नोटबंदी को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के ताजा टकराव को आज के अधिकतर अखबारों ने पहले पन्ने पर जगह दी है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार पर जमकर निशाना साधा. उन्होंने कहा, ‘नोटबंदी कोई गलती नहीं बल्कि, मोदी सरकार का बड़ा घोटाला है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का फैसला केवल अपने 15-20 पूंजीपति मित्रों की सहायता करने के लिए लिया था. उनके दोस्तों ने इसका फायदा उठाते हुए अपना सारा काला धन सफेद कर लिया’. कांग्रेस अध्यक्ष ने आगे कहा कि नोटबंदी की वजह से देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई.

वहीं, केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि नोटबंदी का लक्ष्य सिर्फ काले धन पर प्रहार ही नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाना भी था. केंद्रीय मंत्री का यह बयान भी अखबारों की प्रमुख सुर्खियों में शामिल है. उन्होंने कहा, ‘नोटबंदी से इनकम टैक्स जमा कराने वालों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है. मार्च, 2014 में जहां 3.8 करोड़ टैक्स रिटर्न फाइल हुए तो वहीं 2017-18 में यह संख्या बढ़कर 6.86 करोड़ पर पहुंच गई. नोटबंदी के दौरान बैंकों में भारी नकदी जमा कराने वाले लाखों लोगों की अब यह पूछताछ भी की जा रही है कि उनके पास इतना पैसा कैसे और कहां से आया था.’

राहुल गांधी को संघ के कार्यक्रम में हिस्सा न लेने की सलाह

कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यक्रम में हिस्सा न लेने की सलाह दी है. हिन्दुस्तान में छपी खबर की मानें तो पार्टी कोर ग्रुप की बैठक में लोक सभा में पार्टी के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने राहुल गांधी से कहा, ‘संघ जहर है, इसे सभी जानते हैं. अगर आप जानते हैं कि आपके सामने जहर है तो इसे चखने की जरुरत नहीं है.’ उन्होंने आगे कहा, ‘आरएसएस अपनी विचारधारा फैलाना चाहता है तो हम भागीदार क्यों बनें.’ इससे पहले राहुल गांधी ने कहा था कि उन्हें संघ की ओर से इस तरह का कोई न्यौता नहीं मिला है.

दागी विधायकों-अपराधियों की जानकारी न देने पर केंद्र को सुप्रीम कोर्ट से फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक छवि वाले सांसदों और विधायकों की जानकारी न देने पर केंद्र सरकार को फटकार लगाई है. नवभारत टाइम्स की खबर के मुताबिक शीर्ष न्यायालय ने कहा, ‘आदेश के बाद भी केंद्र ने इसे उपलब्ध नहीं कराया है. सरकार हमें मजबूर कर रही है कि हम इस पर आदेश पारित करें जो हम इस वक्त करना नहीं चाहते हैं.’ सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की है. इसमें दागी नेताओं के खिलाफ मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित करने की मांग की गई है. साथ ही, दोषी साबित होने पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है. बीती 21 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा भी था कि उसने ऐसी कितनी विशेष अदालतें बनाई हैं. इससे पहले बीते दिसंबर में शीर्ष न्यायालय ने एक मार्च, 2018 तक इस तरह की 12 अदालतों को गठित करने का आदेश दिया था.

देश की आलोचना को राजद्रोह नहीं माना जा सकता : विधि आयोग

विधि आयोग ने राजद्रोह को लेकर अहम सिफारिश की है. अमर उजाला के पहले पन्ने पर प्रकाशित खबर के मुताबिक आयोग का कहना है कि किसी व्यक्ति पर यह आरोप तभी लगाया जाता सकता है जब सरकार को हिंसा और गैरकानूनी तरीके से उखाड़ फेंकने का मकसद हो. बताया जाता है कि आईपीसी की धारा 124-ए के पुनरीक्षण पर आयोग ने अपनी सिफारिश में भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में राजद्रोह की परिभाषा को फिर से निर्धारित करने की मांग की है. न्यायाधीश बीएस चौहान की अध्यक्षता वाले विधि आयोग का साफ-साफ कहना है कि देश की आलोचना को राजद्रोह नहीं माना जा सकता. वहीं, विधि आयोग का यह भी कहना है कि यह देश की अखंडता की रक्षा के लिए जरूरी था लेकिन, स्वतंत्र आवाज को दबाने के लिए इसका हथियार के रूप में दुरुपयोग नहीं होना चाहिए.

सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई को लेकर मानवाधिकार संस्थानों की सख्त टिप्पणी

महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में नजरबंद पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं को लेकर मानवाधिकार संस्थानों ने सख्त टिप्पणी की है. द हिंदू की खबर के मुताबिक ह्यूमन राइट्स वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने इस संबंध में संयुक्त बयान जारी किया है. इसमें कहा गया है कि सरकार को राजनीतिक रूप से प्रेरित गिरफ्तारी और कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न को रोकना चाहिए. ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा, ‘ताजा गिरफ्तारी डर पैदा करने के लिए स्वतंत्र आवाज पर सरकार के व्यापक हमले को दिखाती है.’ वहीं, एमनेस्टी इंडिया के कार्यकारी निदेशक आकार पटेल का कहना है कि आलोचकों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ पुलिस ने बार-बार आतंकवाद विरोधी कानूनों का इस्तेमाल किया है.