बीती 22 अगस्त को पूरी कश्मीर घाटी ईद-उल-अज़हा मना रही थी. 34 साल के पुलिस कांस्टेबल फ़याज़ अहमद शाह अपनी तीन साल की बेटी सुहाना को लेकर ईदगाह गए थे, लेकिन वहां से वापस नहीं लौटे. कुछ बंदूकधारियों ने उनको ईदगाह से अगवा करने की कोशिश की. उसमें नाकाम रहने पर उनकी गोली मार कर हत्या कर दी गई. वक्त रहते उन्होंने अपनी बेटी सुहाना को एक रिश्तेदार की तरफ धकेल दिया था. फ़याज़ दक्षिण कश्मीर के कुलगाम ज़िले के ज़ज़रिपोरा गांव के रहने वाले थे. उनकी हत्या भी वहीं की गई.

फ़याज़ की हत्या ईद-उल-अजहा के दिन करीब सुबह साढ़े आठ बजे हुई. उसी शाम साढ़े पांच बजे बजे बगल के पुलवामा ज़िले के लोस्वनी गांव में स्पेशल पुलिस ऑफिसर (एसपीओ) मुहम्मद याक़ूब शाह को अज्ञात लोगों ने गोलियों से छलनी कर दिया. शाह उस समय जिला पुलिस लाइंस की तरफ अपनी नाइट ड्यूटी के लिए जा रहे थे. फ़याज़ की हत्या के 12 घंटे भी नहींं बीते थे कि अज्ञात बंदूकधारी पुलवामा के ही लारव गांव में छुट्टी पर आए पुलिस इंस्पेक्टर मुहम्मद अशरफ डार के घर में घुस गए और उनके किचन में ही उनकी गोली मार कर हत्या कर दी.

यह सिलसिला जारी है. शुक्रवार को ही खबर आई कि आतंकियों ने दक्षिण कश्मीर के शोपियां से अगला किए गए तीन पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी. इनमें एक कॉन्स्टेबल है और दो विशेष पुलिस अधिकारी यानी एसपीओ. इन तीनों के ही शव बाटागुंड नाम के उस गांव से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर एक बगीचे से बरामद किए गए जहां से इन्हें अगवा किया गया था.

पुलिसकर्मियों को मारने का यह सिलसिला कश्मीर घाटी में पिछले दो-तीन साल से चल रहा है. लेकिन हाल में इसने काफी तेजी पकड़ी है. पुलिस के आधिकारिक सूत्रोंं का कहना है कि इस साल अब तक करीब 28 पुलिस वालोंं की हत्या की जा चुकी है. बीते डेढ़ महीने में ही 11 पुलिसकर्मियों की हत्या की जा चुकी है. इनमें से कुछ का अपहरण कर कत्ल किया गया तो कुछ को मौके पर ही गोली मार दी गई. इन पुलिसकर्मियोंं में यह बात समान है कि इनकी हत्या तब की गई जब ये अपने घरों में छुट्टी मनाने आए थे.

इन हत्याओं के पीछे कौन?

पुुुलिस का साफ मानना है कि पुलिसकर्मियों की हत्याओं के पीछे मिलिटेंट्स हैं. मिलिटेंट्स ने अभी तक इस आरोप को नकारा भी नहीं है. उग्रवादी संगठन इन हत्याओं के पीछे हैं, इसका सबसे बड़ा सबूत है कि ये संगठन स्पेशल पुलिस अॉफिसर्स (एसपीओ) को अक्सर नौकरी छोड़ने के लिए धमकाते रहते हैं. नौकरी न छोड़ने पर अंजाम भुगतने की चेतावनी दी जाती है. मिलिटेंट्स एसपीओ के तौर पर तैनात पुलिस वालों पर अक्सर मुखबिरी का इल्जाम लगाते रहते हैं. इसके अलावा स्थायी सेवा में तैनात पुलिस वालों को लोगों के साथ ज्यादती के आरोप में निशाना बनाया जाता है.

