कर्नाटक में जेडीएस (जनता दल-धर्मनिरपेक्ष)-कांग्रेस का गठबंधन और उसकी सरकार को लगातार हिचकोले लग रहे हैं. वह भी बाहर से नहीं बल्कि भीतर से ही. इसके बावज़ूद राजनीतिक मज़बूरी में ही सही गठबंधन चल रहा है और सरकार भी. चलते-चलते अभी 30 अगस्त को ही इसके 100 दिन भी पूरे हो गए हैं. लेकिन यह सिलसिला अगले 100 दिन भी और चल पाएगा या नहीं यह इस गठजोड़ के कर्ता-धर्ता भी दावे के साथ नहीं कह पा रहे हैं.

हालांकि ऊपरी तौर पर कह सब रहे हैं कि सरकार और साझेदारी पूरे पांच साल चलेगी. लेकिन ऐसा कहने और दावा करने वालों में ख़ुद ही आत्मविश्वास नहीं दिखता. यहां तक कि मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी का आत्मविश्वास भी जब-तब हिलता-डुलता दिखाई देता है. ऐसा होने के पीछे पुख़्ता वज़हें हैं.

सरकार में न जश्न न जोश, गठबंधन के मुखिया भी विदेश जा रहे हैं

लगातार चुनौतीपूर्ण हालात से जूझ रही किसी भी सरकार के लिए 100 दिन भी पूरे कर लेना उपलब्धि ही मानी जा सकती है. वह भी कर्नाटक जैसी सरकार जिसमें कम सीटों वाली पार्टी के नेता (जेडीएस के कुमारस्वामी) सरकार की अगुवाई कर रहे हैं और तुलनात्मक रूप से दोगुने से ज़्यादा सीटें जीतने वाला दल (कांग्रेस) नायब की भूमिका में है. लेकिन इस उपलब्धि के बावज़ूद कुमारस्वामी और उनकी सरकर में न तो जोश नज़र आ रहा है और न जश्न ही. ख़बरें बताती हैं कि इस अहम मौके पर भी पूरे राज्य में दोनों दलों के कार्यकर्ता शांति ओढ़े बैठे हैं. और इनकी तो बात ही क्या, गठबंधन के मुखिया (समन्वय समिति के प्रमुख) पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया भी परिवार सहित छुटि्टयां मनाने के लिए यूरोप गए हुए हैं.

मुख्यमंत्री ख़ुद सरकार गिराने की कोशिशों से डरे हुए लगते हैं

सिद्धारमैया के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के साथ जिस तरह के संबंध हैं उसके मद्देनज़र उनकी विदेश यात्रा को भी संदेह की निगाह से देखा जा रहा है. जेडीएस के एक वरिष्ठ नेता कहते भी हैं, ‘हमें आशंका है कि उनकी (सिद्धारमैया की) ग़ैर-मौज़ूदगी में उनके समर्थक राज्य सरकार गिराने की कोशिश कर सकते हैं. और इस पूरी क़वायद से वे ख़ुद अपना पल्ला झाड़ सकते हैं, यह कहते हुए कि मैं तो देश में था ही नहीं. जो किया वह स्थानीय नेताओं ने अपने असंतोष की वज़ह से किया है.’ मुख्यमंत्री कुमारस्वामी तो खुले तौर पर कह चुके हैं, ‘मुझे ख़बर है कि कुछ लोग मेरी सरकार गिराने की कोशिश कर रहे हैं. उनका आगे यह भी कहना था, ‘मुझे ऐसी ख़बरों से कोई फर्क़ नहीं पड़ता. मैं अपने काम पर ध्यान दे रहा हूं.’

लेकिन सवाल उठता है कि कुमारस्वामी को फर्क़ नहीं पड़ता तो वे बार-बार कांग्रेस नेतृत्व से गुहार क्यों लगाते हैं. मसलन अभी 28 तारीख़ को ख़बर आई कि उन्होंने ‘कांग्रेस नेतृत्व से साफ कहा है कि भाजपा विरोधी मोर्चे के हित को ध्यान में रखते हुए स्थानीय मसलों को जल्द से जल्द सुलझाएं.’ निश्चित रूप से उनका इशारा सिद्धारमैया और उनके समर्थकों की ओर ही था. सिद्धारमैया ने 24 अगस्त को हासन जिले में एक कार्यक्रम के दौरान यह कहकर हड़कंप मचा दिया था कि वे जल्द फिर मुख्यमंत्री बनेंगे.’ इसके बाद से ही आशंकाएं जताई जा रही हैं वे कांग्रेस में अपने समर्थकों और जेडीएस के असंतुष्टों के बल पर कुमारस्वामी की सरकार को गिराने की तैयारी में हैं.

