पाटीदार आरक्षण आंदोलन के प्रमुख नेता हार्दिक पटेल ने बीते बुधवार को अपना अनिश्चितकालीन अनशन तोड़ दिया. वे 25 अगस्त से अनशन पर बैठे थे. हार्दिक ने इस बार पाटीदार समुदाय को आरक्षण का लाभ देने के साथ किसानों की कर्ज़ माफी के मुद्दे को भी अपनी प्रमुख मांगों में शामिल किया था. लेकिन सरकार की तरफ से उन्हें कोई आश्वासन नहीं मिला. इससे पहले हार्दिक ने 25 अगस्त को पाटीदार आंदोलन के तीन वर्ष पूरे होने पर प्रशासन और राज्य सरकार से अहमदाबाद में भूख हड़ताल के लिए इजाजत मांगी थी जिसके न मिलने पर उन्होंने अहमदाबाद स्थित अपने घर से ही यह अनशन शुरु कर दिया. इससे पहले उन्होंने गांधीनगर कलक्टर से भी सत्याग्रह छावनी एरिया में भूख हड़ताल करने के लिए अनुमति चाही थी जो उन्हें नहीं मिली.

हार्दिक के 18 दिन के अनशन के दौरान देश और प्रदेश की राजनीति के कई दिग्गज उनसे मिलने पहुंचे थे. मीडिया ने भी इस पूरे प्रकरण को ठीक-ठाक कवर किया. लेकिन कुछ नदारद था तो वह थी लोगों की भीड़ जो पिछले तीन साल में लाखों की संख्या से घटकर कुछ सौ तक सिमट गई थी. इसके पीछे हार्दिक ने दलील दी कि प्रशासन की सख़्ती के चलते उनके समर्थक उन तक नहीं पहुंच पाए.

लेकिन गुजरात के कई राजनीतिकार इस तर्क से सहमत नहीं दिखते. उनके अनुसार पिछले तीन साल में न तो गुजरात की सरकार बदली है और न ही वहां का प्रशासन. ऐसे में विश्लेषकों का कहना है कि सरकार ही नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट तक की आंख में आंख डालकर चुनौती देने वाले हार्दिक अपनी दलीलों की आड़ में यह छिपाने की कोशिश कर रहे थे कि उन्हें मिलने वाला अपार जनसमर्थन अब खिसक चुका है.

क्या कारण है कि हार्दिक पटेल के इर्द-गिर्द अब वह अपार जनसमूह नहीं दिखता जिसकी चर्चा देश-दुनिया में होती थी? इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने गुजरात के पत्रकारों और राजनीतिकारों से चर्चा की. उन सभी की बातों का लब्बोलुआब यह था कि हार्दिक अपनी जबरदस्त राजनैतिक और आर्थिक महत्वाकांक्षाओं की वजह से खुद को खासा असुरक्षित महसूस करते हैं. हार्दिक को करीब से जानने वालों का यह भी कहना है कि उन्हें अपने साथियों से ज्यादा राय-मशविरा करना भी पसंद नहीं. वे सिर्फ वही करते हैं जो उन्हें ठीक लगता है.

शुरुआत से ही पाटीदार आंदोलन पर नज़र बनाए हुए एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘इन तमाम कारणों के चलते ही तीन साल में एक-एक कर के हार्दिक पटेल के वे तमाम साथी उनसे दूर होते चले गए जिन्होंने उनके कंधे से कंधे मिलाकर इस आंदोलन को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई थी.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘इस आपसी फूट का ही नतीजा है कि आज पाटीदार समुदाय का बहुत बड़ा हिस्सा हार्दिक पर भरोसा कर अपने घरों से बाहर निकलने को तैयार नहीं हुआ.’

इस बारे में हमने लगभग उन सभी नेताओं से भी बात करने की कोशिश की जो कभी हार्दिक के बेहद करीब हुआ करते थे. गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी से जुड़ने वाले वरुण पटेल बताते हैं, ‘शुरुआत में यह लड़ाई नाम की नहीं थी बल्कि आरक्षण के लिए थी. चूंकि हार्दिक सभी से छोटा था तो किसी को उससे कोई आपत्ति नहीं हुई.’ वरुण आगे कहते हैं, ‘स्थिती तब ख़राब हुई जब हार्दिक के साथ दिनेश भाई बांभनिया, केतन भाई पटेल और चिराग भाई पटेल राजद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार हुए. एक तरफ जहां उन तीनों के घर वाले गुजर-बसर के लिए परेशान हो रहे थे तो दूसरी तरफ हम लोग जैसे-तैसे आंदोलन को जीवित रखने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन इसी बीच हार्दिक के परिवार वालों ने गरीबी और वकील की फीस का हवाला देकर समाज से चंदा इकट्ठा करना शुरु कर दिया.’

