निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग ने ‘लिंकन’ (2012) और ‘ब्रिज ऑफ स्पाइज’ (2015) के बाद 2017 में एक और काबिल हिस्टॉरिकल ड्रामा फिल्म बनाई थी. पॉलिटिकल थ्रिलर के अंदाज में बनी ‘द पोस्ट’ 1971 के वक्त के उस अध्याय को परदे पर रचती है जिसमें अमेरिका के द वॉशिंगटन पोस्ट नामक अखबार ने लंबी और कड़ी मेहनत के बाद विवादित ‘पेंटागन पेपर्स’ को पब्लिश करने का साहस दिखाया था. कार्यकारी संपादक बेन ब्रैडली (टॉम हैंक्स) और उस अखबार की पहली महिला पब्लिशर कैथरीन ग्रैहम (मेरिल स्ट्रीप) ने मिलकर यह लड़ाई लड़ी थी.
20 साल से ज्यादा समय तक चले विध्वंसक वियतनाम युद्ध की विभीषिका इन सरकारी कागजों में तो दर्ज थी ही, उन पर यह भी लिखा हुआ था कि निक्सन की सरकार ने किस तरह अमेरिकी जनता और प्रेस से छिपाकर वियतनाम के कई इलाकों-शहरों को नेस्तनाबूत किया था. और यह जानते हुए भी कि उस युद्ध को जीतना संभव नहीं है, अपने फायदों के लिए युद्ध जारी रखा.

उस उम्दा फिल्म की बात यहां करने की वजह उस फिल्म का अंतिम वह दृश्य है, जिसमें एक सिक्योरिटी गार्ड वॉटरगेट नामक बिल्डिंग में रात की गश्त के वक्त एक कमरे का दरवाजा खुला पाता है. फिल्म वहीं खत्म हो जाती है, लेकिन जानने वाले समझ जाते हैं कि स्पीलबर्ग ने यह अतिरिक्त सीन दो कारणों से फिल्म में रखा है! एक तो यह बताने के लिए कि पेंटागन पेपर्स के तुरंत बाद निक्सन पर वॉटरगेट स्कैंडल की मार पड़ने वाली है, और यह मार भी उस द वाशिंगटन पोस्ट नामक अखबार के द्वारा ही पड़ेगी जो कि स्पीलबर्ग की फिल्म का नायक है. दूसरी, और शायद सबसे अहम वजह कि तकरीबन सभी मिजाज की फिल्में बना चुके स्टीवन स्पीलबर्ग उस आलातरीन और महान फिल्म को ट्रिब्यूट देना चाहते थे, सम्मान में याद करना चाहते थे, जिसने ‘द पोस्ट’ जैसी गहन पड़ताल आधारित पॉलिटिकल थ्रिलर फिल्मों के बनने का मार्ग प्रशस्त किया – ‘ऑल द प्रेसीडेंट्स मैन’(1976).
1972 में पहली बार वॉटरगेट स्कैंडल दुनिया के सामने आया. रिपब्लिकन पार्टी के नेता और राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने अगले चुनावों की तैयारी करने के लिए अपने धुर विरोधियों के फोन टैप करने शुरू कर दिये थे और उन्हें ब्लैकमेल करने के लिए वे कई तरह की अनैतिक जासूसी करवा रहे थे (हालांकि 1972 में हुए चुनावों में निक्सन ही जीते, और वॉटरगेट स्कैंडल की शुरुआती आंच उनपर बेअसर रही).
लेकिन आफत तब आई जब एक रात उनके आदमी मुख्य विपक्षी पार्टी, यानी कि डेमोक्रेटिक पार्टी के मुख्यालय पहुंच गए और मुख्य डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों और उनका चुनाव करने वाले सदस्यों के फोन में माइक्रोफोन छिपाने लगे, ताकि बाद में उनकी बातें सुनी जा सकें. एक सिक्योरिटी गार्ड की मुस्तैदी ने पुलिस को हरकत में ला दिया और जब ये पांचों आदमी पकड़े गए तो पहले-पहल इसे सिर्फ चोरी की एक मामूली घटना माना गया जो खुलते-खुलते न सिर्फ अमेरिकी राजनीतिक इतिहास के सबसे बड़े स्कैंडल वॉटरगेट के नाम से प्रसिद्ध हुई बल्कि निक्सन को राष्ट्रपति पद तक से इस्तीफा देकर (1974) बाकी की तमाम जिंदगी एक बदनाम राजनेता के रूप में जीने को मजबूर कर गई.
