पिछले दिनों अमेरिका की अफगानिस्तान से जुड़ी रणनीति को लेकर एक ऐसी खबर आई जिसने दुनियाभर के जानकारों को चौंका दिया. खबर थी कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन से जुड़े अधिकारियों और तालिबान के बीच क़तर में एक बैठक हुई है, जो काफी सकारात्मक रही. इस खबर के आने के बाद तालिबान की ओर से इसकी पुष्टि भी की गयी.

यह खबर चौंकाने वाली इसलिए है क्योंकि अमेरिका हमेशा से यही कहता आ रहा था कि तालिबान एक आतंकी संगठन है और वह किसी आतंकी संगठन से सीधी बातचीत नहीं करेगा. उसका कहना था कि तालिबान को जो भी बातचीत करनी है अफगानिस्तान की सरकार से करे. उधर, तालिबान का कहना था कि वह किसी कठपुतली सरकार के साथ नहीं बल्कि अमेरिका से ही सीधी बात करेगा.

हालांकि, अफगानिस्तान पर नजर रखने वाले कुछ जानकार अमेरिका की नीति में अचानक आए इस बदलाव के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण बताते हैं.

डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति का असफल होना और तालिबान का मजबूत होना

डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बनने से पहले अफगानिस्तान में अमेरिकी नीति को लेकर ओबामा प्रशासन पर तीखे हमले किया करते थे. ट्रंप का कहना था कि जो गलती जॉर्ज डब्लू बुश ने की, वही ओबामा कर रहे हैं. उनका साफ़ कहना था कि सरकार को अमेरिकी करदाताओं का पैसा इस तरह बहाने की जरूरत नहीं है और अमेरिकी फौजों को तुरंत अफगानिस्तान से वापस बुलाया जाए

डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनाव के दौरान अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना को वापस बुलाने का वादा भी किया था. लेकिन, राष्ट्रपति बनने के बाद वे अपने इस वादे से पलट गए. तब उनका कहना था कि अमेरिकी सेना से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि अभी अफगानिस्तान में अमेरिकी मिशन चलने दिया जाए और अगर अमेरिका ज्यादा ताकत से लड़ता है तो नतीजा जल्द ही आ सकता है. यह बात कहते हुए ट्रंप ने अफगानिस्तान में 3000 और अमेरिकी सैनिक भेजने की घोषणा कर दी थी.

इसके तीन महीने बाद जनवरी 2018 में ट्रंप ने अफगानिस्तान को लेकर अपनी रणनीति पर दो टूक कहा था, ‘इस नीति को बदला नहीं जाएगा, हम तालिबान को खत्म करके ही वापस आएंगे.’ लेकिन, अब छह महीने बाद ही डोनाल्ड ट्रंप अपनी बात से पलटते दिख रहे हैं.

डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक नीति का अफगानिस्तान में उलटा असर दिखा है | फोटो : एएफपी
डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक नीति का अफगानिस्तान में उलटा असर दिखा है | फोटो : एएफपी

अमेरिकी जानकारों की मानें तो ऐसा इसलिए है कि अफगानिस्तान में डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति बुरी तरह असफल रही है. इनके अनुसार डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक नीति का अमेरिका को कोई फायदा नहीं हुआ, उलटे इसके बाद से तालिबान की ताकत में आश्चर्यजनक बढ़ोत्तरी हुई है. बताते हैं कि आतंकी संगठन ने पिछले करीब एक साल में अफगान-अमेरिकी फौजों को शिकस्त देते हुए अपना कब्जा तेजी से बढ़ाया है. जहां कई देश अफगानिस्तान के आधे से ज्यादा हिस्से पर तालिबान का कब्जा बताते हैं, वहीं पश्चिमी देशों की एजेंसियों ने भी माना है कि अब तालिबान का देश के करीब 40 फीसदी हिस्से पर दावा मजबूत है.

डोनाल्ड ट्रंप की नीति के बाद से युद्ध में मरने वालों की संख्या में भी रिकॉर्ड बढ़ोत्तरी हुई है. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक अफगानिस्तान में इस साल जनवरी से जून तक 1692 नागरिकों की युद्ध के दौरान मौत हुई है. संस्था के मुताबिक अफगानिस्तान में 2008 के बाद युद्ध में मरने वालों की यह संख्या सबसे ज्यादा है.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार बताते हैं कि पिछले एक साल में अफगानिस्तान में जिस तरह के परिणाम सामने आए हैं उन्हें देखते हुए डोनाल्ड ट्रंप और उनके अधिकारियों को अब यह समझ में आ गया है कि अफगानिस्तान का नतीजा बंदूक से नहीं निकलने वाला. ये जानकार यह भी कहते हैं कि अब अमेरिका किसी तरह अफगानिस्तान से निकलना चाहता है.

