बिहार में सियासी गरमाहट बढ़ी हुई है. राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के नेता व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने यादवोंं के दूध, कुशवाहाओं के चावल और ​अतिपिछड़ों, दलितों आदि के पंचमेवा से सियासी खीर बनाने का जो फार्मूला दिया है, गरमाहट उसी को लेकर है. राजद के नेता तेजस्वी यादव ने उस फार्मूले से बनने वाली खीर को स्वादिष्ट बताकर इस गरमाहट को और बढ़ा दिया है. 31 अगस्त को एक टीवी चैनल से बात करते हुए उपेंद्र कुशवाहा ने अपनी खीर थ्योरी आगे बढ़ाई. उन्होंने कहा कि वे बिहार के हर जिले में पैगाम-ए-खीर का आयोजन करेंगे जिसमें अलग-अलग जातियों के लोग अपने तरीके से खीर बनाने में मदद करेंगे और इसे परोसा भी जाएगा. उनके मुताबिक इस आयोजन की शुरुआत 25 सितंबर से होगी.

उपेंद्र कुशवाहा ऐसा करते रहते हैं. जब से नीतीश कुमार फिर से एनडीए में शामिल हुए हैं, तब से वे नियमित अंतराल पर कुछ न कुछ ऐसा कहते-करते हैं. जानकार मानते हैं कि वे ऐसा इसलिए करते हैं कि नीतीश कुमार परेशान हों और भाजपा उनकी ओर ध्यान दे, नीतीश की तरह उन्हें महत्व दे. उपेंद्र कुशवाहा कई बार संकेत दे चुके हैं कि वे राजद के महागठबंधन में चले जाएंगे. खुद केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री रहते हुए वे बिहार में शि​क्षा की स्थिति पर चिंता जताने के लिए मानव श्रृंखला बनाने से लेकर तमाम तरह के विरोधी अभियान चला चुके हैं. वे खुद भी कह चुके हैं और अपने लोगों से भी कहवा चुके हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री पद के लिए वे कोई कम योग्य उम्मीदवार नहीं. इसके लिए चंद्रगुप्त मौर्य और चक्रवर्ती सम्राट अशोक की जाति का भी पता लगाकर उन्हें कुशवाहा बताते हुए यह कहा जा चुका है कि कुशवाहा जाति के लोग स्वाभाविक तौर पर राज करने की कला जानते हैं, इसलिए अब तो बिहार में शासन का मौका मिलना ही चाहिए.

इस तरह की कई कोशिशों के बावजूद कुशवाहा के कहे-किये पर न तो अब तक भाजपा ने कभी गंभीरता से ध्यान दिया है, न नीतीश परेशान हुए हैं. इसकी वजह भी है. जो उपेंद्र कुशवाहा के सियासी सफर को जानते हैं वे यह भी जानते हैं कि वे कभी इतने साहसी नहीं हुए कि भविष्य की राजनीति के लिए सत्ता के ‘सेफ जोन’ को छोड़ संघर्ष का रास्ता अपना लें.

कुशवाहा को भाजपा ने ‘होल्ड मोड’ में रखा है

यह सब जानते हैं कि उपेंद्र कुशवाहा बिहार की सियासत में नीतीश कुमार की देन हैं. नीतीश कुमार उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाकर अचानक चर्चा में लाए थे. उसके बाद वे उन्हीं नीतीश कुमार से अलग हुए, फिर साथ आये और फिर जब नीतीश कुमार ने राज्यसभा भेज दिया तो दोबारा नीतीश कुमार के विरोधी हो गये. राज्यसभा सांसद रहते हुए वे लगातार नीतीश कुमार का विरोध करते रहे लेकिन, राज्यसभा सांसदी छोड़ने का साहस नहीं दिखा सके. बाद में राष्ट्रीय लोकसमता नाम से अपनी पार्टी बनाकर भाजपा के साथ हो गये, तीन सांसद और तीन विधायक भी उनकी पार्टी से चुनकर आ गए.

