बतौर लेखक दुष्यंत कुमार पर गजलकार का लेबल चस्पा है. लेकिन दिलचस्प बात है कि गजलें उनका पहला प्यार या फिर चुनाव नहीं थीं. इनसे पहले वे उपन्यास, नाटक, एकांकी और कविता सरीखी हर विधा में अपना हाथ आजमा चुके थे. इन सब में उन्होंने हाथ ही नहीं आजमाया, हर जगह अपनी साफ छाप भी छोड़ी. यहां तक कि आम तौर पर लेखक साहित्य की जिस एक विधा की तरफ सबसे कम जाते हैं उसके कठिन क्षेत्र में भी दुष्यंत कुमार काम कर रहे थे यानी आलोचना में.

इसका सबसे प्रमुख उदाहरण है ‘नयी कहानी’. कहानी परंपरा के इस नए आंदोलन, जिसके प्रमुख सूत्रधार मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव और कमलेश्वर माने जाते हैं, का नामकरण भी दुष्यंत कुमार का ही किया हुआ है. अपने एक लेख में उन्होंने बाकायदा यह बात पुष्ट की थी कि क्यों और किस तरह ये कहानियां पुरानी कहानियों से अलग हैं. और यह भी कि आखिरकार इनका नाम ‘नयी कहानी’ ही क्यों हो.

फिर भी कुछ अधूरापन और कोई तलाश अब भी दुष्यंत के लेखन का एक जरूरी हिस्सा थी. शायद वह एक फॉर्म जो एकदम उनकी अपनी हो. जहां वह अपनी बात को अपने लहजे में और अपने तरीके से कह सकें, ठीक वैसे ही जैसी कि उनकी चाहत है. तलाश की उनकी इस अनवरत यात्रा ने अंततः गजल तक पहुंचकर अपनी संतुष्टि और अपना मुकाम पाया. गजल की उनकी एकमात्र किताब ‘साए में धूप’ ने फिर इतना कुछ दिया कि उन्हें और किसी पहचान की जरूरत ही नहीं रही. मात्र 64 गजलों से बनी इस किताब ने प्रसिद्धि के नए आयाम रचे तो इसलिए कि उसके एक-एक शेर में दुष्यंत कुमार जिंदगी और समाज की शिनाख्त करते चले.

वह जमाना भी कुछ और था. उन दिनों के रचनाकारों के बीच रिश्तों और दोस्ती का ऐसा आलम था कि वे सिर्फ न एक दूसरे को उनके क्षेत्र में खड़ा कर रहे थे बल्कि उन्हें स्थापित करने के सारे जतन भी किये जा रहे थे, चाहे मनोबल बढ़ाने के जरिये ही सही. यह साथ कई बार तो देर तक और दूर तक का रहा. कमलेश्वर और दुष्यंत कुमार के मामले में खासकर. मित्रता से आगे बढकर यह संबंध रिश्तेदारी में (दोनों समधी थे) बदल जाता है. यही नहीं ‘साये में धूप’ की भूमिका में अपने गजल लिखने का लगभग सारा वे लेखक कमलेश्वर के खाते में डालते हुए लिखते हैं, ‘कमलेश्वर इस अफ़साने में न होता तो यह सिलसिला शायद यहां तक न आ पाता- ‘हाथों में अंगारे लिए सोच रहा था/ कोई मुझे अंगारों की तासीर बताये.’

दुष्यंत कुमार की गजलों में आम इंसानों की छटपटाहट है, उनके स्वप्न-भंग हैं, हमारी सामाजिक दशा है, उसकी पेचीदगियां हैं और इस सबके साथ अपने परिवेश से दुखी और नाराज लोगों की बेचैनी और उनकी चीखें भी हैं. उन्हें शिकायत है तो सबसे है .खुद से देश से, संविधान से ,सरकार से. पर सबसे पहली शिकायत उनकी उन जैसे लोगों से ही है. उनकी मजबूरियों से भी ज्यादा उनकी चुनी हुई चुप्पियों से. वे लिखते हैं, ‘तुम्हारे पांव के नीचे कोई जमीन नहीं/कमाल यह है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं.’या फिर ‘न हो कमीज तो घुटने से पेट ढक लेंगे/ ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए.’