पुलिसकर्मी होने की मुश्किलें

इधर कुछ दिनों से पुलिसकर्मियों की लगातार हो रही हत्याओं ने कश्मीर की पुलिस फोर्स में एक तरह का खौफ और असमंजस भर दिया है. बहुत सारे पुलिसकर्मी ऐसे हैं जिनका घर चलाने का जरिया उनकी तनख्वाह ही है. लेकिन जान के खौफ के चलते वे नौकरी छोड़ने की सोच रहे हैं. कुछ अपना घर-बार छोड़कर राज्य के दूसरे इलाकों में बस गए हैं और कुछ एेसा करने के बारे मेंं सोच रहेे हैं.

पुलवामा में तैनात कांस्टेबल मुश्ताक़ अहमद ने सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘हजार बार सोचना पड़ताा है कि घर जाएं कि नहीं. महीनों अपने बच्चों का मुंह देखने को तरस जाते हैं. अगर हिम्मत कर दो चार महीने में घर गए भी तो घर से बाहर निकलने सवाल ही नहीं पैदा होता. मस्जिद नहीं जा पाते हम, सैर के लिए निकलना दूर की बात है.’

लगातार हुई पुलिसकर्मियों की हत्याओं के बाद वरिष्ठ पुलिस अफसर भी मातहतों को घर नहीं जाने देते. दक्षिण कश्मीर के शोपियां ज़िले के एक वरिष्ठ पुलिस अफसर कहते हैं, ‘मैंने पिछले एक महीने से दक्षिण कश्मीर में तैनात पुलिसकर्मियों को घर जाने की इजाज़त नहीं दी है. मैं भी अासपास ही रहता हूं. लेकिन मेरा घर सुरक्षित इलाके में है. लेकिन पुलिसकर्मियों का मिलिटेंट्स की चपेट में आ जाना ज्यादा अासान है.’

इन सबके अलावा अब एक अलग प्रवृत्ति पनप रही है. पहले पुलिस वालों के परिवारवालों को मिलिटेंट्स नहीं छेड़ते थे, लेकिन अब एेसा होने लगा है. आज ही खबर आई है कि पांच पुलिसकर्मियों के घरवाले अगवा कर लिए गए हैं. ऐसे में ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों को घरवालों की भी चिंता सताती रहती है. पुलवामा और शोपियां जिले में इस साल कई पुलिस वालों के घर पर तोड़फोड़ हुई. मिलिटेंट्स ने परिवार वालोंं को धमकी भी दी कि वे अपने बच्चों से पुलिस की नौकरी छुड़वा दें.

हाल ही में लश्कर-ए-तैय्यबा से जुड़े एक मिलिटेंट के अनंतनाग स्थित घर पर पुलिस ने तोड़फोड़ की. इसके बाद उस मिलिटेंट ने चेतावनी दी कि वह पुलिसवालों के घर के साथ भी ऐसा ही सुलूक करेगा. लश्कर से जुड़े मिलिटेंट वारिस मालिक ने अपने वीडियो संदेश में कहा, ‘हम यह हक रखते हैं कि जो सुलूक हमारे घरवालोंं के साथ हो रहा है, वही हम पुलिस वालों के घरोंं के साथ भी करें.’

इस वायरल वीडियो मैसेज और इसके बाद हुई घटनाओं ने पहले से ही परेशान पुलिस वालोंं को और परेशान कर दिया. ऐसे पुलिसकर्मियों की संख्या बढ़ती जा रही है जो अपने परिवार को किसी दूसरी जगह भेजने केे बारे में सोच रहे हैं. शोपियां जिले के अब्दुल हमीद बताते हैं कि उन्होंने इन सबके चलते ही अपने घरवालोंं को जम्मू भेज दिया है. हमीद कहते हैं, ‘वहां एक रिश्तेदार का मकान है. मुझे भी जब छुट्टी मिलती है, वहां चला जाता हूं. कम से कम अब रोज खौफ में तो नहीं रहेंगे.’

लेकिन परिवार को किसी दूसरी जगह भेजना सामाजिक रूप से खासा मुश्किल तो है ही, आर्थिक रूप से भी कम चुनौतीपूूर्ण नहीं है. सबके लिए यह इतना आसान नहींं है. श्रीनगर के कुलगाम में तैनात एसपीओ जफर हुसैन कहते हैं, ‘महीने के मुझे कुल 4500 रुपये मिलते हैं. उसमें घर वालों को खिलाऊंगा या उन्हें किराए के घर में रखूंगा?’

