बिहार में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के मुखिया उपेंद्र कुशवाहा के एक बयान ने पटना से लेकर दिल्ली तक की सियासत में हलचल मचा दी. कुशवाहा ने सिर्फ इतना कहा था कि अगर यदुवंश का दूध और कुशवंशियों का चावल मिल जाए तो खीर स्वादिष्ट बनेगी. कुछ वरिष्ठ पत्रकारों ने उनके इस बयान की वजह से बिहार में एनडीए के टूटने की भविष्यवाणी तक कर दी. बाद में भाजपा के दवाब के बाद उन्हें सफाई देनी पड़ी और मामला फिलहाल खत्म हो गया है.

लेकिन जब बिहार के एक वरिष्ठ सांसद से पूछा गया कि क्या सच में उपेंद्र कुशवाहा एनडीए की नाव छोड़कर राष्ट्रीय जनता दल के साथ जाने वाले हैं, तो उनका जवाब गौर करने लायक था. उन्होंने पलटकर कहा, ‘कुशवाहा से नहीं रामविलास पासवान से फर्क पड़ता है. अपने सियासी करियर में पासवान ही ऐसे नेता हैं जिन्हें मौसम वैज्ञानिक कहा जाता है. अगर 2019 से पहले रामविलास ने पाला बदला तो हवा का रुख बदल सकता है.’

रामविलास पासवान को ‘मौसम वैज्ञानिक’ का नाम उनके सबसे पुराने विरोधी और दोस्त से दुश्मन बने लालू यादव ने दिया था. पिछले छह महीने में पासवान ने कई बार नरेंद्र मोदी और अमित शाह को अपने बयानों से हैरान-परेशान कर दिया है. जब उत्तर प्रदेश में गोरखपुर और फूलपुर का उपचुनाव भाजपा हारी तो रामविसाल पासवान ने भाजपा नेतृत्व को सोचने के लिए कहा. मार्च महीने में तो उन्होंने भूचाल ही ला दिया जब कहा कि मिल-जुलकर कैसे रहा जाता है इसे कांग्रेस से सीखा जाना चाहिए. इसके बाद उन्होंने एक ताना और मारते हुए कह दिया कि सिर्फ ‘सबका साथ, सबका विकास’ जुमला देने से काम नहीं चलेगा ऐसा करके भी दिखाना होगा.

बिहार के एक वरिष्ठ भाजपा नेता से जब पत्रकारों ने रामविलास पासवान के बदलते रुख के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने कहा, ‘पांच-छह महीने पहले पासवान नाराज़ थे, लेकिन अब मामला संभल गया है. फिलहाल ठीक हैं, वे हमारे साथ हैं, लेकिन अगले छह महीने में वे क्या करेंगे या कहेंगे ये सिर्फ वही जानते हैं.’

रामविलास पासवान ने अपनी सियासत की शुरुआत साल 1969 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से की थी. वह पहला साल था जब उत्तर भारत में कांग्रेस विरोध का बीज फूटा थ और सिर्फ 25 साल के पासवान हवा के रुख को भांपकर पहली बार में ही विधानसभा पहुंच गए. इसके बाद जब इंदिरा गांधी के खिलाफ माहौल बनने लगा तो वे जयप्रकाश नारायण और राजनारायण के बेहद करीब आए और 1977 में रिकॉर्ड वोटों से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे. इसके बाद 1980, 1989, 1996 1998, 1999, 2004 और 2014 में वे लोकसभा चुनाव जीते.

पचास साल के अपने सियासी करियर में रामविलास पासवान से सिर्फ एक बार हवा का रुख भांपने में चूक हुई. उन्होंने 2009 में लालू यादव के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और हाजीपुर की अपनी सीट हार गए. लेकिन तुरंत ही उन्होंने अपनी गलती को सुधार लिया. लालू यादव और कांग्रेस ने मिलकर उन्हें राज्यसभा भेज दिया था फिर भी 2014 के चुनाव से पहले उन्होंने नरेंद्र मोदी की भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया.

