सीपीएम ने चुनाव सुधारों के लिए पूरे देश में अभियान चलाने का ऐलान किया है. बीते मंगलवार को पार्टी पोलित ब्यूरो के सदस्य नीलोत्पल बसु ने कहा मोदी सरकार ने चुनाव सुधार के नाम पर चुनावी बाॅन्ड जारी करके चुनाव में काले धन और विदेशी पूंजी के दखल को बढ़ा दिया है जिससे राजनीति में भ्रष्टाचार और बढ़ेगा. उन्होंने कहा कि चुनावों का खर्च सरकार को उठाना चाहिए और पार्टियों द्वारा किए जाने वाले खर्च की सीमा तय होनी चाहिए.

इसी साल 15 मई को यानी कर्नाटक चुनाव के नतीजे सामने आने के एक दिन पहले लोगों का ध्यान खींचने वाली एक खबर आई थी. द सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस) नाम की एक शोध संस्था की रिपोर्ट में कर्नाटक चुनाव को अब तक का सबसे महंगा विधानसभा चुनाव कहा गया. रिपोर्ट के मुताबिक इस चुनाव में राजनीतिक दलों और उनके उम्मीदवारों ने मतदाताओं को रिझाने के लिए 9,500 करोड़ रु से ज्यादा की रकम खर्च कर डाली. यह रकम पांच साल पहले के चुनाव के मुकाबले दोगुनी से भी अधिक थी.

इससे पहले 2014 के आम चुनाव को भी देश का अब तक का सबसे महंगा चुनाव बताया गया था. उस चुनाव में भाजपा ने अकेले ढाई महीनों के अभियान के दौरान 712 करोड़ रु खर्च कर डाले थे. वहीं, कांग्रेस के लिए यह आंकड़ा 486 करोड़ रुपये था.

देश में चुनाव प्रचार अभियान पर बड़ी मात्रा में धनबल के इस्तेमाल को लेकर लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं. माना जाता है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में भी इसकी वजह से सभी उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में बराबरी का मौका नहीं मिल पाता है. साथ ही, इससे चुनाव में भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिलता है.

इन बातों को ध्यान में रखते हुए ही उम्मीदवारों के लिए चुनावी खर्च की सीमा तय की गई है. फिलहाल, लोक सभा चुनाव में कोई उम्मीदवार 70 लाख रुपये तक खर्च कर सकता है. वहीं, विधानसभा चुनाव के लिए यह सीमा 28 लाख रुपये तय की गई है. कुछ सीटों, जिनमें अधिकांश पूर्वोत्तर के राज्यों में स्थित हैं, के लिए यह रकम क्रमश: 50 लाख रु और 20 लाख रुपये है. लेकिन, उम्मीदवारों की तरह राजनीतिक दलों के लिए इस तरह की कोई सीमा निर्धारित नहीं की गई है.

हाल में चुनाव आयोग ने कई अलग-अलग मुद्दों पर एक सर्वदलीय बैठक बुलाई थी. इस बैठक में विपक्षी दलों ने पार्टियों के लिए भी चुनावों में खर्च की सीमा निर्धारित करने की मांग की. वहीं, सबसे बड़ी पार्टी भाजपा का कहना था कि चुनाव आयोग को पार्टी के खर्चों पर इस तरह लगाम लगाने की जगह पारदर्शिता पर अधिक जोर देना चाहिए. उसकी दलील थी कि किसी राजनीतिक दल का अभियान चुनाव में भागीदारी के लिए मतदाताओं को प्रोत्साहित और प्रभावित करता है. भाजपा का यह भी कहना था कि 20,000 रुपये से अधिक के सभी चंदे अब रिपोर्ट हो रहे हैं तो धन और खर्च के स्रोतों को रिपोर्ट करना उम्मीदवारों और दलों पर छोड़ा जाना चाहिये.

दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने विधि आयोग से इसके लिए जनप्रतिनिधित्व कानून-1951 और चुनावी नियमों से संबंधित संहिता में संशोधन संबंधी सिफारिश की मांग की है. चुनाव कराने के लिए उत्तरदायी शीर्ष संस्था ने इसके लिए एक फॉर्मूला भी सुझाया है. इसके मुताबिक एक राजनीतिक पार्टी जितने उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारती है, उनके लिए तय अधिकतम कुल रकम से पार्टी का खर्च अधिक नहीं होना चाहिए. उदाहरण के लिए यदि भाजपा 2019 के चुनाव में अपने 400 उम्मीदवारों को उतारती है तो 70 लाख रुपये प्रति सीट के हिसाब से उसके लिए तय अधिकतम चुनावी खर्च 280 करोड़ रुपये बनता है. 2014 में भाजपा ने कुल 428 सीटों पर चुनाव लड़ा था. इस लिहाज से उसने औसतन प्रति सीट 1.67 करोड़ रुपये खर्च किया था. दूसरी ओर कांग्रेस के लिए यह आंकड़ा 1.05 करोड़ रुपये था.