स्पेशल पुलिस अॉफिसर्स (एसपीओ) सबसे ज्यादा परेशान

मिलिटेंट्स द्वारा मारे जाने के खौफ के चलते 10 अगस्त को जुमे की नमाज के बाद 24 स्पेशल पुलिस अॉफिसर्स (एसपीओ) ने स्थानीय मस्जिदों में अपने इस्तीफे का एेलान कर दिया. इस्तीफे जुमे की नमाज के तुरंत बाद इसलिए पढ़े गए ताकि मिलिटेंट्स इस बारे में जान जाएं और ये पुलिसकर्मी चैन की सांस ले सकें. खौफ का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब सत्यग्राह के संवाददाता ने त्राल के पस्तूना गांव में अली मुहम्मद नाम के एक एसपीओ के घर का दरवाज़ा खटखटाया तो एक युवक निकला और कहा, ‘अली मोहम्मद घर पर नहींं हैं.’ बाद में पता चला कि वही शख्स अली मुहम्मद था.

एसपीओ दरअसल एक तय वेतनमान पर नियुक्त किए जाते हैं. एक तरह से कह सकते हैं कि पुलिस का सहयोग करने के एवज में इन्हें दैनिक भत्ता दिया जाता है. भर्ती के टाइम पर इनका वेतन 4500 रुपए होता है. जो अगले एक या दो साल में 6000 हो जाता है. अगर इन्हें साइटेशन न मिले तो पूरी नौकरी के दौरान इनका वेतन 6000 रुपए ही रहेगा.

पुलवामा पुलिस स्टेशन में तैनात एसपीओ बशीर अहमद की कहानी से इस व्यवस्था को और बेहतर समझा जा सकता है. बशीर कहते हैं, ‘मैं बतौर एसपीओ 22 साल पहले पुलिस में आया और तब मेरा वेतन 1500 रूपये महीना था. इस समय मेरा वेतन 6000 है और इसके बढ़ने की कोई उम्मीद नहीं है. नौ लोगों के परिवार का खर्च इसी वेतन से चलता है.’

बशीर के सीनियर अफसर इसे थोड़ा और साफ तरीके से समझाते हैं. उनका कहना है कि वेतन बढ़ने की गुंजाइश तभी होती है जब इन लोगोंं को साइटेशन मिलता है और साइटेशन तभी मिलता है, जब यह एंटी-मिलिटेंसी ऑपरेशंस में हिस्सा लेते हैं. वे अागे कहते हैं, ‘साइटेशन मिलते ही ये एसपीओ मिलिटेंट्स के निशाने पे आ जाते हैं क्योंकि साइटेशन का मतलब ही यह है कि इनका हाथ किसी मिलिटेंट को मार गिराने में है.’

कुलगाम के मुतलहामा गांव में रहने वाले कांस्टेबल सलीम अहमद शाह 2015 में एसपीओ के रूप में पुलिस में भर्ती हुए. करीब एक साल पहले उन्हें साइटेशन मिला और कांस्टेबल की ट्रेनिंग के लिए वे जम्मू चले गए. सलीम अपनी बहन की सगाई के लिए नौ जुलाई को घर आये थे. उन्होंने कुछ दिन घर पर रुकने का मन बना लिया. 19 जुलाई की शाम सलीम अपने कुछ दोस्तों के साथ घर के पास वाली नदी में मछलियां पकड़ रहे थे कि मिलिटेंट्स उन्हें यह कहकर उठा ले गए कि अभी आधे घंटे में छोड़ देंगे. अगले दिन सलीम की लाश मिली और उसके फ़ौरन बाद एक वीडियो आया जिसमें सलीम किसी ऐसे एनकाउंटर की जिम्मेदारी ले रहे थे, जिसमें मिलिटेंट मारे गए थे.