डेमोक्रेटिक पार्टी के जिस मुख्यालय डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी में यह घटना घटी वो वाशिंगटन में मौजूद वॉटरगेट ऑफिस कॉम्प्लेक्स का हिस्सा था, और वहीं से अमेरिकी इतिहास के इस काले अध्याय का नाम ‘वॉटरगेट स्कैंडल’ पड़ा. लेकिन निक्सन की कारस्तानियां सिर्फ वॉटरगेट के दफ्तर तक सीमित नहीं थीं, बल्कि धीरे-धीरे खोजी पत्रकारिता की वजह से पता चला (फिल्म का ‘फॉलो द मनी’ नामक कालजयी संवाद याद है आपको?) कि यह अमेरिकी राष्ट्रपति अपने व्हाइट हाउस में भी सीक्रेट टेप रिकॉर्डिंग करवाता था और व्हाइट हाउस के हर दफ्तर में हर आने-जाने वाले की हर बात रिकॉर्ड की जाती थी!
जब यह स्कैंडल इतना बड़ा हो गया कि न्यायालय को दखल देना पड़ा तब यह भी सामने आया कि अमेरिकी राष्ट्रपति के करीबी सरकारी मुलाजिमों ने उनकी भरसक मदद की थी. इस वजह से 69 व्हाइट हाउस कर्मचारियों को वॉटरगेट स्कैंडल वाले केस में आरोपित बनाया गया और उनमें से 48 अपराधी सिद्ध हुए और उन्हें कठोर सजा मिली. इन्हीं अपराधियों की वजह से इस स्कैंडल पर बनी और 1976 में रिलीज हुई रॉबर्ट रेडफोर्ड व डस्टिन हॉफमैन कृत फिल्म का नाम पड़ा - ‘ऑल द प्रेसीडेंट्स मैन’.
यह फिल्म इसी नाम की एक नॉन-फिक्शन किताब पर आधारित थी, जो कि बॉब वुडवर्ड और कार्ल बर्नस्टीन नामक उस वक्त के नए खोजी पत्रकारों ने वॉटरगेट स्कैंडल का सिलसिलेवार खुलासा करते वक्त लिखी थी. तब अमेरिकी प्रेस इस घटना को छोटा मान रहा था और वाशिंगटन पोस्ट के इन जिद्दी-जुनूनी पत्रकारों ने ही कई सूत्रों की मदद लेकर लगातार इस केस में खुलासे किए थे. इन दोनों को ही वॉटरगेट स्कैंडल में मुख्य रहस्य उजागर करने के लिए जाना जाता है और आज की तारीख में भी ये दोनों अमेरिकी पत्रकारिता जगत में अहम योगदान दे रहे हैं.
सवा दो घंटे की इस फिल्म ने लेकिन, किताब के आधे हिस्से को ही अपनी कहानी बनाया. निक्सन के करीबियों की पड़ताल करने और उनके नाम सबूतों के साथ इस स्कैंडल में शामिल होने की कहानी कहने के बाद फिल्म खत्म हो जाती है. निक्सन का मुख्य कर्ता-धर्ता होना, सीक्रेट वॉटरगेट टेप्स का पता चलना, अमेरिकी सीनेट द्वारा कड़ाई से निक्सन से कहना कि वे टेप्स उनके पास जमा करवाएं, सेटरडे नाइट मैसेकर नाम से कुख्यात रात में निक्सन का कई महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों को हटा देना या कुछ व्यक्तियों का खुद ही इस्तीफा दे देना, और आखिर में 18.5 मिनट की अवधि को मिटा कर सौंपे गए टेप्स के बाद उठे बवंडर की वजह से निक्सन का राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने को मजबूर होना. फिल्म यह सबकुछ नहीं दिखाती. थ्रिलर फिल्म बनाने वाले किसी भी शख्स की बांछें इन सिनेमैटिक घटनाओं के बारे में सुनकर ही खिल उठेंगी, लेकिन पॉलिटिकल थ्रिलर ‘ऑल द…’ इन्हें नहीं दिखाकर ही महान फिल्म बनती है.