वरुण के मुताबिक जेल में हार्दिक को यह डर महसूस होने लगा कि बाहर आंदोलन चला रहे लोगों का कद कहीं उनसे ज्यादा बड़ा न हो जाए. यहीं से वर्चस्व की लड़ाई शुरू होने लगी. वरुण कहते हैं, ‘जेल से बाहर आते ही हार्दिक ने सबसे पहले उन तीन साथियों का पत्ता काटा जो उसके साथ जेल में रहे थे. उन्हें जमानत मिलने पर हार्दिक ने आरोप लगाया कि उन्होंने सरकार के साथ सांठ-गांठ कर ली थी. इस पूरे आंदोलन में सबसे बुरी स्थिति तब हुई जब कांग्रेस घुसी. उसने गंदगी को कीचड़ बना दिया. कांग्रेस ने हम सभी नेताओं से संपर्क किया था. लेकिन जब कोई नहीं टूटा तो उन्होंने हार्दिक को आर्थिक मदद देनी शुरु की. पहले अप्रत्यक्ष और फिर प्रत्यक्ष. इसी दौरान हार्दिक को विधायकी के टिकट बेचने का भी उपाय सूझा. महीसागर ऐसी ही एक सीट थी जिस पर रुपए लेकर एक गैर पाटीदार को टिकट दिया गया. इस तरह करीब पच्चीस-तीस सीटों के टिकट बेचे गए.’

वरुण आगे जोड़ते हैं, ‘जानबूझकर किसी भी प्रमुख आंदोलनकारी को टिकट नहीं दिया गया. क्योंकि एक तो हम में से कोई उसे फूटी कौड़ी नहीं देता और दूसरे चुनाव जीत जाने के बाद हमारा राजनैतिक तौर कद हार्दिक से बड़ा हो जाता जो उसे कभी बर्दाश्त नहीं था.’

कांग्रेस से जुड़े चुके अतुल पटेल का भी कुछ-कुछ यही कहना है. वे कहते हैं कि आंदोलन की ताकत उसकी एकता थी और गुजरात में चाहे जिस पार्टी की सरकार बनती उसे पाटीदारों के आगे झुकना पड़ता. लेकिन आपसी विवाद के चलते हमारा आंदोलन बिखर गया. अतुल पटेल कहते हैं, ‘हम सभी की अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाएं थीं. किसी को शोहरत चाहिए थी, किसी को नाम चाहिए था, किसी को विधानसभा का टिकट चाहिए था. लेकिन सभी के लिए समाज सबसे पहले था. जबकि हार्दिक के मामले में ऐसा नहीं था. जिन लोगों ने अपनी रोजी-रोटी और बीवी-बच्चों को छोड़कर तीन अहम साल आंदोलन को दिए हार्दिक ने उन्हें बीच रास्ते में छोड़ दिया.’ आंदोलन से जुड़ने से पहले अतुल पटेल पेशे से इंजीनियर थे.

अतुल का कहना है कि पाटीदार आंदोलन तब तक एकजुट रहा जब तक कि हार्दिक जेल में थे. लेकिन उन्होंने बाहर आते ही राजनीति चालू कर दी. उनके मुताबिक हार्दिक ने खुद पर उंगली उठाने वाले लोगों को समाज का गद्दार साबित कर दिया. अतुल पटेल की मानें तो 2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के चुनाव न जीतने के पीछे पाटीदार आरक्षण आंदोलन की टीम का टूटना प्रमुख कारण था जिसके एकमात्र जिम्मेदार हार्दिक पटेल थे. उनके शब्दों में ‘चुनाव से पहले उनकी जो सेक्स सीडी और पैसे लेने के वीडियो सामने आए उसने हम जैसे आंदोलनकारियों का मनोबल पूरी तरह तोड़ दिया.’

पाटीदार आरक्षण आंदोलन की प्रमुख महिला नेता रेशमा पटेल का भी यही कहना है कि हार्दिक पटेल की आत्मकेंद्रीयता ने आंदोलन को भारी नुकसान पहुंचाया. वे बताती हैं, ‘25 अगस्त 2015 की रैली में मैं भीड़ में शामिल थी. लेकिन उसके बाद मुझे महसूस हुआ कि समाज के गरीब बच्चों के भविष्य के लिए लड़ी जा रही उस मुहिम में महिलाओं की भागीदारी बेहद ज़रूरी थी. तब नौकरी छोड़कर मैं इस आंदोलन से जुड़ी. लेकिन तब इस बात का अंदाज तक नहीं था कि हमारा ही एक साथी इस पूरी कवायद को मिट्टी में मिला देगा.’