2002 में भी, जब किसी को अंदाज़ा नहीं था कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा अगला लोकसभा चुनाव हार भी सकती है, तब रामविलास पासवान ने नरेंद्र मोदी और 2002 के गुजरात दंगों को मुद्दा बनाकर भाजपा का साथ छोड़ दिया. इसके बाद 2004 का चुनाव भाजपा हार गई और पासवान मनमोहन सरकार में मंत्री बन गये. 2014 में पासवान एनडीए के साथ जाने में थोड़ा हिचकिचा रहे थे. लेकिन भाजपा ने पहले उनके बेटे चिराग पासवान को मनाया और फिर बेटे ने पापा को. अब एक बार फिर वे अपने मन की बात किसी को नहीं बता रहे हैं.

इस वक्त रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के लोक सभा में छह सांसद हैं. बिहार में गठबंधन का गणित फंसा हुआ है और भाजपा चाहती है कि वे अपने दो सिंटिंग सांसदों के या तो टिकट काटें या फिर उन्हें नीतीश कुमार की पार्टी में एडजस्ट करें ताकि जनता दल यूनाइटेड को कम से कम 12 और ज्यादा से ज्यादा 15 सीटें दी जा सके. पासवान और चिराग के एक करीबी नेता बताते हैं कि यह सौदा पासवान परिवार को ज्यादा पसंद नहीं आ रहा. उसमें यह राय बन रही है कि अब रामविलास पासवान की तबीयत ठीक नहीं रहती और अगले चुनाव में जो होगा उसका असर सीधे चिराग के सियासी करियर पर पड़ेगा.

बिहार की सियासी जमीन और रामविलास पासवान के महत्व को समझने वाले भाजपा के एक सूत्र बताते हैं कि रामविलास पासवान के पास अपनी जाति का करीब पांच फीसदी वोट गारंटी का है. वे जहां जाएंगे यह पांच फीसदी वोट उधर ही चल देगा. और सवाल सिर्फ इन पांच फीसदी वोटों का भी नहीं है. अमित शाह और नीतीश कुमार इस बार बिहार में ठीक 2009 जैसा फॉर्मूला लागू करना चाहते हैं. तब यादव और मुसलमानों को छोड़कर सभी लगभग सभी समुदायों ने नीतीश कुमार और भाजपा को वोट दिया था.

बिहार के ये पुराने नेता अपने अंदाज़ में कहते हैं कि बिहार में इस बार उम्मीदवारों का फैसला पचपनिया जाति करेगी. पचपनिया यानी वह जाति जिसका मिक्सड वोट है. इसी के नेता नीतीश कुमार हैं क्योंकि इस मिश्रित जाति का कोई और नेता आज तक उभर कर सामने नहीं आ सका है. नीतीश कुमार का अपना फॉर्मूला है, लालू-कांग्रेस के यादव-मुस्लिम गठबंधन को धवस्त करने के लिए उन्हें अगड़ी जाति, यादव छोड़कर बाकी पिछड़ी जाति और दलित के साथ-साथ महादलित, सबका वोट चाहिए. इसी दलित फैक्टर के लिए रामविलास पासवान बेहद अहम हैं. वे अगर इधर से उधर हुए तो पांच से सात फीसदी वोट गड़बड़ हो सकता है और इस हेर-फेर से बिहार की 40 सीटों का समीकरण बदल सकता है.

भाजपा को पासवान से ज्यादा उम्मीद उनके बेटे चिराग से है. भाजपा के एक सांसद की चिराग से दोस्ती है. वे बताते हैं कि लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान, दोनों ने अपनी अगली पीढ़ी को बिहार की सियासत में उतार दिया है. इन दोनों में से चिराग पासवान खुद को उम्र और अनुभव दोनों में तेजस्वी यादव से वरिष्ठ मानते हैं. इसलिए वे हरसंभव कोशिश करेंगे कि उन्हें तेजस्वी को अपना नेता न मानना पड़े.

लेकिन चिराग पासवान एक बार फिर लोकसभा चुनाव भी जीतना ही चाहते हैं और उनकी सीट भी उतनी आसान नहीं है. इसलिए अगर हवा का रुख बदला तो पासवान परिवार गठबंधन बदल भी सकता है. अगर ऐसा हुआ तो यह बात सिर्फ बिहार तक नहीं रुकेगी, क्योंकि देश में सभी नेता यह जानते और मानते हैं कि रामविलास पासवान के पास हवा का रुख और वोटरों का मिजाज समझने की शक्ति किसी भी चुनावी विशेषज्ञ या सेफोलोजिस्ट से कहीं ज्यादा है.