इस पुस्तक के अध्याय ‘जयपुर में धरना : मई-अगस्त 1997’ का एक अंश -

‘सूचना का अधिकार हासिल करने की जंग किसी शहर या सचिवालय से शुरू नहीं हुई, न ही लेखक, पत्रकार या वकील के घर से. इसकी शुरुआत राजस्थान के पिछड़े, निरक्षर और गरीब छोटे-छोटे गांवों से हुई थी जहां इस लोकतंत्र का भाग्यविधाता दिन-रात दो जून की रोटी के लिए खट रहा है और अपने कंधों पर पंचायत के ठेकेदारों, अफसरों और प्रशासन के भ्रष्टाचार का बोझ लादे हुए है. सारी पार्टियां भ्रष्टाचार को हटाने और उसे चुनावी मुद्दा बनाने की बात करती हैं. लेकिन कोई भी लोकतंत्र को कारगर बनाने के काम में पहल लेकर अपने हाथ नहीं जलाना चाहती. देश में पहली बार राजस्थान में सूचना के अधिकार का ग्रामीण आंदोलन इस नारे के साथ खड़ा हुआ है...गांव के मजदूरों और किसानों के बीच भंवर सिंह, मोहनजी, चुन्नीबाई, गजानन, बाबूलाल, शंकर सिंह, केली बाई और इनके जैसे कई और राजधानी में एक ही गीत गाते हैं - जयपुर की सरकार तू बोले क्यों नी रे, मुंडो खोले क्यूं नी रे!’


पुस्तक : RTI कैसे आई

लेखिका : अरूणा रॉय

प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन

कीमत : 299 रुपये


तमाम सरकारी योजनाओं के कागजों से जमीन पर उतरने का सफर काफी लंबा होता है. बहुत बार तो यह सफर सरकारी फाइलों के ढेर में दबकर, यथार्थ की जमीन पर उतरे बिना ही पूरा हो जाता है. अक्सर ही सरकारें उन फाइलों और कागजी कार्रवाई के दम पर बड़े-बड़े दावे करने और खुद को शाबाशी देने से नहीं चूकती. लेकिन आम इंसान के लिए यह पता लगाना लगभग असंभव हो जाता है कि जिन योजनाओं में सरकारें करोड़ों रुपये लगा चुकीं आखिर वे उन तक पहुंची क्यों नहीं? आखिर वह पैसा कहां गया? आरटीआई कानून ने ऐसे सभी सवालों और अपने निजी-सरकारी कामों से जुड़े जवाब भी सरकार से मांगने का हक आम जनता को दिया है. यह किताब आरटीआई कानून को हकीकत बनाने के लिए राजस्थान के लोगों द्वारा शुरू किए गए आंदोलन और फिर उसके देशव्यापी संघर्ष में तब्दील होने के सफर पर बहुत विस्तार से प्रकाश डालती है.

सूचना का अधिकार कानून को बनवाने में जिस एक संगठन ने सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वो है - ‘मजदूर किसान शक्ति संगठन’ (एमकेएसएस). इस संगठन की मुख्य संस्थापक और सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय ने समाज के निचले तबके के लोगों को संगठित करके सूचना का अधिकार कानून के लिए संघर्ष को दिशा दी थी. धरने, प्रदर्शन और भूख हड़ताल को हथियार बनाकर लोगों ने सबसे पहले पंचायतों में होने वाली धांधली को रोकने के लिए इस आंदोलन को शुरू किया था. ताकि लोगों को लिखित में सूचना दी जाए कि आखिर जनता के भले के लिए मिले पैसे का कहां, क्या, कितना और कैसे प्रयोग किया गया. शुरू में गांव के लोगों को यह समझ ही नहीं आता था कि सूचना के हक के लिए भला क्या लड़ना! लेकिन इसके बावजूद गांव के लोगों के अभूतपूर्व संघर्ष और सहयोग के ऐसे ही अनुभव को बांटते हुए अरुणा बताती हैं –

‘अगले चालीस दिनों के भीतर तमाम सामाजिक और राजनीतिक तबकों के लोग, पेशेवर, मजदूर कार्यकर्ता, पत्रकार आदि धरने के लिए ब्यावर पहुंच गए. टेंट की गर्मी में भाषणों, गीतों और नारों के दौर चले. ब्यावर के लोगों ने खाने-पीने की व्यवस्था की...छोटे दुकानदारों ने सब्जी और दूध की व्यवस्था की. आसपास के गांवों के किसान अनाज के बोरे भरकर लाने लगे. स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं ने खाना बनाने, परोसने, वीडियो बनाने का काम किया. गांवों के निर्धनतम लोगों ने भी अपनी क्षमता अनुसार जो हो सकता था, दान में दिया... बीच-बीच में राजनीतिक भाषण हो रहे थे... इन सबके बीच सूचना के अधिकार की मांग लगातार दुहराई जा रही थी.

ब्यावर के लोग समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर गांवों के गरीब लोग खाना, मजदूरी या जमीन मांगने के बजाय सूचना का अधिकार जैसी अमूर्त चीज क्यों मांग रहे हैं.’