रेशमा आगे कहती हैं, ‘हार्दिक समेत तीन साथियों को जेल में डालने के विरोध में हमने 21 दिन तक अनशन किया था. जो लोग बाहर थे यदि वे चाहते तो समाज हार्दिक को कब का भूल जाता. लेकिन यह हमारी नैतिकता थी कि अपनी किसी भी रैली से हमने हार्दिक के नाम को गायब नहीं होने दिया. इस दौरान गुजरात में जितने भी कॉर्पोरेट, नगरपालिका या परिषद के चुनाव हुए उनमें हम भाजपा को हराने में सफल रहे. लेकिन जैसे ही हार्दिक छूट कर बाहर आए आंदोलन की दिशा और दशा में बदलाव की शुरुआत हो गयी.’

रेशमा का आरोप है कि बाद में हार्दिक अहंकारी हो गए. वे कहती हैं, ‘हार्दिक भूल गए कि उनके जेल जाने के बाद हम ही लोगों ने आंदोलन में उनके नाम को जिंदा रखा था. ऐसे कई मौके आए जब लगा कि हार्दिक का खुलकर विरोध किया जाना चाहिए था. लेकिन समाज की अपेक्षाओं ने हर बार ऐसा करने से रोक दिया.’ वे यह भी आरोप लगाती हैं कि हार्दिक बैठकों में महिलाओं को स्थान नहीं देते थे.

रेशमा कहती हैं, ‘जब हार्दिक का पैसा लेते हुए वीडियो सामने आया तो हमने उनका जमकर बचाव किया क्योंकि यह अहसास हो गया था कि यदि हमारा नेता भ्रष्ट साबित हो गया तो समाज का मनोबल टूट जाएगा. लेकिन हार्दिक ने किसी का लिहाज़ नहीं रखा. शहीद पाटीदारों परिजनों की मदद करने की बजाय वे अपनी जेब भरते रहे.’ रेशमा आगे कहती हैं कि सार्वजनिक मंच से अपने स्वतंत्र विचार रखने की वजह से हार्दिक ने वक्ताओं की सूची से उनका नाम हटवाना शुरू कर दिया. वे बताती हैं, ‘दूसरे आंदोलनकारियों की तरह मैं भी खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगी थी. एक-एक कर के हमसे सब कुछ छिनता गया. यह हाल तो सार्वजनिक तौर पर थे. अकेले में तो स्थिति और बदतर थी. अपनी बात न मानने पर हमें धमकियां तक देने लगे थे. इसके बाद मजबूरन मुझे हार्दिक पटेल का साथ छोड़ना पड़ा.’ वरुण पटेल के साथ भाजपा से जुड़ने वाले नेताओं में रेशमा भी शामिल थीं.

गुजरात विधानसभा चुनावों के बाद हार्दिक से अलग हुए दिलीप साबवा कहते हैं कि यह आंदोलन व्यक्ति आधारित नहीं बल्कि समाज आधारित था. लेकिन बाद में इसकी शक्ल बदल गई. तंज कसते हुए दिलीप साबवा कहते हैं कि गुजरात ही नहीं बल्कि पूरे देश में जब-जब ऐसे व्यक्ति आधारित आंदोलन चले उनका नतीजा ऐसा ही निकला. साबवा के शब्दों में ‘बाबा रामदेव का उदहारण इस मामले में सबसे सटीक है. उनके आंदोलन के सभी मुद्दे गौण होते चले गए और वे खुद अरबपति.’

पाटीदार आंदोलन से जुड़ने से पहले पेशे से सरकारी अध्यापक रह चुके साबवा कहते हैं कि हार्दिक से अलग होने के बाद भी उन्होंने आरक्षण आंदोलन को ज़ारी रखा है. वे कहते हैं,’ पिछले आंदोलन से सबक लेकर हमने किसी एक आदमी को आगे न करते हुए एक समिति का गठन किया है जिसका हर एक फैसला सभी सदस्यों की राय-मशवरा कर के ही लिया जाता है.’ बीते दिनों साबवा ने 24 जून से 28 जुलाई तक आरक्षण आंदोलन में मारे गए चौदह लोगों की याद में शहीद रैली भी की है.

राजद्रोह के आरोप में हार्दिक पटेल के साथ जेल गए दिनेश बांभनिया का कहना है कि पाटीदार आरक्षण आंदोलन की शुरुआत में ही सभी ने तय कर लिया था कि वे किसी भी राजनैतिक दल को समर्थन नहीं देंगे. वे कहते हैं, ‘25 अगस्त 2015 को हमारी रैली में जब पुलिस ने लाठीचार्ज कर गोलियां चलाईं हमने तभी भाजपा को सत्ता से बाहर करने की ठान ली थी. लेकिन हार्दिक का व्यवहार हमारी एकता पर हावी रहा. रही-सही कसर (विधायक) टिकट बंटवारे ने कर दी.’