इससे ज्यादा साहस और हैरत की बात और क्या बात हो सकती है कि कोई लेखक सरकारी नौकरी करते हुए भी व्यवस्था-विरोध वाले शेर कहता और लिखता हो. वह भी आपाताकाल जैसे सेंसरशिप वाले वक्त में. वह भी सीधे सरकार की तरफ इशारा करते हुए. उनके इस मंतव्य के कुछ शेर बहुत प्रसिद्ध हुए थे जिनका सीधा संदर्भ आपातकाल और तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी जुड़ता था मसलन, ‘मत कहो आकाश में कुहरा घना है/ यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है’ या ‘फिर एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है/और शायर ये तमाशा देखकर हैरान है.’

इसी शेर का अगला हिस्सा सम्पूर्ण क्रांति का नारा देने वाले जयप्रकाश नारायण को समर्पित था. दुष्यंत कुमार ने लिखा, ‘एक बूढा आदमी है मुल्क में या यूं कहो/ इस अंधेरी कोठरी में कोई रोशनदान है.’

निरर्थकता और बेचैनी का वह घना बोध जो दुष्यंत कुमार की गजलों का मुख्य विषय रहा है, आपातकाल विरोधी आंदोलन के साथ आशावाद के सपनों में खोने लगता है. बेचैनियां, बेचारगी का रास्ता भूलने लगती हैं और उनके भीतर का शायर उम्मीदों से भरकर कहता है - खुदा सही न सही आदमी का ख्वाब सही...पर यह त्रासदी रही कि इस आंदोलन के खत्म होने होने तक दुष्यंत भी अपने सपनों के साथ अपनी अंतिम यात्रा पर निकल चुके थे, सिर्फ 42 वर्ष की उम्र में.

दुष्यंत के शेर बगावती हैं, पर उन्होंने सिर्फ बगावती शेर ही लिखे, यह धारणा गलत है. उनके शेरों में प्रेम के रंग भी हैं. कम हैं तो इसलिए कि उनके मनमाफिक प्रेम का रंग दुनिया में उस तरह बचा ही नहीं था. और जो और जितना था उस पर इतना अधिक लिखा जा चुका था कि अब कुछ कहने की उतनी जरूरत ही नहीं थी. पर जब भी वे उसे अपने शब्दों में कहते हैं तो जैसे प्रेम भी इन शब्दों छुअन भर से बिलकुल नया-नया हो उठता है मसलन, ‘मैं तुम्हें भूलने की कोशिश में/ आज कितने करीब पाता हूं...तू किसी रेल सी गुजरती है/ मैं किसी पुल सा थरथराता हूं’

दुष्यंत की गजलों के प्रशंसक शिक्षक भी रहे, छात्र भी, नेता भी रहे और अभिनेता भी. मनोज बाजपेयी कहते हैं उन्हें कविता पढने का चस्का दुष्यंत के शेरों को पढ़ने-सुनने के बाद ही लगा. दुष्यंत कुमार की गजलों के मशहूर होने का एक बड़ा सबब यही था कि लोगों को उनकी गजलों में अपना अक्स और अपने दर्द की परछाइयां नजर आ रही थीं. वे मुद्दे भी जो उनके कलेजे में चुभते थे पर उनकी मजबूरियां जहां उनकी जुबान सिल देती थीं. दुष्यंत भी यह बूझते थे इसलिए तो उन्होंने लिखा, ‘मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूं’

दुष्यंत कुमार को हिंदी ग़जलों के शुरुआती शायर के रूप में याद किया जाता है. पर उनसे पहले निराला, नीरज, गोपाल सिंह नेपाली जैसे अन्य कई कवि-गीतकार ग़जल और गीत लिखकर यही करते आ रहे थे. सवाल फिर यह उठता है कि फिर कैसे वे हिंदी के पहले शायर हुए. वे ऐसा क्या नया कर गए कि पूरी हिंदी गजल की परम्परा को उनके नाम से जोड़कर देखा और जाना जाने लगा?

