पिछले साल के अगस्त महीने की ही बात है. पखवाड़ा भी दूसरा ही था. तब तमिलनाडु में राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदल रहा था. राज्य की सत्ताधारी पार्टी एआईएडीएमके (अखिल भारतीय अन्नाद्रविड़ मुनेत्र कड़गम) के दो विरोधी धड़े (एक मुख्यमंत्री ईके पलानिसामी के नेतृत्व वाला और दूसरा ओ पन्नीरसेल्वम की अगुवाई वाला) नज़दीक आ रहे थे. फिर पास आते-आते दोनों मिल गए और ओपीएस यानी कि ओ पन्नीरसेल्मव को सरकार में उपमुख्यमंत्री पद मिल गया. साथ में पार्टी संयोजक का जिम्मा भी. हालांकि उन्हें सरकार-संगठन में दोनों ही ज़िम्मेदारियां ईपीएस यानी ईके पलानिसामी के साथ साझेदारी में मिली थीं. फिर भी उस घटनाक्रम से सबसे ज़्यादा फायदे में उन्हें ही माना गया था. अनुमान ये भी था कि अगर कुछ छोटी-मोटी चुनौतियां से निपट लें तो ओपीएस राज्य की राजनीति के नायक बन सकते हैं.

वक़्त बीतते-बीतते साल गुज़र गया है. इतने दिनों में एआईएडीएमके में कोई बड़ी उथल-पुथल भी सुनाई नहीं दी. हालांकि आेपीएस अपनी पार्टी के लिहाज़ से कोई बड़ा बदलाव लाए हों या लाने की कोशिश की हो, ऐसा भी कुछ सामने नहीं आया. अलबत्ता अब ये ज़रूर संकेत मिलने लगे हैं कि ओपीएस नाराज़ या असंतुष्ट हों न हों, परेशान ज़रूर हैं. बीते कुछ दिनों से उनके साथ बन रही परिस्थितियों और इस पर उनकी प्रतिक्रियाओं से इस तरह के संकेत मिल रहे हैं. ऐसे कुछ उदाहरणों पर एक नज़र डालते हैं.

उपमुख्यमंत्री पद ‘कुर्बान’ करने की इच्छा

अभी बीते गुरुवार की ही बात है. राजधानी चेन्नई में ओपीएस पार्टी की कार्यसमिति की बैठक को संबोधित कर रहे थे. बताते हैं कि इस दौरान उन्होंने इच्छा जताई कि वे ‘पार्टी के हित के लिए अपना संवैधानिक पद (उपमुख्यमंत्री का) कुर्बान कर सकते हैं.’ साथ में यह भी जोड़ा कि ऐसा करने के बाद वे पूरी तरह पार्टी संगठन को मज़बूत करने का ही काम करेंगे. जिससे कि 2019 के लोक सभा चुनाव में राज्य की सभी 40 सीटों पर उनकी पार्टी के उम्मीदवारों को जीत हासिल हो सके.

इससे एक महीने पहले ओपीएस दिल्ली गए थे. उन्हें रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात कर उन्हें धन्यवाद देना था कि उन्होंने आड़े वक़्त में उनकी मदद (इसका जिक्र आगे होगा) की. लेकिन रक्षा मंत्री ने 20 मिनट उन्हें अपने दफ़्तर के बाहर इंतज़ार कराया. निर्मला सीतारमण ने उनके साथ गए उन्हीं की पार्टी के राज्य सभा सदस्य वी मैत्रेयन से मुलाकात कर ली, लेकिन वे ओपीएस से नहीं मिलीं. इसके बाद ओपीएस को चेन्नई आकर कहना पड़ा, ‘हमारा दिल इतना बड़ा होना चाहिए कि हर परिस्थिति को बर्दाश्त कर सकें.’

आेपीएस की परेशानी की वज़ह क्या हो सकती है?

जानकारों के मुताबिक ओपीएस की परेशानी के दो कारण हो सकते हैं. पहला- पार्टी पर उनकी पकड़ ढीली हो रही है. पार्टी का समर्थक वर्ग कम हो रहा है. दूसरा- उन्हें केंद्र की ओर से मिल रहा समर्थन भी कम हो रहा है. इन दोनों कारणों से जुड़ती ख़बरें भी लगातार सामने आ रही हैं. मसलन- बीते महीने ही पता चला कि एआईएडीएमके की सदस्य संख्या तेजी से घट रही है. पार्टी के जिला सचिवों की बैठक में ख़ुद ओपीएस ने ही बताया कि एक समय 1.5 करोड़ सदस्यों वाला आंकड़ा अब घटकर 80 लाख हो गया है.