नीतीश कुमार तब तक एनडीए छोड़ महागठबंधन का हिस्सा बन चुके थे और उपेंद्र कुशवाहा एनडीए के साथ थे. जानकारों के मुताबिक उन्हें लगा कि अब उनके लिए सबसे बेहतर समय आया है, भाजपा नीतीश कुमार की काट के रूप में उनका इस्तेमाल करेगी और वे आनेवाले दिनों में दूसरे नीतीश कुमार बनेंगे. कुशवाहा के मन में उम्मीद इसलिए भी जगी कि बिहार में जो चार प्रमुख पिछड़ी जातियां-यादव,कुरमी, कोईरी और वैश्य-हैं, उसमें सिर्फ कोईरी यानि कुशवाहा ही है जिसने सत्ता शीर्ष का स्वाद नहीं चखा है. कई जानकारों के मुताबिक उपेंद्र कुशवाहा को लगा कि इस कारण के चलते भाजपा उन्हें आगे कर पिछड़ों की गोलबंदी करेगी. लेकिन नीतीश कुमार को फिर से साथ लेने के बाद से भाजपा ने उपेंद्र कुशवाहा को ‘होल्ड मोड’ में डाल दिया. रूठे कुशवाह कई बार महागठबंधन में शामिल होने की घुड़की दे चुके हैं. लेकिन भाजपा में इसे कोई गंभीरता से लेता नहीं दिखता.

जानकारों की मानें तो भाजपा कुशवाहा को इसलिए साथ बनाये हुए है कि नीतीश कुमार काबू में ​रहें. नीतीश कुमार का आधार वोट लव-कुश समीकरण यानी कुरमी-कुशवाहा वोट माना जाता है. पिछले लोकसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा को नेता के रूप में उछालकर भाजपा ने नीतीश कुमार को संदेश दे दिया था कि उनकी काट में उपेंद्र कुशवाहा हैं, जिनका इस्तेमाल कर वह आगे नीतीश के आधार को खत्म कर सकती है. पार्टी को यह भी मालूम है कि कल को अगर नीतीश कुमार सीटों के बंटवारे पर ज्यादा पेंच फंसायेंगे तो कुशवाहा ही आखिरी हथियार बचेंगे, जिन्हें कुछ सीटें बढ़ाकर दे देने के बाद नीतीश कुमार के आधार पर प्रहार करते हुए खेल बिगाड़ा जा सकता है. इसलिए कुशवाहा के बयानों पर वह न गरम न ठंडा वाला रुख अपनाए हुए है.

जाति का कार्ड खेलकर उपेंद्र कुशवाहा कितनी राजनीति कर सकते हैं?

लेकिन सवाल यह है कि उपेंद्र कुशवाहा क्या बिहार के कुशवाहाओं के नेता बन चुके हैं. बिहार की चार प्रमुख जातियों में कुशवाहा ही एक ऐसी जाति है, जिसकी राजनीति को किसी एक दिशा में अब तक मोड़ा नहीं जा सका है. बिहार की सियासत में एक जाति, एक पार्टी, एक नेता के रूप में तीन प्रमुख नेताओं का नाम लिया जाता है. यह माना जाता है कि यादव कमोबेश लालू प्रसाद यादव के साथ खड़े रहते हैं, कुरमी नीतीश कुमार के साथ आंख बंद कर जाते हैं और यही बात पासवान समुदाय और रामविलास पासवान के बारे में कही जा सकती है.

लेकिन क्या ऐसी स्थिति उपेंद्र कुशवाहा के साथ है? जानकारों की मानें तो शायद नहीं, क्योंकि बिहार में कुशवाहा जाति के राजनीतिक प्रवाह को देखें तो दो स्थितियां हैं. कुशवाहाओं का एक बड़ा वर्ग अपने मूल पेशे खेती-किसानी से जुड़ाव रखता है तो उसके एक हिस्से का वर्षों से सियासी जुड़ाव बिहार की प्रमुख वाम पार्टी भाकपा माले से है, क्योंकि माले ने ही बिहार में खेतिहरों का आंदोलन लंबे समय से चलाया है. माले के आधार विस्तार में कुशवाहा जाति की भूमिका प्रमुख मानी जाती है. कुशवाहाओं में ही एक बड़ा वर्ग काफी पढ़ा-लिखा है तो वह मध्यवर्गीय श्रेणी में आकर नीतीश कुमार के करीब महसूस करता है.और कुशवाहा जाति के और भी कई नेता हैं जो अपने-अपने इलाके के शेर की तरह हैं. शकुनी चौधरी, भगवान कुशवाहा, नागमणि और संतोष कुशवाहा जैसे कई नेता अभी बिहार के स्तर पर चर्चित कुशवाहा नेता हैं और सब की अपने-अपने इलाके में पैठ है. उपेंद्र कुशवाहा इन नेताओं को अपने पाले में रखकर कुशवाहा जाति का सर्वमान्य नेता बनने की कोशिश में हैं. लेकिन जो बिहार की सियासत को जानते हैं, वे यह भी जानते हैं कि यह इतना आसान नहीं. सभी कुशवाहा नेता अपने-अपने इलाके में अपनी साख को स्थापित करने के लिए संघर्षरत हैं और जो पार्टी उन्हें महत्व देगी, वे उसके साथ हो लेंगे. उपेंद्र कुशवाहा के सामने यह चुनौती है.

