(आगे कुछ स्पॉइलर्स हैं, अपनी समझ से आगे बढ़ें और पढ़ें)

नेटफ्लिक्स ने ‘घूल’ को एक हॉरर मिनी वेब सीरीज की तरह प्रचारित किया था. डराने की लगातार कोशिशें करने वाला ट्रेलर भी इसकी ताकीद करता था. लेकिन एक जॉनर होता है ‘पॉलिटिकल हॉरर’ फिल्मों का. बॉलीवुड ने शायद ही कभी इस जॉनर की कोई फिल्म बनाई है – इक्की-दुक्की बनाई भी हों तो अभी याद नहीं आ रहीं - लेकिन हॉलीवुड में फैंटसी और यथार्थ के मेल से बने इस जॉनर के चाहने वाले बहुत मिलते हैं.

इंडीपेंडेंट फिल्म ‘गेट आउट’ (2017) इस जॉनर की हाल-फिलहाल की सबसे कामयाब फिल्म मानी जाती है. इसका निर्माण करने वाले अमेरिकी ब्लमहाउस प्रोडक्शन्स ने ही ‘घूल’ का भी फैंटम फिल्म्स संग सह-निर्माण किया है. ‘गेट आउट’ में अफ्रीकी-अमेरिकी नायक की मदद लेकर सदियों की स्लेवरी और रंगभेद को राजनीतिक समझ वाला मॉडर्न ट्विस्ट दिया गया है और कहानी को हॉरर फिल्मों वाला पैरहन ओढ़ाया गया है.

इससे पहले 2013 से लेकर 2016 तक ‘द पर्ज’ नामक सीरीज की तीन घोर व्यावसायिक मसाला फिल्में ऐसी आईं जिनकी कहानी अजीब से एक-दिवसीय वार्षिक उत्सव के इर्द-गिर्द रची जाती हैं. इस उत्सव को लेकर भविष्य की तानाशाह अमेरिकी सरकार का कहना है कि इस आयोजन की वजह से ही अमेरिकी समाज में बेरोजगारी केवल एक प्रतिशत बची है और क्राइम तकरीबन खत्म हो चुका है. 12 घंटे के इस द पर्ज नामक उत्सव में हर नागरिक को हर तरह की तोड़-फोड़ करने की छूट होती है, वो कानून के दायरे से बाहर होते हैं, और चाहे तो जितने भी मर्डर कर लें, लेकिन सरकार कुछ नहीं कहती. यानी एक तानाशाह सरकार एक दिन की अराजकता के सहारे देश का उचित विकास होने का दावा करती है.

1968 में आई ‘नाइट ऑफ द लिविंग डेड’ वैसे तो जॉम्बी हॉरर फिल्म थी लेकिन उसी वर्ष 1968 में मार्टिन लूथर किंग की हत्या के बाद अमेरिकी समाज सिविल राइट्स मूवमेंट की कमजोर होती जा रही स्थिति से जूझ रहा था और कुछ साल पहले इस मूवमेंट के पैरोकार राष्ट्रपति कैनेडी की भी हत्या हो गई थी. यह सब इस कमर्शियल फिल्म का हिस्सा बना था और रंगभेद, वर्गभेद व असमानता के रूपक समीक्षकों से लेकर दर्शकों तक ने इस जॉम्बी फिल्म में खोज लिए थे.

यही कमाल डैनी बॉयल ने ब्रिटिश फिल्म ‘28 डेज लैटर’ (2002) में दिखाया और जॉम्बी व पोस्ट-एपोकलिप्टिक फिल्म होने के बावजूद नागरिकों के बीच भेदभाव करने वाली सरकार की राजनीति को दर्शकों ने फिल्म में आसानी से पकड़ा. रोमन पोलंस्की की उम्दा हॉरर फिल्म ‘रोजमैरीज बेबी’ (1968) को भी एक पॉलिटिकल हॉरर फिल्म माना जाता है क्योंकि यह बलात्कार और सहमति के सेक्स से जुड़ी मर्दवादी राजनीति पर प्रहार करती है (यह अलग बात है कि बाद में चलकर पोलंस्की खुद एक बच्ची से दुष्कर्म करने की वजह से दुनिया-भर में बदनाम हुए).

