बात सितंबर 1941 की है. दूसरा विश्वयुद्ध जारी था. अमेरिका अब तक मैदान-ए-जंग में कूदा नहीं था. ब्रिटेन के विमान वाहक एचएमएस इलस्ट्रस के कप्तान लुइस माउंटबेटन अमेरिका के नज़दीक डेरा डाले हुए थे. पर्ल हार्बर में अमेरिकी फौजियों को दिए भाषण के बाद सवाल-जवाब के दौरान एक फौजी ने उनसे पूछा कि अमेरिका कब और किस जगह से इस जंग का हिस्सा बनेगा. माउंटबेटन ने पोडियम के पीछे टंगे नक़्शे को फैलाया और पॉइंटर (वह लकड़ी जिससे नक़्शे पर किसी स्थान इंगित किया जाता है) को पर्ल हार्बर पर रख दिया. ‘यहां’ माउंटबेटन बोले, ‘बिना किसी शक के’.

जब उनसे पूछा गया क्यों, तो उन्होंने कहा, ‘जापानी सेना औचक लड़ाई के लिए जानी जाती है.’ उनके मुताबिक़ पर्ल हार्बर के जहाज़ी बेड़े हवाई आक्रमण के लिए तैयार नहीं थे और जापान के हवाई जहाज़ों के लिए यह स्थान सबसे नज़दीक था. तीन महीने बाद बिलकुल ऐसा ही हुआ था.

माउंटबेटन से जुड़े इतिहास पर काफ़ी कुछ लिखा जा चुका है. उनकी फौजी क़ाबिलियत पर हमेशा से ही बहस होती रही है हम उनके वायसराय के कार्यकाल पर बात करते हैं.

बर्मा की लड़ाई के हीरो और जापान को नतमस्तक कराने वाले लुइस माउंटबेटन ब्रिटिश हिंदुस्तान के बीसवें और आख़िरी वाइयराय थे. लैरी कॉलिन्स और डॉमिनिक लैपियर की क़िताब ‘माउंटबेटन एंड पार्टिशन ऑफ इंडिया’ में दर्ज एक साक्षात्कार में उनका कहना था कि 18 दिसंबर 1946 को पहली बार इंग्लैंड के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने उन्हें भारत का वायसराय बनने का निमंत्रण दिया था. तब माउंटबेटन इंग्लैंड की जल सेना में बतौर रियर एडमिरल थे और दूसरे विश्वयुद्ध में दक्षिण एशिया में इंग्लैंड और अलाइड (मित्र राष्ट्र) सेनाओं के सुप्रीम कमांडर की हैसियत से तैनात थे. जंग ख़त्म हो चुकी थी. अब उनको वायसराय की पदवी दी जा रही थी. वायसराय दुनिया की 20 फ़ीसदी आबादी का मुखिया और इंग्लैंड के साम्राज्य में महारानी के बाद सबसे ताक़तवर व्यक्ति था. इस पद का आवेदन ठुकराना मुश्किल काम था. पर एटली के प्रस्ताव से वे पशोपेश में पड़ गए.

इसकी वजह यह थी कि उन दिनों भारत में हालात बिलकुल बदल गए थे. ब्रिटेन की लेबर पार्टी की सरकार ने हिंदुस्तान को आज़ाद करने की घोषणा कर दी थी, इंडियन नेशनल कांग्रेस और मुस्लिम लीग की मिलीजुली अंतरिम सरकार असफल थी, देश में दंगे हो रहे थे, जिन्ना को पाकिस्तान और कांग्रेस को एकीकृत भारत चाहिए था. वायसराय लॉर्ड वावेल कांग्रेस और मुस्लिम लीग को किसी समझौते पर लाने में असफल रहे थे. वावेल के पहले लॉर्ड लिनलिथगो भी नाकाम रहे थे. ऐसे में वायसराय बनने का मतलब था अपने सार्वजनिक जीवन को दांव पर लगाना क्योंकि असफल होने पर इतिहास में बदनाम होने का डर था. माउंटबेटन ऐसे जोख़िमों से वाबस्ता थे. उनकी पत्नी एडविना, मां प्रिंसेस विक्टोरिया और अन्य सलाहकारों ने उन्हें समझाने की कोशिश की पर वे नहीं माने.

दरअसल, वायसराय बनना उनका सपना था और इसका ख़ुलासा उन्होंने ‘माउंटबेटन एंड पार्टिशन ऑफ इंडिया’ में किया. वे बताते हैं कि 1921 के दौरान जब वे पहली बात हिंदुस्तान आये थे तो वायसराय की शान-ओ-शौक़त देख कर उनके ज़ेहन में यह ख़्याल आया था. ख़्वाब के सच होने का समय था, वे कैसे ‘ना’ कर देते! हालांकि, इन्हीं दो लेखकों की क़िताब ‘फ़्रीडम एट मिडनाइट’ में लिखा है कि माउंटबेटन वायसराय बनकर हिंदुस्तान नहीं आना चाहते थे. चूंकि, ‘माउंटबेटन एंड पार्टिशन ऑफ इंडिया’ बाद में प्रकाशित हुई है, इसलिए डिकी (माउंटबेटन) की इच्छा वाली बात को माना जा सकता है.