पार्टियों के लिए चुनावी खर्च की सीमा तय करने को लेकर विपक्ष के जोर की वजह

बीते कई वर्षों के चुनावी चंदे का रिकॉर्ड देखें तो यह रुझान सामने आता है कि कॉरपोरेट तबका भाजपा पर अधिक मेहरबान है. माना जाता है कि इसकी वजह से उसके पास चुनावों को धनबल से प्रभावित करने की क्षमता अधिक हो जाती है. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की एक रिपोर्ट भी इसकी पुष्टि करती है. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि साल 2016-17 में भाजपा को 20,000 रुपये से अधिक के चंदे के रूप में 532 करोड़ रुपये मिले. वहीं, सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस के लिए यह आंकड़ा कहीं कम (42 करोड़) रहा.

साल 2016-17 में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को हुई वह आय जिसका स्रोत 20,000 रु से अधिक का चंदा था| साभार : एडीआर
साल 2016-17 में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को हुई वह आय जिसका स्रोत 20,000 रु से अधिक का चंदा था| साभार : एडीआर

इससे पहले 2015-16 में भाजपा को 76.85 करोड़ रु और कांग्रेस को 20.42 करोड़ रु मिले थे. इसके अलावा सभी राजनीतिक पार्टियों को मिले चंदे में 62.2 फीसदी हिस्सेदारी अज्ञात स्रोतों का था. कानूनी प्रावधानों के मुताबिक यदि राजनीतिक दलों को 20,000 रुपये से कम चंदा मिलता है तो इसका ब्यौरा देना जरूरी नहीं है.

2007-08 से 2009-10 के दौरान जब कांग्रेस केंद्र की सत्ता पर काबिज थी, तो उस वक्त भी भाजपा को दूसरों के मुकाबले कई गुना अधिक चंदा मिलता था. इस अवधि के दौरान कांग्रेस को जहां 168 करोड़ रुपये मिले वहीं, भाजपा की झोली 520.3 करोड़ रुपये से भरी.

साल 2007-08 से लेकर 2009-10 के दौरान राजनीतिक दलों को चंदे के रूप में मिली रकम | साभार : एडीआर
साल 2007-08 से लेकर 2009-10 के दौरान राजनीतिक दलों को चंदे के रूप में मिली रकम | साभार : एडीआर

दूसरी ओर, 2016-17 में सात राष्ट्रीय पार्टियों-भाजपा, कांग्रेस, बसपा, एनसीपी, सीपीएम, सीपीआई और तृणमूल कांग्रेस की कुल आय 1559.17 करोड़ रुपये रही. इनमें से सबसे अधिक हिस्सेदारी 1034 करोड़ रुपये (कुल का 66.34 फीसदी) भी भाजपा की ही रही है. इसके अलावा जहां तक खर्च करने की बात है कांग्रेस (321 करोड़ रु) के मुकाबले भाजपा ने दोगुनी से अधिक (710 करोड़ रु) रकम खर्च की है. इन बातों से साफ होता है कि भाजपा के पास अन्य दलों के मुकाबले खर्च करने की अधिक क्षमता है, जो 2014 से लेकर कर्नाटक तक के चुनावों में दिखती भी है.

साल 2016-17 में भाजपा की आय और खर्च | साभार : एडीआर
साल 2016-17 में भाजपा की आय और खर्च | साभार : एडीआर

माना जा रहा है कि इन स्थितियों में यदि पार्टियों के चुनावी खर्च को सीमित कर दिया जाता है तो 2019 के चुनाव में विपक्ष फायदे की स्थिति में होगा. इसकी वजह वित्तीय संसाधनों के मामले को लेकर सभी के लिए एक समान पिच का होना है. जाहिर है भाजपा इस चुनावी खेल के उन नियमों में बदलाव से परहेज ही करेगी जो उसे भी विपक्ष के बराबर खड़ा कर दे. उधर, कई जानकार मानते हैं कि चुनावों में पार्टी खर्च की सीमा तय कर दी जाए तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छा होगा क्योंकि इससे चुनावों में धनबल पर काफी हद तक लगाम लगेगी.

यानी कुल मिलाकर चुनावी खर्च की सीमा लोकतंत्र और भाजपा पर अलग-अलग असर डालती हुई दिखती है.