इन आशंकाओं को पूरी तरह अटकलबाज़ी भी नहीं माना जा रहा है क्योंकि अगस्त के ही महीने में यह ख़बर भी आ चुकी है कि कांग्रेस नेतृत्व भी सिद्धारमैया को ताक़ीद कर चुका है कि अभी ‘कुमारस्वामी सरकार को अस्थिर न करें.’ कहा जाता है कि खुद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस बाबत सिद्धारमैया से बात की है. बताया तो यह भी जाता है कि कांग्रेस चाहती है कि सिद्धारमैया इस बार लोक सभा चुनाव लड़ें. लेकिन वे राज्य की सत्ता का मोह अब तक छाेड़ नहीं पाए हैं. हालांकि राहुल गांधी की ताक़ीद के बाद यह ज़रूर वे इस मोह पर कुछ देर के लिए काबू पाने का संकेत जरूर देने लगे हैं. उदाहरण के लिए ‘फिर मुख्यमंत्री बनने वाले अपने बयान’ पर उन्होंने सफाई दी. कहा कि उन्होंने राज्य के अगले चुनाव के बाद जनता के आशीर्वाद से मुख्यमंत्री बनने की बात की थी. उनके समर्थकों के हवाले से भी मीडिया को ख़बर दी गई कि सिद्धारमैया दिल से मानते हैं कि वे पिछली बार राहुल गांधी की वज़ह से ही मुख्यमंत्री बन पाए थे. इसलिए वे उन्हें धोखा नहीं देंगे.’

इस सबके बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दिनेश गुंडूराव को यहां तक कहना पड़ा, ‘हमने जेडीएस के साथ लिखित समझौता किया है. इसमें हमने वादा किया है कि हम सरकार को पूरे पांच साल तक समर्थन देंगे. हम अपने इस वादे पर क़ायम हैं और रहेंगे.’ उपमुख्यमंत्री जी परमेश्वरा ने भी कहा, ‘सरकार को कोई ख़तरा नहीं है. इस बाबत किसी को चिंता नहीं करनी चाहिए.’ इसके बावज़ूद कुमारस्वामी और उनकी पार्टी का डर ख़त्म होता नहीं दिखता तो इसका भी मज़बूत आधार है.

कुमारस्वामी की सरकार को काम करने में भी लगातार दिक्क़तें आ रही हैं

जैसा कि पहले ही बताया गया, सरकार के मुखिया भले कुमारस्वामी हैं लेकिन गठबंधन की कमान सिद्धारमैया के हाथ में है और दोनों ही नेता विपरीत ध्रुवों की तरह एक-दूसरे से व्यवहार कर रहे हैं. इससे सरकार को काम करने में लगातार दिक्क़तें आ रही हैं. मसलन- जब कुमारस्वामी राज्य का बजट फिर पेश करना चाहते थे तो सिद्धारमैया ने इसका खुलकर विरोध कर दिया. जैसे-तैसे बजट पेश हुआ तो कुमारस्वामी को इसमें अधिकांश हिस्सा उस बजट का रखना पड़ा जिसे सिद्धारमैया ने सरकार के मुखिया और वित्त मंत्री की हैसियत से ख़ुद इसी मार्च में पेश किया था.

इसके बाद भी बताया जाता है कि सिद्धारमैया की दख़लंदाज़ी कम नहीं हुई है. सूत्र बताते हैं कि वे लगभग हर सप्ताह एक न एक पत्र मुख्यमंत्री कुमारस्वामी को लिख भेजते हैं. इसमें कोई न कोई मांग होती है. मसलन- डीज़ल-पेट्रोल पर लगाया कर वापस ले लिया जाए, गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को दिए जाने वाले चावल की मात्रा दो किलो घटा दी जाए, फिल्म सिटी को मैसुरू से रामनगर में स्थापित करने के फैसले पर पुनर्विचार किया जाए आदि. बताया जाता है कि सिद्धारमैया जुलाई के पहले पखवाड़े तक, यानी सरकार के शुरूआती 45 दिनों में ही नौ पत्र कुमारस्वामी को लिख चुके थे.