इस बात को समझने के लिए पहले दुष्यंत के इन शेरों से रुबरू होना होगा, ‘वे कर रहे हैं इश्क पे संजीदा गुफ्तगू / मैं क्या बताऊं मेरा कहीं और ध्यान है.’ या फिर, ‘मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूं/ वो गजल आपको सुनाता हूं.’ यहां यह बिलकुल स्पष्ट है कि उनके लिए गजल लिखने का मतलब जिंदगी को गजलों की शर्त पर जीना या गजलों की तरह जीना तो है ही. कहीं इससे भी अलग रोजमर्रा की तमाम बातों को, उनकी भाषा को, शब्दों को जिंदगी से गजल में बुला लेना भी है.और कहीं और ध्यान होने का मतलब यहां इश्क के जाल से निकलकर गजलों को आम लोगों से जोड़ने और उनसे मुखातिब करने से है.

तब तक यह एक आम धारणा चलती आ रही थी कि अगर ग़जल कही जा रही तो उसमें इश्क और माशूक का जिक्र होना निहायत जरूरी है. महबूब के जुल्फों के पेंचो-खम की बातें करना भी इस परंपरा का एक मकबूल हिस्सा रहा और सागरोमीना की बात करना इसकी एक जररी रस्म. यह भी एक कारण था कि अपनी कविताओं में बेहद सामान्य और निचले तबके के लोगों की बातें करने वाले निराला भी गजल लिखते हुए परंपरा के फंदे में फंसते दिखे. जो नहीं फंसे उन्होंने अपना रुख सूफियाना कलामों और दार्शनिकता की तरफ कर लिया. हिंदी का पहला शायर होने का ख़िताब दुष्यंत कुमार के हिस्से है तो सिर्फ इसी कारण.

खुद दुष्यंत कुमार ने भी कहा था, ‘अपनी सामर्थ्य और सीमा को जानने के बावजूद इस विधा में उतरते हुए मुझे संकोच तो है पर उतना नहीं, जितना होना चाहिए. मुझे अपने बारे में कभी मुगालते नहीं रहे. मैं मानता हूं मैं ग़ालिब नहीं हूं. उस प्रतिभा का शतांश भी मुझमें नहीं है. लेकिन मैं यह नहीं मानता कि मेरी तकलीफ ग़ालिब से कम है या मैंने उसे कम शिद्दत से महसूस किया... अपनी कहूं तो बस अपनी अनुभूति की ज़रा सी पूंजी को लेकर मैं उस्तादों और महारथियों के अखाड़े में उतर आया था ... गजल मुझ पर एकाएक नाजिल नहीं हुई...भारतीय कवियों में सबसे प्रखर अनुभूति के कवि मिर्जा ग़ालिब ने अपनी पीड़ा को अभिव्यक्त करने के लिए गजल का ही माध्यम क्यों चुना? अगर ग़ालिब ग़जल के माध्यम से अपनी निजी तकलीफ को इतना सार्वजनिक बना सकते हैं तो मेरी दुहरी तकलीफ (जो व्यक्तिगत भी है और सार्वजनिक भी) इस माध्यम के सहारे एक अपेक्षाकृत व्यापक पाठक वर्ग तक क्यों नहीं पहुंच सकती?’

जब उन्हें उनकी गजलों में उर्दू भाषा के हिसाब से इस्तेमाल हुए अशुद्ध रूपों के लिए टोका गया तो उनका कहना था, ‘ये गजलें उस भाषा में कही गयी हैं जिसमें मैं बोलता हूं. मैंने उर्दू शब्दों को उस रूप में इस्तेमाल किया है जिस रूप में वो हिंदी भाषा में घुले-मिले हुए हैं. उर्दू और हिंदी अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के पास आती है तो उनमें फर्क करना बहुत मुश्किल हो जाता है.और मेरी कोशिश यह रही है कि इन दोनों भाषाओं को ज्यादा करीब ला सकूं.’

कह सकते हैं कि हिंदी-गजल की जो शक्लोसूरत आज है वह दुष्यंत कुमार की दी हुई है. उनके रास्ते पर चलकर आज की गजल भाषा के शुद्धिकरण से दूर आम लोगों तक पहुंच रही है. उनकी जुबान में बातें कर रही है.