कुलगाम में तैनात एसपीओ जुबैर अहमद कहते हैं, ‘एसपीओ के लिए हालात तो न निगला जाए और न उगला जाए वाले हो गए हैं. ऑपरेशंस में हिस्सा न लें तो ज़िंदगी भर 6000 रु ही तनख्वाह के रूप में मिलेंगे. अॉपरेशन में हिस्सा लें तो मार दिए जाएंगे.’

कुछ वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी एसपीओ के तौर पर तैनातकर्मियों से सहानुभूति रखते हैं और मानते हैं कि उनके साथ ज्यादती हो रही है. ऐसी ही एक अधिकारी कहते हैं, ‘हमें पता है यह लोग कितने मुश्किल आर्थिक हालात और असुरक्षा में जी रहे हैं. लेकिन, जब तक सरकार इनके लिए कोई फैसला नहीं लेती तब तक हम भी क्या कर सकते हैं.’ हालांकि कुछ अफसर कहते हैं कि ये लोग अपनी मर्जी से इस लालच में एसपीओ बने रहते हैं कि कभी न कभी स्थायी नौकरी लग जाएगी, वर्ना आजकल तो अादमी मजदूरी कर भी 10 हजार रुपये कमा लेता है.

घरवालों का गम

कांस्टेबल सलीम के पिता अब्दुल गनी शाह ने सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘मेरा बेटा बिल्कुल निर्दोष था. अगर एक बार वे लोग (मिलिटेंट्स) मुझ से कहते तो मैं उसकी नौकरी छुड़वा देता. नौकरी बेटे की जान से ज्यादा प्यारी थोड़ी थी.’ वह कहते हैं कि जिस एनकाउंटर का ज़िक्र सलीम ने उस वीडियो में किया था, वह तब हुआ था जब सलीम ने नौकरी भी शुरू नहीं की थी. हम अपने घर में पट्टी आरा चलाके अपना पेट पालते हैं, सलीम भी वही कर लेता. मारने की क्या ज़रूरत थी.

मारे गए पुलिसकर्मी फयाज की बीवी तबस्सुम का भी दर्द यही है. वे कहती हैं, ‘उन्होंने (मिलिटेंट्स) एक चेतावनी क्यों नहीं दी. मैं अपने पति से नौकरी पर न जाने की भीख मांगती. वे हमेशा कहते थे कि मैंने किसी को नहीं मारा तो मुझे कोई क्यों मारेगा.’ तबस्सुम आगे कहती हैं, ‘मेरी बेटी सुहाना अपने ही घर आने से डरती है. उसका लगता है कोई उसको मार देगा. मेरे शौहर की मौत के बाद से वो अपने ननिहाल में ही है.’

खौफ के चलते कई अपने लड़कों से पुलिस की नौकरी छुड़वा रहे हैं. पस्तूना गांव में हनीफा बेगम ने अपने बेटे की नौकरी छुड़वा दी. वे कहती हैं, ‘मेरा बेटा पुलिस में बढ़ई का काम कर रहा था. लेकिन मैंने उसकी नौकरी छुड़वा दी. क्या पता उसको भी कोई मार देता.’

पुलिस हालात से कैसे निपट रही है?

इन हालात से निपटने के लिए पुलिस बयानबाजी और निंदा के अलावा कुछ ठोस करती नहीं दिखाई देती है. हाल ही में पुलिस ट्रेनिंग स्कूल के प्रिंसिपल को निर्देश दिया गया कि प्रशिक्षण ले रहे कर्मियों को छुट्टी में घर न जाने दिया जाए. लेकिन आईजी स्वयंप्रकाश पाणि ने ऐसे किसी आदेश की जानकारी होने से इन्कार किया. इस सवाल पर कि इन हालात से निपटने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? उनका जवाब था, ‘इस मसले पर चर्चा चल रही है.’ यानी पुलिस वालों के घर न जाने के लिए कोई आधिकारिक एडवाइजरी नहीं है. और ये लोग घर भी नहीं जा सकते.

इससे बड़ी दुविधा क्या हो सकती है?

(रिपोर्ट में जिन पुलिसकर्मियों और एसपीओ से बात की गई है उनकी सुरक्षा के मद्देनजर उनके नाम बदल दिए गए हैं)