एटली को ‘हां’ कहने से पहले माउंटबेटन ने काफ़ी मोलभाव किया. जिनमें अपनी पसंद के अफ़सर, एक नया हवाई जहाज और इंग्लैंड वापस आकर नेवी अफ़सर के तौर पर बहाली आदि शर्तें थीं. एटली ने हर बात मानने की हामी भर दी. 22 मार्च, 1947 को माउंटबेटन तमाम अभूतपूर्व शक्तियां लेकर हिंदुस्तान आये. लॉर्ड वावेल तब देश में ही थे. यह पहला अवसर था निवर्तमान और वर्तमान वायसराय एक ही समय पर भारत में थे. ये प्रोटोकॉल माउंटबेटन ने ही तुड़वाया था. अब इसके बाद हिंदुस्तान की तकदीर उनके हाथों लिखी जानी थी.

माउंटबेटन ने आने से पहले और बाद में समझ लिया था कि मोहम्मद अली जिन्ना कितने भी सुशिक्षित क्यों न हों, उन्हें समझाना लगभग नामुमकिन था. ‘माउंटबेटन एंड पार्टिशन ऑफ इंडिया’ में उन्होंने खुलकर यह बात कही है कि जिन्ना एक अड़ियल नेता थे जिनकी वजह से भारत का विभाजन हुआ.

जवाहरलाल नेहरू से उनकी मुलाकात 1946 में मलय (मलेशिया) में हो चुकी थी और वे उन्हें एक शानदार व्यक्तित्व का आदमी मानते थे. सबसे अहम बात, वे जान गए थे कि अगर उन्हें सफलता प्राप्त करनी है तो महात्मा गांधी को अपने साथ लेकर चलना होगा और गांधी से मोलभाव करने से पहले डिकी ने उनके बारे में वह सब जान लिया होगा जो गांधी ख़ुद अपने बारे में नहीं जानते होंगे.

बताया जाता है कि माउंटबेटन ने गांधी से मिलने के लिए हर हफ़्ते के सोमवार का दिन निश्चित किया था. ऐसा इसलिए कि उस दिन गांधी का मौन दिवस होता था. दरअसल माउंटबेटन को लगता था कि गांधी से बात-बहस कर उन्हें बंटवारे के लिए मनाना बहुत मुश्किल होगा. उधर, गांधी भी कम होशियार नहीं थे. वे अपने साथ पुराने लिफ़ाफ़े रखते और माउंटबेटन के हर प्रश्न का उत्तर लिख कर देते. माउंटबेटन इस बात से इतने अभिभूत हुए कि ये लिफ़ाफे उन्होंने ताज़िंदगी संभाल कर रखे.

भारत में उन दिनों गृह युद्ध के हालात थे. माउंटबेटन को यह जल्द ही समझ में आ गया कि इनसे निपटने के लिए शीघ्र निर्णय लेना बेहद ज़रूरी है. उन्होंने एक सोची समझी रणनीति के तहत वायसराय की ज़िंदगी और कार्यशैली की चमक-धमक को दोबारा शुरू किया. इसके ज़रिये वे भारतीय नेताओं को विस्मृत करना चाहते थे जिससे बातचीत में उनका पलड़ा भारी रहता. दूसरी तरफ, वे एक सादा दिल इंसान भी नज़र आते. बिना किसी सुरक्षा के परिवार के साथ सुबह सैर पर जाना, नेहरू के निवास पर बिना किसी हिचक के भोज के लिए चले जाना और आम जनता से मिलने को उन्होंने आदत में शुमार किया. इस दोहरी रणनीति ने अपना असर दिखाया और वे पूर्व के वायसरायों से अलग नज़र आने लगे.

भारत रवाना होने से पहले माउंटबेटन ने क्लेमेंट एटली से ज़ोर देकर कहा था कि उनके कार्यकाल की तारीख निश्चित की जाए. एटली ने उन्हें 1948 की गर्मियों तक भारत में रहने की बात कही थी. माउंटबेटन दिन और महीना भी निश्चित करना चाहते थे. उन्होंने ने 30 जून 1948 को ‘ट्रांसफर ऑफ पॉवर’ की बात सुझाई जो मान ली गयी. हालांकि ‘फ़्रीडम एट मिडनाइट’ में ज़िक्र है कि लॉर्ड वावेल ने सबसे पहले यह बात कही थी. उनके मुताबिक़ 31 मार्च 1948 को ‘ट्रांसफर ऑफ पॉवर’ तय किया गया था.