इनके अलावा वियतनाम युद्ध की बात करने वाली 1973 की ‘द क्रेजीज’, राष्ट्रपति रीगन के दौर के रेसिज्म और वर्गभेद की आलोचक ‘द पीपल अंडर द स्टेयर्स’ (1991), और अमेरिकी सरकार के दक्षिण कोरिया में लगातार बढ़ते दखल को समंदर से निकले एक विध्वंसक राक्षस का रूपक लेकर दर्शाती कोरियाई फिल्म ‘द होस्ट’ (2006) पॉलिटिकल हॉरर जॉनर की कुछ अन्य मुख्य फिल्में हैं.

इस जॉनर की तकरीबन सभी फिल्में दमनकारी सरकारों द्वारा शासित स्याह और जर्जर भविष्य में घटती हैं, जिन्हें अंग्रेजी में डिस्टोपियन (Dystopian) या/और पोस्ट-एपोकलिप्टिक फ्यूचर कहा जाता है. ‘घूल’ इसी पॉलिटिकल हॉरर जॉनर और ऐसे ही एक डिस्टोपियन भविष्य में घटने वाली तीन एपीसोड की मिनी सीरीज है.

इसकी कहानी हिंदुस्तान के किसी दिल्ली-मुंबई जैसे दिखने वाले शहर से शुरू होती है और घरों-इमारतों-गाड़ियों को देखकर समझ आता है कि यह स्याह भविष्य हमारे वर्तमान के बेहद करीब वाला कल है. इसी कल पर आज की राजनीति के ज्वलंत विषयों को लेकर निर्देशक पैट्रिक ग्राहम ने बेहद बेबाकी से एक हॉरर फिल्म को पॉलिटिकल बनाया है और रूपकों के पीछे छिपकर नहीं, बल्कि निडर होकर हमारे वक्त की सच्चाई पेश की है.

‘घूल’ की यही सबसे खास बात है कि हॉरर जैसे त्वरित तृप्ति देने वाले जॉनर की कहानी को उसने हमारे आज के यथार्थ में पिरोया है, और उस भयावह भविष्य की झलकियां दिखाईं हैं जो न कभी आए तो अच्छा.

अंध राष्ट्रवाद से लेकर एंटी-नेशनल होने तक, मुसलमानों से खुले आम नफरत करने तक, अशुद्ध देशद्रोहियों की ‘वापसी’ करवाने तक, बुद्धिजीवियों को आदर्श नागरिक बनवाने के लिए उनको टॉर्चर करने तक, किताबें-साहित्य जला देने तक, और यह कह देने तक कि इस देश ने दो-दो इमरजेंसी देख ली हैं, ‘घूल’ बेइंतहा निर्भीकता से भविष्य की टेक लेकर हमारे समय के राजनीतिक डिस्कोर्स की आलोचना कर लेती है. हमारे समय में शायद ही किसी भी कला क्षेत्र ने इतनी निर्भीकता दिखाई होगी जितनी हॉरर फिल्म होने का पहनावा ओढ़ कर नेटफ्लिक्स की यह मिनी वेब सीरीज दिखाती है.

हालांकि यह कहना भी जरूरी है कि स्याह भविष्य में ‘धर्म’ के आधार पर खड़ी हुई दमनकारी सरकार और उनकी उतनी ही दमनकारी नीतियों को दिखाने का जो तरीका ‘घूल’ ने इस्तेमाल किया है वो साफ तौर पर ‘द हैंडमेड्स टेल’ (2017) नामक मशहूर अमेरिकी सीरीज से प्रभावित लगता है. ‘एनिमल फॉर्म’ का भी प्रभाव नजर आता ही है. लेकिन क्रियान्वयन पूरी तरह स्वदेसी है और हमारे आज के यथार्थ में इस कदर रचा-बसा हुआ कि आप इसे सराहे बिना रह नहीं पाते. बारम्बार.