एमकेएसएस ने न सिर्फ गरीबों और किसान-मजदूरों के हक के लिए कई स्तरों पर संघर्ष किए, बल्कि वंचित तबके और बाजार के बीच के क्रूर संबंध को समझने और बदलने के लिए भी काफी प्रयास किए हैं. इस संगठन ने अपनी किराने की दुकान खोलकर इस मिथ को तोड़ने की सफल कोशिश की है कि बाजार कभी भी पारदर्शिता नहीं बरत सकता. मुक्त और खुले बाजार के अपने अनुभव के बारे में बात करते हुए अरुणा लिखती हैं –

‘मजदूर किसान किराना स्टोर ने जब माइक से अनाज के दामों का ऐलान करने का फैसला किया तो पूरे बाजार में दहशत थी... एमकेएसएस में सामूहिक फैसला लिया गया था कि 1 से 2 फीसदी मुनाफा ही कमाना है, उससे ज्यादा नहीं. आम तौर से दुकानदार 25 फीसदी मुनाफा कमाते थे... इन दुकानों ने दरअसल इस दलील को चुनौती दी और गलत साबित किया कि बाजार कभी भी पारदर्शी नहीं हो सकता क्योंकि वह मुनाफे पर आधारित होता है... मजदूर स्टोर ने दिखा दिया था कि कैसे एक अदद दुकान मुक्त बाजार के मिथक को केवल पारदर्शिता के आधार पर और बढ़े हुए दामों को उजागर करके ध्वस्त कर सकती है और यह दिखा सकती है कि कैसे बाजार अपने दोहनकारी मुनाफे के चलते नैतिकता को तिलांजलि दे देता है.’

राजस्थान के अलग-अलग गावों-शहरों में हुई जन सुनवाइयों की सूचना का अधिकार कानून के निर्माण में सबसे अहम भूमिका रही है. जन सुनवाइयों में कुछ जाने-माने कानूनविदों, शिक्षाविदों, पत्रकारों, समाजशास्त्रियों और अधिकारियों का एक पैनल बैठकर लोगों की शिकायतें सुनता है. इनका विश्लेषण करने के बाद एक रिपोर्ट तैयार की जाती है, जिसके हिसाब से पीड़ित व्यक्ति को न्याय दिलवाने के लिए प्रशासनिक कार्रवाई का दबाव बनाया जाता है. अरुणा जन सुनवाई की ताकत बताते हुए एक जगह एक ऐसे दलित सरपंच के बारे में बताती हैं जिसे गांव के दबंग लोग रबर स्टैंप की तरह प्रयोग करके भयंकर भ्रष्टाचार कर रहे थे. और जिसने दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए अपने ही खिलाफ जन सुनवाई करवाने की पहल की थी. अरुणा लिखती हैं –

‘आखिर कोई सरपंच अपने गांव में अपने ही खिलाफ कोई जन सुनवाई क्यों रखवाना चाहेगा?...लेकिन प्यारजी की कहानी भी खास और चौंका देने वाली थी...प्यारचन्द खटीक दलित थे... महीने गुजरते गए और प्यारजी अपने सामने लाए कागजात पर बिना सोचे-समझे दस्तखत करते गए. धीरे-धीरे उन्हें इस बात का ज्ञान हुआ कि दरअसल उनकी गरदन में फंदा कसता जा रहा है... उन्होंने हमसे मिलकर कहा. ‘अब मुझे पता चल गया है कि लोग चोरी कर रहे हैं और पकड़ा मैं जाऊंगा. इसलिए एक जन सुनवाई करवा दीजिए.’

सूचना के अधिकार की अहमियत वैसे तो समाज के हर तबके के हरेक इंसान के लिए है. लेकिन यह कानून सबसे ज्यादा ग्रामीण और वंचित तबके की जिंदगी के बुनियादी हक उन्हें दिलवाने में मददगार हो रहा है और हो सकता है. इस तरह से देखा जाए तो यह कानून उन गिने-चुने कानूनों में से एक है जो सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने में बेहद अहम भूमिका सकते हैं. अरुणा रॉय ने बहुत बारीकी से इस कानून को बनाने से जुड़े संघर्षों को इस किताब में दर्ज किया है. जगह-जगह पर आम लोगों, पत्रकारों, लेखकों, विश्लेषकों, सरकारी मशीनरी के लोगों की बातें और उदाहरण दर्ज होने से किताब में थोड़ी जीवंतता भी आ गई है.

सुविधाहीन-साधनहीन लोग कैसे एकजुट होकर संघर्ष करते हैं और कैसे लंबे सफर को अपने गीतों, नाटक-नौटंकियों से जीवंत बनाए रखते हैं; यह अनुभव शहर की जनता के लिए बिलकुल नया हो सकता है. अभिषेक श्रीवास्तव ने मूल अंग्रेजी की इस किताब का ठीक-ठाक अनुवाद किया है. हालांकि इसे संघर्ष करने वाले आम पाठकों के हिसाब से और ज्यादा सहज बनाए जाने की जरूरत महसूस होती है. कुल मिलाकर यह किताब सूचना का हक कानून बनने के बारे में बेहद आम लोगों के बहुत खास संघर्ष का ब्योरा देती है.