मई 1947 को डिकी परिवार के साथ शिमला गए और जवाहर लाल नेहरू को अपने साथ ले गए. वहीं उन्होंने नेहरू को वह मसौदा दिखाया जिसे ब्रिटिश संसद मंज़ूर करने वाली थी. दरअसल, माउंटबेटन चाहते थे कि नेहरू इस प्लान को देख लें और अपने मुताबिक़ इसमें तब्दीली कर लें. नेहरू ने ऐसा ही किया. इंग्लैंड की सरकार ने जब इस पर मंजूरी दे दी तो तीन जून 1947 को माउंटबेटन ने यह प्लान पेश किया जिसे ‘माउंटबेटन प्लान’ भी कहते हैं. बताते हैं कि उन्होंने गांधी से कहा कि वे जैसा चाहते थे, लगभग वैसा ही है, बल्कि इसे ‘गांधी प्लान’ कहा जाए तो ज़्यादा मुफ़ीद रहेगा.

प्लान के तहत मुल्क के दो हिस्से होने थे. दोनों को डोमिनियन राज्य का दर्ज़ा दिया जाना था. बंगाल और पंजाब के टुकड़े किये जाने थे. राजे-रजवाड़ों को उनके स्वतंत्र रहने या विलय करने की छूट दी जानी थी. माउंटबेटन यहीं नहीं रुके. उन्होंने 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों द्वारा देश छोड़ने की बात कह कर सबको हैरत में डाल दिया.

तीसरे बिंदु पर माउंटबेटन बनने वाले इंडिया की तरफ झुक गए. आज़ादी से दो हफ्ते पहले उन्होंने ‘चैंबर ऑफ़ प्रिंसेज’ के राजाओं और नवाबों को संबोधित किया. रामचंद्र गुहा अपनी किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं कि वायसराय का यह हिंदुस्तान के लिए सबसे बड़ा योगदान था. माउंटबेटन ने वहां मौजूद राजाओं को चेतावनी दी कि अंग्रेज़ों के जाने के बाद रियासतदारों की हालत अब ‘बिना पतवार की नाव’ जैसी है और अगर उन्होंने भारत में विलय न किया तो इससे उपजी अराजकता के लिए वे ख़ुद ज़िम्मेदार होंगे. माउंटबेटन के शब्द थे, ‘आप अपने सबसे नज़दीक पड़ोसी यानी आज़ाद भारत से भाग नहीं सकेंगे और न ही लंदन की महारानी आपकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेंगी. बेहतर होगा कि आप आज़ाद होने का ख्व़ाब न देखें और हिंदुस्तान में विलय को स्वीकार करें.’ इस संबोधन का असर यह हुआ कि 15 अगस्त, 1947 आते-आते लगभग सारे राजाओं और नवाबों ने विलय की संधि पर दस्तख़त कर दिए.

15 अगस्त की तारीख चुनने के पीछे माउंटबेटन के पास एक कारण था. यह वह दिन था जब जापान ने मित्र राष्ट्र की सेना के आगे आत्मसमर्पण किया. ध्यान रहे कि अमेरिका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु हथियार गिराने से पहले माउंटबेटन की सरपरस्ती में लड़ने वाली मित्र देशों की सेना ने जापान को बर्मा की लड़ाई में हराया था. एक समर्पित फौज़ी अफ़सर की नज़र से देखें तो दो उसकी उपलब्धियों, बर्मा की लड़ाई में जीत और हिंदुस्तान की आजादी को एक साथ मिलाने का उसके पास इससे बेहतरीन मौका नहीं हो सकता था.

21 जून, 1948 को माउंटबेटन और एडविना इंग्लैंड चले गए. जैसा तय हुआ था, उन्हें ब्रिटिश नेवी का अफसर बनाया गया और 1956 वे इसके सबसे बड़े अफ़सर, एडमिरल ऑफ़ फ्लीट बनाये गए. इस तरह से इंग्लैंड के इतिहास में वे अकेले शख्स हैं जो वायसराय और एडमिरल ऑफ़ फ्लीट रहे.

27 अगस्त 1979 को आयरलैंड की आतंकवादी पार्टी आईआरए ने लुइस माउंटबेटन की नाव को बम से उड़ाकर उन्हें मार दिया था. एलेक्स वॉन तुन्जलेमन ‘इंडियन समर’ में लिखती हैं, ‘उनकी लाश पानी में उल्टी तैरती हुई मिली. कभी उन्होंने अपने दोस्तों से कहा था कि उनकी इच्छा है वे समुद्र में आख़िरी सांस लें.’