राधिका आप्टे द्वारा अभिनीत ‘घूल’ का मुख्य पात्र निदा रहीम कुछ-कुछ अनुभव सिन्हा की ‘मुल्क’ के पुलिस अफसर दानिश जावेद (रजत कपूर) का एक्सटेंशन लगता है. दोनों को ही इस्लामोफोबिया से पीड़ित देश में साबित करना है कि वे अच्छे देशभक्त मुसलमान हैं. निदा जिस तरह यह साबित करती है वही इस सीरीज की धुरी बनता है और कहानी को भावनात्मक तीव्रता भी देता है. निदा के पिता की भूमिका में एसएम जहीर बेहद मार्मिक अभिनय करते हैं और कभी-कभी देखते वक्त लगता है कि ‘मुल्क’ के ही मुराद अली मोहम्मद (ऋषि कपूर) को अगर धार्मिक उन्माद से जन्मे स्याह भविष्य में भेज दिया जाता तो क्या वे वही करते जो निदा के अब्बा करने पर मजबूर हुए. शायद!

राधिका आप्टे डर और हिम्मत के बीच में खड़े किरदार की इमोशनल रेंज कुशलता से पकड़ती हैं और एक अनजान जगह पर अनजान लोगों के बीच खुद को साबित करने की लड़ाई को बखूबी चेहरे के भावों से व्यक्त करती हैं. सीरीज का आखिरी शॉट तो कातिलाना है और उन्हें थोड़ा और ज्यादा नेटफ्लिक्स पर देखने की वजह भी बनने वाला है. हालांकि वे बातचीत और संवाद अदायगी ठीक उसी तरह करती हैं जैसे हम ‘सेक्रेड गेम्स’ में सुन चुके हैं और एक पारंपरिक मुसलमान परिवार से आने के बावजूद उनका लहजा कोई बदलाव धारण नहीं करता. यह बात तब और ज्यादा खटकती है जब कड़क इंटेरोगेशन अफसर बनी लक्ष्मी दास के रोल में रत्नाबली भट्टाचार्जी अपने लहजे पर बहुत काम करती हुई नजर आती हैं. अभिनय भी शानदार करती हैं और खुद को पुल्लिंग में सम्बोधित करती हैं! मानव कौल के हिस्से भी कुछ बढ़िया दृश्य आते हैं और शैतान अली सईद के रोल में महेश बलराज भी हॉरर का चेहरा बखूबी बनते हैं.

‘घूल’ लेकिन, राजनीतिक रूप से जितनी सचेत है उस स्तर का चित्त उसका हॉरर नहीं करता. बहुत कम जगहों पर डराने की कोशिशें सफल होती हैं और कभी-कभी बचकाने स्तर तक भी पहुंचती हैं. लेकिन रहस्य जानने की उत्सुकता आखिर तक आपके अंदर जगाए रखने में यह सीरीज कामयाब रहती है और इस लिहाज से कह सकते हैं कि हॉरर से ज्यादा मजबूत इसका थ्रिलर एलीमेंट है. सिर्फ एक सुघड़ हॉरर सीरीज की तरह ‘घूल’ को अगर देखेंगे तो शायद निराश भी हो सकते हैं.

इसे होना भी डेढ़ घंटे की एक फिल्म चाहिए था. बिल्ड-अप में यह समय बहुत ले लेती है - हालांकि वक्त आने पर तृप्त भरपूर करती है - लेकिन हर एपीसोड में वो उतार-चढ़ाव नहीं है, न ही क्लिफ हैंगर पर खत्म होने की वो काबिलियत है, जो कि अब अंतरराष्ट्रीय वेब सीरीज का ट्रेडमार्क ढांचा बन चुका है. नेटफ्लिक्स की ही दूसरी अभूतपूर्व देसी सीरीज ‘सेक्रेड गेम्स’ के एपीसोड्स से इसे कुछ सीखना था, क्योंकि तब यह अफसानानिगारी में भी अव्वल आती. थोड़ी कमतर न रह जाती.