पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री इमरान खान ने हाल ही में प्रधानमंत्री आवास, 524 नौकरों और 80 गाड़ियों का काफ़िला छोड़कर तीन कमरों वाले एक मकान को अपना घर बनाया है. इस फ़ैसले के पीछे की वजह बताते हुए, उन्होंने कहा, ‘एक तरफ हमारे पास अपने लोगों पर खर्च करने के लिए पैसे नहीं हैं, दूसरी तरफ हमारे यहां कुछ लोग ऐसे रहते हैं जैसे हमारे औपनिवेशिक मालिक रहा करते थे.’

ज़ाहिर है इमरान खान का इशारा अंग्रेज़ों की तरफ़ था. पाकिस्तान की सरकार में मितव्ययता को बढ़ावा देने की उनकी इस पहल की खूब तारीफ हो रही है. इस बात से उन दिनों का एक किस्सा याद आता है जब भारत आज़ाद हुआ ही था. तब महात्मा गांधी ने तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन को वायसराय भवन (आज का राष्ट्रपति भवन) में न रह कर कहीं और, किसी छोटे भवन में रहने की सलाह दी थी.

यह किस्सा यूं है कि जब माउंटबेटन ने भारत का पहला गवर्नर जनरल बनने की कांग्रेस की पेशकश स्वीकार की तो गांधी उनसे आकर मिले और उन्होंने इस फ़ैसले पर ख़ुशी जताई. लैरी कॉलिन्स और डॉमिनिक लैपियर की क़िताब ‘माउंटबेटन एंड पार्टिशन ऑफ इंडिया’ में दर्ज एक साक्षात्कार में उन्होंने इस वाकये का जिक्र किया है. माउंटबेटन के मुताबिक गांधी ने उनसे कहा, ‘भला ये किसने सोचा होगा कि जिस अंग्रेज़ी सरकार से हम इतनी नफ़रत करते थे उसके आख़िरी वायसराय को हम अपना राष्ट्रपति (गवर्नर जनरल) बनने के लिए निवेदन करेंगे.’

गांधी का आगे कहना था, ‘हम एक गरीब देश हैं. अंग्रेज़ों ने ज़बरदस्त धूमधाम और तड़क-भड़क के साथ हम पर शासन किया, वायसराय ने अपने इर्द-गिर्द एक ऐसा आभामंडल रचा कि लोग उसकी तरफ देखने की हिम्मत भी नहीं कर पाते थे. अगर आप भारत के मुखिया हैं तो इसे (वायसराय भवन) छोड़ कर अपनी पत्नी के साथ किसी साधारण भवन में रहने चले जाएं. जितना सुलभ मैं आम लोगों के लिए हूं, आप भी वही उदाहरण पेश करें’.

माउंटबेटन के मुताबिक उन्होंने सवाल किया कि फिर इस इमारत का क्या होगा जिसे बनाने में इतना पैसा लगा है. गांधी बोले कि इसे अस्पताल में तब्दील कर देना चाहिए. माउंटबेटन ने अपनी पत्नी का हवाला देते हुए कहा कि अगर वे (गांधी) एडविना से इस बाबत बात करेंगे तो वे बताएंगी कि यह इमारत अस्पताल की ज़रूरतों के मुताबिक़ नहीं बनी है. गांधी ने फिर भी अपनी बात पर ज़ोर देते हुए कहा कि उस भवन का किसी भी और तरह से इस्तेमाल कर लिया जाए पर माउंटबेटन उदाहरण पेश करते हुए इसे खाली कर दें और थोड़ा साधारण जीवन व्यतीत करें. माउंटबेटन ने उनसे कहा कि अभी इस मसले को यहीं रहने देते हैं और एक महीने के बाद जब ‘ट्रांसफर ऑफ पॉवर’ की प्रकिया पूरी हो जायेगी तब इस पर बात कर लेंगे.

माउंटबेटन के मुताबिक एक महीने बाद जब गांधी उनसे मिलने आये तो देश में हालात बिगड़े हुए थे. हर तरफ़ क़त्लेआम मचा था. उन्होंने गांधी को वायसराय भवन का दौरा कराया जहां एग्जीक्यूटिव काउंसिल चैंबर में उन्होंने मुख्य मीटिंग रूम बना रखा था और लार्ड इस्मे (भूतपूर्व वायसराय) के पढने वाले कमरे को वॉर रूम, जहां से वे देश भर के हालात का जायज़ा ले रहे थे. माउंटबेटन ने बताया कि इस सब को देखकर गांधी ने कहा, ‘मेरे दोस्त, मुझे ख़ुशी है कि तुमने मुझ जैसे बेवकूफ़ की आवाज़ न सुनकर ईश्वर की आवाज़ सुनी. चकित माउंटबेटन से आगे उनका कहना था, ‘मैं ग़लत था. वायसराय भवन भारत का दिल है और तुम्हें इसे खाली नहीं करना चाहिए.’ बताते हैं कि गांधी यहीं नहीं रुके. वे बोले, ‘यही वो स्थान है जहां से भारत पर शासन किया जाना चाहिए और तुम्हारे बाद सारे राष्ट्रपति यहीं रहें तो बेहतर होगा.’ माउंटबेटन बोले कि क्या वे इसे गांधी का आदेश कहकर लोगों को अवगत करा दें. गांधी बोले, ‘यकीनन.’

कहना मुश्किल है कि आख़िर गांधी के विचारों में ऐसा क्या परिवर्तन हुआ कि उन्होंने अपनी राय बदल दी. ‘पॉलिटिकल थिंकर्स ऑफ़ मॉडर्न इंडिया’ में जेबी कृपलानी इस बात का ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि गांधी ने माउंटबेटन को तत्कालीन कमांडर इन चीफ़ (सेना अध्यक्ष) के भवन, यानी आज के तीन मूर्ति भवन में रहने की सलाह दी थी. माउंटबेटन ने जवाहर लाल नेहरू से इस सिलसिले में बात की और उन्हें गांधी की मंशा से अवगत कराया. नेहरू ने यह कहकर मना कर दिया कि वे (माउंटबेटन) कुछ ही महीनों के लिए देश में रहेंगे और इस तरह कहीं और रहना शायद बेहतर विचार नहीं है. उन्होंने नेहरू की बात मानी. कृपलानी आगे लिखते हैं, ‘गांधी राजनीति में नैतिकता का समावेश चाहते थे’.

संभव है इस मामले में गांधीजी की नेहरू जी से कोई बात हुई हो. वे नैतिकता और आचरण की शुद्धता में विश्वास रखने वाले एक व्यावहारिक व्यक्ति भी थे. ऐसे में संभव है कि उन्होंने वायसराय भवन को उपनिवेशवाद की अंतिम निशानी के तौर पर न देखकर शासन की सुगमता के लिहाज से देखा हो. जो भी है, इमरान खान के कदम ने यह बहस फिर उठा दी है कि क्या भारत और पाकिस्तान के नीति नियंताओं की जीवन शैली उपनिवेशवादी है और क्या इससे निजात पाने का समय आ गया है.