डिटेक्टिव स्टोरी या गहन पड़ताल करने वाली प्रोसीजरल पॉलिटिकल थ्रिलर
इन घटनाओं को न दिखाने की एक मुख्य वजह तो यह है कि फिल्म 1976 में बनकर रिलीज हुई थी. वॉटरगेट कुछ तीन-चार साल पुरानी 1972-73 की घटना थी और शुरुआती महीनों में उदासीन रहने के बाद अमेरिकी जनता के बीच उसके इतने चर्चे थे कि लोगों ने टीवी सेट्स से चिपककर केस की सुनवाई हर दिन सुनी थी. अभिनेता रॉबर्ट रेडफोर्ड इस फिल्म के निर्माता भी थे और जब वे फिल्म स्टूडियो के पास इस प्रोजेक्ट को लेकर गए तो स्टूडियो मालिकों का कहना था कि पूरे अमेरिका को पता है कि फिल्म के अंत में क्या होगा. तो फिर वे इसे क्यों देखेंगे? रेडफोर्ड साहब ने यह जवाब देकर कहानी को उन्हें बेचा कि यह एक ‘डिटेक्टिव स्टोरी’ है जिसमें जो होता है वो किसी को पता नहीं है. और सच में, कहानी बिक गई!
जाहिर तौर पर ‘ऑल द...’ एक डिटेक्टिव स्टोरी नहीं है. केस और सबूतों की गहन पड़ताल करने वाली यह एक ऐसी पॉलिटिकल थ्रिलर फिल्म है जिसका मिजाज प्रोसीजरल फिल्मों वाला है. सस्ते थ्रिल्स देने की जगह ऐसी फिल्में अपने सब्जेक्ट से जुड़े हर सूत्र की महीन पड़ताल करती हैं और पुलिस, न्यायालय, मेडिकल या मीडिया जैसे क्षेत्रों से जुड़े विभागों की अंदरूनी कार्यप्रणाली को विस्तार से दिखाती हैं. यही यथार्थवाद उन्हें यादगार बनाता है और जब ऐसी प्रोसीजरल फिल्में किसी सच्ची घटना को रचती हैं तो यह टूल अविस्मरणीय नतीजे देता है.
आपने पुलिस प्रोसीजरल फिल्में बहुत देखी होंगी. एल.ए. कॉन्फिडेंशियल (1997), मेमोरीज ऑफ मर्डर (2003), फार्गो (1996) जैसी. लेकिन जर्नलिज्म की टेक लेकर प्रोसीजरल फिल्में कम ही बनती हैं. क्योंकि खबरें खोजना एक उबाऊ काम और प्रक्रिया मानी जाती है और जब तक कोई पत्रकार किसी साइको किलर को नहीं खोज रहा होता, तब तक फिल्मकारों को उनमें दिलचस्पी नहीं होती. इसी वजह से ऊपर वर्णित ‘द पोस्ट’, 2015 में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का ऑस्कर जीतने वाली बेमिसाल ‘स्पॉटलाइट’, और कुछ हद तक डेविड फिंचर की महा-शानदार ‘जोडिऐक’ (2007) ही जेहन में आती हैं जो शुद्ध रूप से सच की खोज करने वाली जर्नलिज्म आधारित प्रोसीजरल फिल्में हैं. और इन सब की गंगोत्री प्रेस की आजादी की वकालत करने वाली, बिना तोड़े-मरोड़े तथ्यों को पेश करने वाली और पत्रकारिता की अंदरूनी कार्यप्रणाली को महीन अंदाज से उभारने वाली ‘ऑल द प्रेसीडेंट्स मैन’ ही है.
इसी फिल्म ने तथ्यों पर आधारित, दर्शकों को थका देने वाली फिल्म बनाने का हौसला रखने के रास्ते खोले थे. चीप थ्रिल्स की चिंता नहीं की थी और उलझे केसों को सिलसिलेवार स्क्रीन पर अनेक आरोपित नामों के साथ रखने का तरीका सुझाया था. लेकिन खुद को नीरस बनाकर नहीं, रोमांच तो ऐसी कहानी के कण-कण में मौजूद होता है, बल्कि खुद को जीवन के एक हिस्से का रेप्लिका बनाकर. इसीलिए पूरी किताब की कहानी न कहकर ‘ऑल द...’ ने एक सीमित अवधि की कहानी कहना चुना और वो प्रकिया व तथ्य गहन पड़ताल करते हुए दिखाए जिसने वॉटरगेट स्कैंडल को एक्सपोज करने में सबसे जरूरी भूमिका निभाई थी.
