीव्र भाव को प्रकट करने के अलावा एक्सक्लेमेशन मार्क को उन जगहों पर भी इस्तेमाल किया जाता है जहां आप किसी काम को तुरंत और अनिवार्य रूप से होते देखना चाहते हैं. जैसे - सुनो! बचाओ! बाहर जाओ! इसके अलावा अनौपचारिक बातचीत में उत्सुकता दिखाने के लिए भी इसका इस्तेमाल होता है. इस तरह यह चिह्न भावनाओं में कही गई बातों या अनौपचारिकता का प्रतीक बन जाता है. यही कारण है कि प्रोफेशनल मामलों में इससे बचने की सलाह दी जाती है.
मशहूर लेखकों की बात करें तो अमेरिकी लेखक अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने अपने एक बेहद लोकप्रिय उपन्यास ‘द ओल्डमैन इन द सी’ में केवल एक बार ही इस चिह्न का इस्तेमाल किया था. वहीं उनके समकालीन एक अन्य लेखक एफ स्कॉट फिट्सजेरल्ड का इस चिह्न से जुड़ा एक कथन बेहद मशहूर है - ‘इसे इस्तेमाल करना कुछ ऐसा है जैसे खुद अपने चुटकुले पर हंसना.’ अब चूंकि लिखने वाला इस चिह्न के द्वारा खुद अपनी भावनाओं को वजन देने का काम करता है, इसलिए नए भाषाविद् इसे सेल्फी ऑफ ग्रामर भी कहते हैं.
भाषा विज्ञानियों का यह भी मानना है कि पूर्णविराम और प्रश्नवाचक चिह्न की जगह विस्मयादिबोधक चिह्न का प्रयोग किसी भी बात को अस्पष्ट बना सकता है. जैसे कि इस चिन्ह को लगाने से यह साफ नहीं हो पाता कि आप कुछ पूछ रहे हैं या बता रहे हैं, या आपकी बात खत्म हो गई या बाकी है. इसके अलावा यह चिह्न इस बात का भी भ्रम पैदा करता है कि या तो आप अपनी कही हुई बात के प्रति जरूरत से ज्यादा कॉन्फिडेंट हैं या फिर खुद भी किसी कन्फ्यूजन का शिकार हैं. गंभीर लेखन और औपचारिक वार्तालाप में ऐसा होना सूचनाओं को अविश्वसनीय बनाता है, इसलिए भी इस चिह्न का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल इसका दुरुपयोग साबित हो सकता है. कुल मिलाकर कहने का मतलब यह है कि हर अच्छी चीज की तरह इसका भी संतुलित इस्तेमाल ही किया जाना चाहिए!
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