पंचमेवा जातियां

और इतने के बाद उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती कुशवाहा के साथ दूसरी जातियों को मिलाकर जातीय कॉकटेल तैयार करने की है. उपेंद्र कुशवाहा ने राजनीतिक खीर को बनाने के लिए यादवों के दूध और कुशवाहाओं के चावल के बाद पंचमेवा की जरूरत को लेकर जिन जातियों को साथ आने के लिए कहा, बिहार की सियासत में वही पंचमेवा जातियां अभी सबसे प्रमुख हैं. इन जातियों में अतिपिछड़ा, दलित और महादलित जातियां आती हैं.

उपेंद्र कुशवाहा ने जो बयान दिया उसका मतलब यह निकल रहा है कि वे इन जातियों की भूमिका महज राजनीति की खीर का स्वाद बढ़ाने वाली चीजों के रूप में देखते हैं. खीर वाले बयान में कुशवाहा यही एक ऐसी बात कह गये हैं, जिसे लेकर कल को आसानी से नीतीश कुमार या भाजपा उन्हें पटखनी दे देंगे.

दरअसल नीतीश कुमार के आधार के विस्तार में इन्हीं पंचमेवा जातियों की सबसे बड़ी भूमिका रही है. नीतीश कुमार ने इन्हीं पंचमेवा जातियों को उकसाया कि वे क्यों पिछड़ी जाति के नाम पर लालू प्रसाद की पालकी ढोएं, वे अतिपिछड़े हैं और आपका स्वतंत्र अस्तित्व है. जो बिहारी की राजनीति को देखते रहे हैं वे जानते हैं कि नीतीश कुमार की इसी चाल से लालू प्रसाद का आधार एक बार में भरभराकर गिरा था. नीतीश कुमार ने इन पंचमेवा जातियों को सिर्फ उकसाया नहीं बल्कि पंचायत चुनाव में अलग से आरक्षण देकर उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को भी परवान चढ़ाया.

नीतीश कुमार ने जब पिछड़ी जातियों के राजनीतिक वर्चस्व से इन पंचमेवा जातियों को अलग किया तो भाजपा ने भी इन्हीं पंचमेवा जातियों पर काम करना शुरू किया. इन जातियों में 200 से अधिक जातियां बिहार में हैं और उनमें भी धानुक और मल्लाह जैसी कई जातियां हैं, जिनकी संख्या ठीक-ठाक है और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को भी नीतीश कुमार ने जगाकर सातवें आसमान पर चढ़ाया है. इन जातियों को जब नीतीश कुमार ने अलग ग्रुप के रूप में चिन्हित किया था तो लालू प्रसाद ने इसका विरोध किया था. लेकिन जल्द ही उन्हें यह समझ में आ गया कि नीतीश की इस चाल का विरोध करना रिवर्स फायर ही करेगा, इसलिए उन्होंने अपने सक्रिय समय में इन पंचमेवा जातियों को अपने पाले में करने में ऊर्जा लगाए रखी.

अब तेजस्वी भी इसके लिए कोशिश करते दिखते हैं. लेकिन राजद का स्वरूप ऐसा है कि अब तक इस पंचमेवा जाति से कोई नेता ऐसा नहीं है, जिसे पार्टी की ओर से चेहरे के रूप में ही आगे किया गया हो. उपेंद्र कुशवाहा ने भी इन पंचमेवा जातियों को साथ आने की बात कर एक तरीके से पालकी ढोने का ही आमंत्रण दिया कि सत्ता की सियासत वे और तेजस्वी साथ मिलकर साधेंगे, आप साथ दें. अपने पूरे बयान में कुशवाहा यही सबसे बड़ी गलती कर गये. पंचमेवा जातियां अब पालकी ढोने की स्थिति में नहीं है. नीतीश कुमार ने उन्हें पालकी का सवार बनने की भूख जगा दी है और भाजपा जैसी पार्टी कहार जाति से आनेवाले प्रेम कुमार जैसे नेता को सामने लाकर उनको यह संदेश देते रहती है कि पंचमेवा का मान सम्मान उनके यहां ही है.