पत्रकारिता पर फिल्म बनाना आसान नहीं!
कहानी और पटकथा के अलावा भी ‘ऑल द...’ में काफी कुछ खास है. फिल्म ने द वाशिंगटन पोस्ट के न्यूजरूम को हूबहू एक फिल्म स्टूडियो में सेट बनाकर तैयार किया था, क्योंकि पोस्ट अपने न्यूजरूम में फिल्म शूट करवाने के लिए राजी नहीं था. कहते हैं कि पत्रकारिता और पत्रकारों की जिंदगी को सटीक तरह से कैप्चर करने का जुनून निर्देशक ऐलन जे पकुआ (Alan J.Pakula) और निर्माताओं में इस कदर था कि 200 टेबल उसी कंपनी से खरीदी गईं जिससे कि पोस्ट अपनी टेबल-कुर्सियां खरीदता था. और उसी रंग में उन्हें रंगा गया जैसा पोस्ट की मेजों का रंग था! सैकड़ों तस्वीरें असली न्यूजरूम की खींची गईं और हर कोने को नापा गया, ताकि हूबहू पोस्ट का न्यूजरूम स्टूडियो में क्रिएट किया जा सके. टनों कागज खरीदे गए और पोस्ट ने अपने न्यूजरूम में बेकार पड़े कागजों को भी दान किया तब जाकर स्टूडियो के हर टेबल पर फाइलों की कतार लग सकी. कला निर्देशक जॉर्ज जेंकिन्स को ऐसी मेहनत करने के लिए उस वर्ष का ऑस्कर पुरस्कार मिला.
मुख्य अभिनेता रेडफोर्ड और हॉफमैन ने भी महीनों पोस्ट के न्यूजरूम में बिताए (नीचे तस्वीर) और दर्जनों संपादकीय मीटिंग्स में किनारे बैठकर संपादकों और रिपोर्टरों को समझने का प्रयास किया. चूंकि बर्नस्टोन चेन स्मोकर थे तो हॉफमैन ने भी सैकड़ों सिगरेट फूंक डालीं. यह भी कहा जाता है कि फिल्म की शूटिंग के पूरे समय उस वक्त के सबसे बड़े हॉलीवुड स्टार रॉबर्ट रेडफोर्ड वॉटरगेट होटल में ही ठहरे!

टाइपराइटर और सिनेमेटोग्राफी
फिल्म में दो और खास चीजें बार-बार ध्यान खींचती हैं. टाइपराइटरों की आवाज और न्यूजरूम को फिल्माने का तरीका. लगातार बजते टाइपराइटर न्यूजरूम की गहमागहमी को प्रदर्शित करने का सबसे अच्छा तरीका तो बने ही, साथ ही उन्हें एक बिंब की तरह भी उपयोग किया गया कि देश का सबसे ताकतवर नेता झूठ कितना भी फैला ले, आखिर में लिखे हुए सच की ही जीत होती है. दो खूबसूरत दृश्यों ने खास तौर पर इस फलसफे को रचा जिसमें देखने वाले को स्क्रीन पर सामने एक टीवी रखा नजर आता है और उसमें निक्सन की विजय की कोई खबर तेज आवाज में सुनाई देती है. वहीं पार्श्व में फिल्म के दोनों पत्रकार नायक बेखबर होकर अपने-अपने टाइपराइटरों पर तेज रफ्तार में खबरें टाइप कर रहे होते हैं, और इन टाइपराइटरों से निकली आवाज निक्सन के उत्सव पर हावी रहती है. फिल्म का अंत भी ऐसे ही एक उम्मीद भरे सीन से होता है और क्या ही कमाल अंत है वो!
