अटलजी के निधन के बाद उनके मित्र लालकृष्ण आडवाणी भी अब सियासत से संन्यास का मन बना रहे हैं. सुनी-सुनाई है कि उन्होंने अपने परिवार और करीबी दोस्तों को बता दिया है कि वे अगला लोक सभा चुनाव नहीं लड़ेंगे और पार्टी का प्रचार भी नहीं कर पाएंगे. भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को भी यह खबर अनौपचारिक तौर पर मिल चुकी है.
लालकृष्ण आडवाणी पिछले 20 साल से गुजरात की राजधानी गांधीनगर से सांसद हैं. साल 2014 में उन्हें भोपाल से चुनाव लड़ाने का प्रस्ताव मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भेजा था. जिस दिन भाजपा कार्यालय से गांधीनगर की लिस्ट आउट हुई, वह दिन भी बेहद नाटकीय था. आडवाणी की अनुपस्थिति में भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति ने गांधीनगर सीट से उनके टिकट की घोषणा कर दी थी. इस एकतरफा फैसले से वे इतने आहत हुए कि उस वक्त के अध्यक्ष राजनाथ सिंह से लेकर नरेंद्र मोदी, सुषमा स्वराज और नितिन गडकरी, सभी को लालकृष्ण आडवाणी के घर जाकर उन्हें मनाना पड़ा था. आखिरकार भाजपा कार्यालय ने बयान जारी किया और कहा कि वे अपने मन की सीट चुनने के लिए स्वतंत्र हैं. जब पार्टी झुकी तब जाकर आडवाणी गांधीनगर सीट से ही चुनाव लड़ने के लिए तैयार हुए थे.

उस वक्त की चुनाव समिति के एक सदस्य से बात करने पर बहुत कुछ पता चलता है. 2014 में भाजपा के कई नेता चाहते थे कि आडवाणी लोक सभा चुनाव न लड़ें. उस समय भाजपा और संघ के अंदर यह राय बन रही थी कि लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठतम नेताओं को राज्यसभा भेजा जाए और उनकी जगह नए लोगों को मौका मिले. अनौपचारिक तौर पर आडवाणी के पास यह संदेश भिजवाया गया था कि अगर वे राज्यसभा जाना चाहते हैं तो उनकी बेटी प्रतिभा आडवाणी को गांधीनगर से टिकट दिया जा सकता है. भाजपा और संघ के कुछ नेता इस प्रस्ताव से सहमत थे और कुछ इसके बिल्कुल विरोध में थे. लेकिन आडवाणी राज्य सभा जाने के लिए तैयार नहीं हुए.
2014 का वक्त आज से काफी अलग था. उस वक्त नरेंद्र मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार तो घोषित हो चुके थे, लेकिन दिल्ली के सारे समीकरण अभी उनके मुताबिक नहीं बैठे थे. अमित शाह भी तब भाजपा के सिर्फ महासचिव ही थे और पार्टी के अंदर उनकी हैसियत आज के मुकाबले कुछ भी नहीं थी. इसके साथ-साथ लालकृष्ण आडवाणी भी उस समय तक इतने कमजोर नहीं हुए थे. तब ऐसे नेताओं की कमी नहीं थी जो उन्हें अपना गुरु मानते थे. इसलिए 2014 में जैसा वे चाहते थे, हो गया. पर अब भाजपा में हालात बिल्कुल बदल गए हैं.
2014 में 11 अशोक रोड से चलने वाली भाजपा अब 6, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग से संचालित होती है. जिन पत्रकारों ने इन दोनों जगहों से रिपोर्टिंग की है उनमें से कुछ बताते हैं कि भवन का यह बदलाव ठीक वैसा ही है जैसा दल के अंदर हुआ है. 11 अशोक रोड एक ऐसी इमारत थी जहां कोई चाहकर भी कुछ नहीं छिपा सकता था. पार्टी अध्यक्ष से मिलने कौन आया और कितनी देर रुका यह बात वहां आसानी से पता चल जाती थी. लेकिन दीनदयाल उपाध्याय मार्ग से चलने वाली भाजपा एक बंद किताब है. यहां इतने दरवाजे और अलग तरीके से बनाए रास्ते हैं कि किसी के आने-जाने की खबर यहां बैठे पत्रकारों को भी नहीं मिल पाती.
पिछले कुछ दिनों से भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में एक-एक राज्य के हिसाब से अलग-अलग सीटों पर बात करने की प्रक्रिया चल रही है. जब बात गुजरात पर पहुंची तो गांधीनगर सीट पर बात फिर से फंस गई. सुनी-सुनाई है कि ठीक 2014 की तरह ही 2019 में भी गांधीनगर की सीट मीडिया में हेडलाइन बनेगी. इस पर भाजपा और संघ के नेता एक बार फिर बंटे हुए हैं. अब भी लालकृष्ण आडवाणी का आदर करने वाले और उनसे सहानुभूति रखने वाले भाजपा और संघ के कई नेता चाहते हैं कि अगर वे चुनाव नहीं लड़ना चाहते तो उनकी बेटी प्रतिभा आडवाणी को यहां से मौका दिया जाए. इनकी दलील है कि प्रतिभा ही आडवाणी के साथ रहती हैं, उनके साथ जाती हैं और वे ही कई सालों से गांधीनगर सीट की कमान संभालती रही हैं. हालांकि आडवाणी ने कभी प्रत्यक्ष तौर पर उन्हें अपना राजनैतिक उत्तराधिकारी नहीं बताया लेकिन यह सब मानते हैं कि प्रतिभा ही उनके सबसे ज्यादा करीब हैं.
लेकिन सुनी-सुनाई है कि अमित शाह के बेहद करीबी नेताओं के बीच चर्चा चल रही है कि गांधीनगर से खुद उन्हें चुनाव लड़ना चाहिए. अमित शाह ने अपनी ज्यादातर सियासत गांधीनगर से ही की है. हवाला प्रकरण की वजह से 1996 में जब लालकृष्ण आडवाणी की जगह अटल बिहारी वाजपेयी ने गांधीनगर से चुनाव लड़ा था. उस वक्त शाह ही उनके चुनाव इंचार्ज थे. गांधीनगर लोकसभा सीट के अंदर ही नारनपुरा विधानसभा सीट से वे विधायक भी रह चुके हैं. अमित शाह के करीबी नेता यह बात करते सुने जाते हैं कि अगर 2019 में मोदी सरकार बनी तो शाह भाजपा अध्यक्ष की कुर्सी छोड़कर सरकार में नंबर दो या तीन की हैसियत से शामिल होंगे. इसलिए देश की 543 लोक सभा सीटों में से एक उनके लिए चुनी जानी है और वह गांधीनगर हो सकती है.
फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर हमसे जुड़ें | सत्याग्रह एप डाउनलोड करें
Respond to this article with a post
Share your perspective on this article with a post on ScrollStack, and send it to your followers.