पुणे पुलिस ने मंगलवार को देश के छह शहरों में छापामारी करते हुए पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था. यह कार्रवाई भीमा कोरेगांव हिंसा की जांच से संबंधित थी. कई मीडिया संस्थानों और न्यूज चैनलों ने यह भी दावा किया कि ये गिरफ्तारियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या के संबंध में की गई हैं.

सवाल उठता है कि क्या इन गिरफ्तारियों को प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश से जोड़ा जा सकता है. सत्याग्रह की सहयोगी वेबसाइट स्क्रोल.इन को सामाजिक कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज और स्टेन स्वामी के यहां हुई छापामारी के पंचनामे के साथ-साथ पुणे पुलिस द्वारा रांची पुलिस को भेजी गई एक चिट्ठी और सामाजिक कार्यकर्ता वी गोंजाल्विस के खिलाफ जारी सर्च वारंट की प्रति मिली है. ये तीनों उन पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं में शामिल हैं जिनकी मंगलवार को देश के अलग-अलग हिस्सों से गिरफ्तारी हुई है. स्क्रोल को मिले सभी दस्तावेज बताते हैं कि मंगलवार को हुई कार्रवाई का नरेंद्र मोदी की हत्या से कोई संबंध नहीं है. इनमें केवल केस नंबर 04/2018 का जिक्र है जो भीमा कोरेगांव हिंसा की जांच से जुड़ा है.

आरोप

छापामारी का पंचनामा इस मायने में दिलचस्प है कि सुधा भारद्वाज और स्टेन स्वामी पर आईपीसी और गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून की एक जैसी धाराएं लगाई गई हैं. इससे संकेत मिलता है कि बाकी सामाजिक कार्यकर्ताओं के मामले में भी ऐसा ही हो सकता है. सुधा भारद्वाज और स्टेन पर 2012 में संशोधित गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून की धारा 13, 6, 17, 18(बी), 20, 38, 39 और 40 लगाई गई है. धारा 13 कहती है कि जो भी गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल पाया जाएगा उसे पांच से सात साल तक जेल हो सकती है. दूसरी धाराएं और भी गंभीर अपराधों जैसे आतंकवाद से संबंधित हैं जिनके तहत पांच साल से लेकर उम्रकैद और फांसी तक की सजा हो सकती है.

पुणे पुलिस ने मंगलवार को देश के दस सामाजिक कार्यकर्ताओं के घरों में छापामारी कर पांच कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था. उसने हरियाणा के फरीदाबाद से सुधा भारद्वाज, मुंबई से वी गोंजाल्विस और अरुण फरेरा, हैदराबाद से वरवरा राव और दिल्ली से गौतम नौलखा को हिरासत में लिया था. स्टेन स्वामी को गिरफ्तार नहीं किया गया था. बाकी लोगों को पुणे की उसी जेल में भेजा जाएगा जहां भीमा कोरेगांव हिंसा के पांच आरोपित पहले से हैं. बीती जून में पुलिस ने महाराष्ट्र और दिल्ली से इन पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों को गिरफ्तार किया था. इन सभी पर भीमा कोरेगांव में हिंसा भड़काने का आरोप है.

भीमा कोरेगांव में क्या हुआ था?

1818 में महार जाति के सैनिकों की एक छोटी सी टुकड़ी ने पेशवा द्वितीय की बड़ी सेना को परास्त कर दिया था. उन सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए लाखों दलित हर साल एक जनवरी के दिन भीमा कोरेगांव आते हैं. इस साल उस विजय की 200वीं वर्षगांठ थी. हमेशा की तरह एक जनवरी के दिन लाखों दलित भीमा कोरेगांव पहुंचे थे. लेकिन श्रद्धांजलि स्थल पर जाते समय वहां हिंसा भड़क उठी थी. इसके पीछे कुछ हिंदू नेताओं के नाम सामने आए थे. इनमें संभाजी भिड़े नाम के एक नेता का नाम भी शामिल था जिन्हें राज्य सरकार क्लीन चिट दे चुकी है.

पहले कहा जा रहा था कि इस हिंसा से कुछ दिन पहले कुछ हिंदुत्ववादी नेताओं ने भड़काऊ भाषण दिए थे. बाद में पुणे पुलिस ने कहा कि यह हिंसा इन नेताओं के भड़काऊ भाषणों की वजह से नहीं हुई थी. इसके बजाय एक दूसरा पक्ष सामने आया जिसके मुताबिक भीमा कोरेगांव में आयोजित कार्यक्रम से एक दिन पहले कुछ कथित माओवादी नेताओं की एक बैठक हुई थी. बताया गया कि पुणे में हुई उस बैठक में दिए गए भड़काऊ भाषणों की वजह से एक जनवरी को हिंसा हुई थी. बाद में जून में पांच कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया. उनमें से एक के लैपटॉप से एक पत्र मिलने की खबर आई जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कथित हत्या का जिक्र था. पत्र के हवाले से दावा किया गया कि गिरफ्तार कार्यकर्ता माओवादी संगठनों के संपर्क में थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रच रहे थे. तब इस पूरे मामले से जुड़ी चर्चा प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश पर केंद्रित हो गई थी.

हालांकि विपक्षी दलों के नेताओं ने पत्र को खारिज कर दिया था. उन्होंने आरोप लगाया कि नरेंद्र मोदी के प्रति सहानुभूति पैदा करने के लिए पत्र की कहानी गढ़ी गई है. वहीं, एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक जून में आरोपितों की जमानत की सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने सेशन कोर्ट में पत्र को पढ़ा था लेकिन, उसे आधिकारिक तौर पर अदालत में जमा नहीं कराया.