जानकारों की मानें तो सिद्धारमैया इस तरह यह बताना और ज़ताना चाहते हैं कि मुख्यमंत्री कोई भी हो, असल में ‘बिग बॉस’ वही हैं. ठीक उसी तरह जैसे उनके राजनीतिक गुरु एचडी देवेगौड़ा कांग्रेस की एन धरम सिंह सरकार के समय किया करते थे. तब कांग्रेस सरकार को जेडीएस समर्थन दे रही थी और देवेगौड़ा समन्वय समिति के मुखिया थे. लेकिन वे अक़्सर मुख्यमंत्री काे पत्र लिखा करते थे. उनके लिखे पत्र जाने-अनजाने में मीडिया में लीक भी हो जाया करते थे. यही अब फिर हो रहा है.

तिस पर अपने ही बजट की घोषणाओं पर अमल करने में कुमारस्वामी को दिक्क़त आ रही है. जैसे कि वे राज्य के किसानों का 40,000 करोड़ रुपए का कर्ज़ माफ करने की बजट में घोषणा कर चुके हैं. मगर राज्य के वित्तीय हालत ने उन्हें इसकी अब तक इजाज़त नहीं दी है. उनकी सरकार पर उत्तर कर्नाटक की उपेक्षा के आरोप भी लग रहे हैं. कहा जा रहा है कि यह क्षेत्र चूंकि जेडीएस को अधिक समर्थन नहीं देता इसलिए जानबूझकर इसकी अनदेखी की जा रही है. इन्हीं आरोपों के चलते उत्तर कर्नाटक को अलग राज्य बनाने की मांग भी एक बार फिर उठने लगी है. हालांकि मुख्यमंत्री इस मसले पर कितने संवेदनशील हैं इसकी मिसाल उनके एक बयान से मिलती है. बीते महीने उन्होंने कहा था कि अगर ‘अलग राज्य की मांग मान भी ली जाए तो क्या उस क्षेत्र के लोग अपर कृष्णा प्रोजेक्ट (कृष्णा नदी पर बड़ी सिंचाई परियोजना) के लिए अपने दम पर राजस्व जुटा लेंगे.’ इससे लोग और भड़क गए और दो अगस्त को उन्होंने उत्तर कर्नाटक में बंद आयोजित कर दिया.

कुमारस्वामी पर अपनी पार्टी और परिवार (ख़ास तौर पर पिता पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा और बड़े भाई एचडी रेवन्ना जो राज्य के मौज़ूदा लोक निर्माण मंत्री हैं) की अपेक्षाएं पूरी करने का भी दबाव है. राजनीतिक विश्लेषक और बेंगलुरू की अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और ए नारायणा कहते भी हैं, ‘कुमारस्वामी बुरी तरह फंस गए लगते हैं. अपने परिवार, पार्टी और दो पार्टियों के गठबंधन की अपेक्षाओं के बीच. इस उलझन से निकलने का फिलहाल उनके सामने कोई रास्ता भी नहीं दिखता. शायद यही कारण है कि जिस तरह की परिपक्वता मुख्यमंत्री के तौर पर उनके पहले कार्यकाल (2006) में उनके भीतर दिखती थी वैसी अब नज़र नहीं आती.’

ऐसे ही एक अन्य राजनीतिक विश्लेषक और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज़ (एनआईएएस) के प्रोफेसर नारेंदर पाणि भी कहते हैं, ‘कुमारस्वामी की सरकार ऐसे चल रही है जैसे वह कल ही गिरने वाली हो.’ राजनीति के जानकारों की इस धारणा को मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ख़ुद मौके-बेमौके आधार देते हुए दिखते हैं. वे कभी मौज़ूदा राजनीतिक हालात पर रोते हैं तो कभी कांग्रेस नेतृत्व के सामने आरज़ू-मिन्नत करते हैं और कभी वे ख़ुद को ‘संदर्भिका शिशु’ बता देते हैं. यानी वह बच्चा जो परिस्थितियों के कारण पैदा हुआ, इच्छा से नहीं. सो ऐसे शिशु में जीवन की स्थिरता (इसे सरकार का स्थायित्व समझा जा सकता है) के प्रति आत्मविश्वास भला कैसे हो सकता है?