अमेरिकी थिंक टैंक ‘फाउंडेशन फॉर द डेमोक्रेसीज डिफेंस’ में अफगानिस्तान मामलों के विशेषज्ञ बिल रोगजीओ एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘अमेरिका को अब शायद समझ में आ गया है कि तालिबान से नहीं लड़ा जा सकता क्योंकि तालिबान अनिश्चित समय के लिए लड़ने की सोच चुका है.’ वे आगे कहते हैं, ‘17 साल के युद्ध के बाद अमेरिका थक चुका है. अब वह वहां से निकलना चाहता है. एक वही है जो चाहता है कि शांति के लिए वार्ता की जाए.’ रोगजीओ के मुताबिक तालिबान को देखकर अभी भी यह नहीं लगता कि वह वार्ता करने को उतावला है.

रूस की तालिबान से बढ़ती नजदीकियां

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार अमेरिका की रणनीति में बदलाव की एक और वजह रूस को मानते हैं. दरअसल, पिछले डेढ़ साल में रूस की तालिबान से नजदीकियां बढ़ी हैं, जिन्हें रूस ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी किया है. रूस इस समय न सिर्फ अफगानिस्तान में आईएस से लड़ने में तालिबान की मदद कर रहा है बल्कि, अफगानिस्तान में शांति के लिए पुरजोर प्रयास भी कर रहा है. अपने इन्हीं प्रयासों के तहत रूस ने अफगानिस्तान मुद्दे पर अगले महीने ‘सोची’ में होने वाली कई देशों की बैठक में तालिबान को भी आमंत्रित किया है.

नाटो सदस्य देश हर साल पांच अरब डॉलर केवल अफगान सेना को देते हैं, जबकि, अमेरिका अफगानिस्तान में हर साल 45 अरब डॉलर खर्च करता है | फोटो : एएफपी
नाटो सदस्य देश हर साल पांच अरब डॉलर केवल अफगान सेना को देते हैं, जबकि, अमेरिका अफगानिस्तान में हर साल 45 अरब डॉलर खर्च करता है | फोटो : एएफपी

बताते हैं कि रूस और तालिबान की बढ़ती नजदीकियों ने अमेरिका को कई तरह से मुश्किलों में डाल दिया है. एक तो अमेरिकी अधिकारियों को यह लगता है कि अगर रूस ने बातचीत के जरिए अफगानिस्तान जैसा बड़ा मसला हल करवा दिया तो रूस का कद बढ़ना और अमेरिका की किरकिरी होना स्वाभाविक है. और सबसे बड़ी बात कि यह अमेरिका की बादशाहत के लिए खतरा होगा.

पिछले एक साल में पश्चिमी देशों की एजेंसियों ने कई बार कहा है कि रूस तालिबान को अत्याधुनिक हथियार बेच रहा है जिससे तालिबान की ताकत बढ़ी है. जानकारों के मुताबिक ऐसे में अमेरिका को लगता है कि जिस तालिबान को वह 17 साल में नहीं हटा सका उसे रूस की मदद मिलने के बाद युद्ध में शिकस्त देना नामुमकिन हो जाएगा.

इसके अलावा अफगानिस्तान में अमेरिका के खिलाफ एक और बात भी जाती है. अभी तक अमेरिका के अफगानिस्तान के करीबी देश ईरान से ही संबंध खराब थे. लेकिन, पिछले कुछ समय से उसके संबंध पाकिस्तान और चीन से भी अच्छे नहीं चल रहे हैं. जबकि, इन तीनों के हित अफगानिस्तान से जुड़े हुए हैं. इस लिहाज से भी अब अमेरिका के लिए अफगानिस्तान की लड़ाई पहले जितनी आसान नहीं रह गई है.

अमेरिका अफगानिस्तान में अब और पैसा खर्च करने के मूड में नहीं

डोनाल्ड ट्रंप के रुख में आए बदलाव का एक और कारण भी बताया जा रहा है. इस समय अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो अफगानिस्तान एक ऐसी जगह है जहां अमेरिका सबसे ज्यादा पैसा खर्च कर रहा है. 17 साल में अमेरिका वहां 840 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम खर्च कर चुका है. अब अगर रूस के आने के बाद भी अमेरिका युद्ध जारी रखता है तो उसे बहुत ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ेगा. अमेरिकी मीडिया की मानें तो अफगानिस्तान और इराक युद्ध में खरबों डॉलर खर्च कर चुका अमेरिका अब ऐसा करने के मूड में नहीं है. बतौर राष्ट्रपति अमेरिका का पैसा बचाने में लगे डोनाल्ड ट्रंप तो बिलकुल भी ऐसा नहीं चाहेंगे.

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