बांभनिया का आरोप है कि कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में वायदे के बावजूद पाटीदार आंदोलन का ज़िक्र नहीं किया. उनके शब्दों में ‘हमें खुद के इस्तेमाल हुए जाने की आशंका हुई तो हमने तुरंत हार्दिक को चेताया. लेकिन यह कवायद बेनतीजा रही. समाज के हितों के प्रति उसका रवैया देखकर चुनाव से तीन दिन पहले मैंने उससे नाता तोड़ दिया. हम भाजपा के खिलाफ ज़रूर हैं. लेकिन कांग्रेस के भी साथ नहीं है.’

बंभानिया का कहना है कि कुछ पुराने साथियों के कहने पर वे फिर से हार्दिक के साथ जुड़े हैं. लेकिन साथ ही वे यह भी याद दिलाना नहीं भूलते कि किसी सामाजिक आंदोलन के नेता की आपत्तिजनक सीडी सामने आने से उस समाज का नैतिक बल खत्म हो जाता है. बांभनिया की मानें तो पिछले तीन वर्षों में हार्दिक के रहन-सहन के स्तर में जमीन-आसमान का स्तर आ गया है. वे कहते हैं, ‘जिस कांग्रेस ने करीब तीन दशक पहले पाटीदार समाज की बेइज्जती की थी बिना वजह उससे नजदीकियां बढ़ाने की वजह से हमारे बुजुर्ग बेहद नाराज़ हैं.’

राजद्रोह के आरोप में जेल जाने वाले तीसरे आंदोलनकारी और हार्दिक के ही गांव से ताल्लुक रखने वाले चिराग पटेल का कहना है कि तीन साल पहले जो आंदोलन हुआ था वह समाज का आंदोलन था. वे कहते हैं, ‘हमें तो सिर्फ उसका आह्वान करने का मौका मिला था. लेकिन आज जो आंदोलन चल रहा है वह सिर्फ हार्दिक पटेल का है.’ चिराग भी वरुण पटेल की तरह हार्दिक पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने जेल से ही बड़ी रकम इकठ्ठा करना शुरु कर दिया था. चिराग के शब्दों में ‘जब हमने खुला पत्र लिखकर उसे चेताया तो उसने तानाशाही रवैया दिखाते हुए हमें पाटीदार आरक्षण आंदोलन समिति से ही बाहर कर दिया. वह अच्छे-भले सामाजिक आंदोलन को एक व्यवसायिक संस्था की तरह चलाने लगा.’

केतन पटेल जो कि इन तीनों के साथ जेल जाने वाले चौथे आंदोलनकारी थे, नाराजगी भरे लहजे में कहते हैं कि पूरा आंदोलन अकेले हार्दिक की महत्वाकांक्षाओं की बलि चढ़ गया. वे कहते हैं, ‘उसने सभी साथियों के मना करने के बावजूद बार-बार अकेले कांग्रेस के तमाम नेताओं से मुलाकात की. चूंकि वह जानता था कि हम लोगों के होते हुए वह किसी राजनैतिक संगठन से पैसा नहीं ले सकता इसलिए उसने सबसे पहले हमें ही आंदोलन से बाहर कर दिया.’ केतन का कहना है कि यदि हार्दिक का व्यक्तित्व असुरक्षित और अंहकारी न होता तो आज पाटीदार अपने लक्ष्य में सफल हो चुके होते.

गुजरात के सियासी गलियारों में कयास लगाए जा रहे हैं कि राजनीति में खुद को स्थापित करने के लिए हार्दिक जल्द ही कोई चुनाव लड़ सकते हैं. खुद हार्दिक भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुके हैं. लेकिन इस बात की भी पूरी संभावना है कि वह गुजरात की किसी ऐसी सीट पर ही दांव लगाना चाहेंगे जहां ख़तरा कुछ कम हो. चुनाव में हार्दिक की जीत की प्रबल संभावनाओं में भी कोई दो राय नहीं. लेकिन यहां देखने वाली बात यह है कि जिन हार्दिक पटेल के एक इशारे पर पूरा गुजरात ठहर सा जाता था, पिछले 18 दिन के दौरान कई बार उनकी स्थिति गंभीर होने की ख़बरें आने के बावजूद सूबे में कोई बड़ी हलचल देखने को नहीं मिली. यह बात गुजरात में हार्दिक पटेल के तिलिस्म के ख़त्म होने से जुड़े कयासों को पुष्ट करती है.

गुजरात विधानसभा चुनाव में हार्दिक के कांग्रेस से मिल जाने पर एक भाजपा नेता ने कहा था, ‘अगर हार्दिक अपने दम पर चुनाव लड़ता, कांग्रेस से हाथ न मिलाता तो हमारी नींद उड़ा देता. अब चिंता की बात नहीं है. उसने आखिर साबित कर ही दिया कि 24 बरस की उम्र में कोई पका हुआ नेता नहीं बन सकता. जब तक वो सीखेगा तब तक काफी देर हो चुकी होगी.’