‘ऑल द...’ की सिनेमेटोग्राफी भी उच्च की है. लंबे-लंबे टेक और खासकर न्यूजरूम में पत्रकारों को फिल्माने का तरीका. चाहे वो पास-पास लगी मेजों से बच-बचकर भागते नायकों के ट्रैकिंग शॉट हों या फिर नायकों के लंबे क्लोजअप शॉट्स. एक सीन खासा प्रभाव छोड़ता है जो कि एक सिंगल टेक में बिना कट वाला छह मिनट लंबा सीन है. रेडफोर्ड अपनी सीट पर बैठकर कुछ लोगों से लगातार फोन पर बात करते चलते हैं ताकि वॉटरगेट से जुड़ा कोई ब्रेक-थ्रू मिले और इस दौरान फ्रेम के उलटे हाथ वाले खाली हिस्से में न्यूजरूम की गहमागहमी नजर आती रहती है. फिर बहुत धीरे-धीरे, इतना कि आपको पता ही न चले, फ्रेम एक दम नायक का टाइट क्लोजअप ले लेता है और फोन की बातचीत इस कदर दिलचस्प होने लगती है कि जल्द ही नायक को केस में ब्रेक-थ्रू मिल जाता है और वो खुशी के मारे चहक पड़ता है. सीन खत्म!
प्रेस की आजादी और मौजूदा भारत
वॉटरगेट स्कैंडल के वक्त निक्सन प्रशासन की तरफ से कई तरह के दबाव द वाशिंगटन पोस्ट पर डाले गए थे. चूंकि वो इकलौता अखबार था जो लगातार वॉटरगेट पर और निक्सन के खिलाफ लिख रहा था, और उसकी खबरों को बाकी के अखबार भी शुरुआती कई महीनों तक महत्वपूर्ण नहीं मानकर कैरी नहीं कर रहे थे, इसलिए पोस्ट एक तरह से अलग-थलग भी पड़ चुका था.
कई तरह से दबाव डालने के अलावा निक्सन प्रशासन उसकी सार्वजनिक आलोचना करने में भी पीछे नहीं रहता था और एक बार तो सीधे व्हाइट हाउस में होने वाली प्रेस-वार्ता के दौरान पोस्ट को घटिया और बकवास खबरें छापने वाला अखबार तक बता दिया गया था. अखबार पर तमाम तरह के दबाव बढ़ रहे थे और सूत्रों के हवाले से खबर लिखने की वजह से भी निक्सन प्रशासन उसे गलत ठहराने के मौके ढूंढ़ता था (इस स्कैंडल में अहम सोर्स ‘डीपथ्रोट’ नामक एक शख्स था जिसकी पहचान 30 साल तक गुप्त रखी गई और उसे उस वक्त की मशहूर पोर्न फिल्म ‘डीपथ्रोट’ का नाम दिया गया! 30 साल बाद पता चला कि वो सूत्र एफबीआई के दूसरे नम्बर के ताकतवर एसोसिएट डायरेक्टर मार्क फैल्ट थे!).
ऐसे दबावों के बीच टेबल के ऊपर पैर रखकर बैठने वाले कड़क एडीटर बेन ब्रैडली ही (जिनकी भूमिका ‘द पोस्ट’ में टॉम हैंक्स ने निभाई) दोनों युवा पत्रकारों के पक्ष में खड़े रहे. बेरीटोन आवाज वाले जैसन रोबार्ड्स को प्रभावशाली अंदाज में इस भूमिका का निर्वाह करने के लिए 1977 में बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का ऑस्कर मिला और वॉटरगेट स्कैंडल पर द वाशिंगटन पोस्ट द्वारा की गई रिपोर्टिंग के लिए पोस्ट को आगे चलकर पुलित्जर सम्मान से नवाजा गया.
प्रेस की आजादी पर संकट आज वापस डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका पर मंडरा रहा है. और हमारे भारत में भी लगातार स्वतंत्र प्रेस के दमन की खबरें आए दिन सुनने-समझने को मिल रही हैं. फेक न्यूज के बढ़ते प्रकोप, सत्ता प्रतिष्ठानों को खुश रखने के लिए किए गए स्तुतिगान को न्यूज कहकर प्रसारित करने की प्रवृत्ति, सत्ता के शीर्ष पर विराजमान नेताओं के प्रति आलोचनात्मक न हो पाने की बंदिशें, और लगभग खत्म हो गई खोजी पत्रकारिता ने हिंदुस्तान की प्रेस से उसके अच्छे दिन छीन लिए हैं.
ऐसे में ‘ऑल द प्रेसीडेंट्स मैन’ को देखकर शायद आज का भारत कुछ जरूरी सबक सीख सके. कहते हैं न, वर्तमान जब-जब इतिहास से सीख लेता है तो भविष्य भला-चंगा बना रहता है!
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