पार्टी के एक जिला सचिव ने इसे स्वीकार भी किया. उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बताया, ‘हां, यह सही है कि पार्टी की सदस्य संख्या घटी है. पर इसके पीछे जयललिता का देहांत भी एक कारण हाे सकता है. तमाम पार्टी समर्थक उनके निधन के सदमे से अब तक उबरे नहीं हैं. इस तरह के लोग कहीं गए नहीं हैं, मगर वे पार्टी में सक्रिय भी नहीं हैं.’ एक अन्य नेता ने भी माना कि जिला सचिवों की बैठक में पार्टी की घटती सदस्य संख्या के मसले पर चर्चा हुई थी. साथ ही इस स्थिति से निपटने की रणनीति पर भी.

लेकिन बात सिर्फ सदस्य संख्या की होती तो भी ठीक था. बताया जाता है कि पार्टी के भीतर असंतोष भी बढ़ रहा है. उदाहरण के तौर पर जुलाई में जब केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ लोक सभा में विपक्ष की ओर से अविश्वास प्रस्ताव लाया गया तो पार्टी सांसद चाहते थे कि एआईएडीएमके इस पर होने वाले मतदान से ग़ैरहाजिर रहे. पार्टी नेतृत्व ने भी इस राय को एकबारगी मान लिया था. लेकिन अचानक भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह का फोन आने के बाद ओपीएस-ईपीएस ने यह फैसला बदल दिया.

सिर्फ यही नहीं. इसी महीने जब राज्य सभा के उपसभापति का चुनाव हुआ तब भी एआईएडीएमके केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के समर्थन में खड़ी थी. उच्च सदन में एआईएडीएमके की सदस्य संख्या 13 है. इसने एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) के प्रत्याशी हरिवंश नारायण सिंह के समर्थन का आंकड़ा 125 तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई. ख़बरों की मानें तो इस लगातार समर्थन के बावजूद पार्टी प्रमुख ओपीएस के प्रति केंद्र सरकार का रवैया अब उतना उदार नहीं रहा जितना सालभर पहले था.

सूत्रों की मानें तो केंद्र सरकार का रवैया भी ओपीएस की परेशानी की बड़ी वज़ह है. रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण से जुड़े उदाहरण का फिर जिक्र किया जा सकता है. बताते हैं कि सीतारमण इसलिए ओपीएस से नाराज़ थीं क्योंकि उन्होंने राजनीतिक अपरिपक्वता का परिचय दिया. दरअसल बीते दिनों ओपीएस के भाई बीमार थे. मदुरै के अस्पताल में भर्ती थे. हालत बिगड़ी तो उन्हें ओपीएस के आग्रह पर रक्षा मंत्री ने सेना एयर एंबुलेंस से चेन्नई भिजवाया. मगर ओपीएस ने ख़ुद ही इस मामले को उजागर कर दिया.

तो अब ओपीएस क्या कर सकते हैं?

ओपीएस के पास अब ख़ुद को साबित करने की चुनौती आन पड़ी है. अपनी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के सामने और उन्हें लगातार मदद दे रही मोदी सरकार के सामने भी. यही वज़ह है कि वे अब संगठन की गतिविधियों पर अपना ध्यान केंद्रित करने के बारे में सोचने लगे हैं. संभव है उन्हें दो-तीन चीजों का अंदाज़ा हो गया हो. इनमें पहली तो यही कि अगर लोक सभा चुनाव में उनकी पार्टी बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाई तो नुकसान सिर्फ एआईएडीएमके को नहीं होगा बल्कि उन्हें भी पर्याप्त होगा.

वे अच्छी तरह जानते हैं कि सियासत में कोई किसी का स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता. ऐसे में ज़रूरत पड़ने पर अगर नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा ने डीएमके की तरफ रुख कर लिया, जिसकी संभावना भी जताई जा रही है तो ओपीएस का सियासी करियर ख़तरे में भी पड़ सकता है. इसकी वज़ह ओपीएस की राजनीतिक पृष्ठभूमि में ही छिपी हुई है. यह ओपीएस को ऐसा नेता बताती है जो हमेशा किसी करिश्माई नेता की छत्रछाया में ही रहा है. पहले- एमजी रामचंद्रन और फिर जयललिता.

शायद यही वज़ह है कि अब ओपीएस को नरेंद्र मोदी के करिश्मे से आस लगी हुई है. इसीलिए उन्होंने बीते गुरुवार की बैठक में कार्यसमिति के सदस्यों से कहा भी, ‘एआईएडीएमके अगला चुनाव सहयोगी दलों के साथ मिलकर लड़ेगी. चाहे वे राज्य के हों या राष्ट्रीय स्तर के. सहयोगी दलों के बारे स्थिति उसी समय स्पष्ट की जाएगी जब चुनावों की घोषणा होगी.’ ऐसे में कोई अचरज की बात नहीं होगी अगर ओपीएस उपमुख्यमंत्री पद छोड़कर भाजपा के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन से अपनी पार्टी और ख़ुद को भी भविष्य में मज़बूती देते दिखें.